32.1 C
Delhi
Monday, September 27, 2021

Add News

बरोदा ने किसानों के मुद्दे पर खट्टर ही नहीं, बीजेपी की ऐंठ भी निकाल दी

ज़रूर पढ़े

बिहार चुनाव नतीजों की उठापटक की आड़ में हरियाणा के एकमात्र बरोदा उप चुनाव के नतीजे पर किसी ने तवज्जो नहीं दी। विवादास्पद कृषि कानूनों के लागू होने के फौरन बाद कृषि प्रधान राज्य हरियाणा में हुए इस चुनाव पर बीजेपी आलाकमान की खुद नजर थी। सोनीपत जिले में आने वाले बरोदा उप चुनाव में कांग्रेस के इंदु राज नरवाल ने अंतरराष्ट्रीय पहलवान और बीजेपी प्रत्याशी योगेश्वर दत्त को हराया है। यहां पर कांग्रेस की जीत अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की अलोकप्रियता पर बरोदा ने मुहर लगा दी है।

इस नतीजे से कांग्रेस में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का खेमा और मजबूत हो गया है। बरोदा के दंगल में बीजेपी ने अंतरराष्ट्रीय पहलवान योगेश्वर दत्त को फिर से उतारा था, लेकिन वह लगातार दूसरी चुनावी कुश्ती भी हार गए। हालांकि इस बार बीजेपी का कांग्रेस से सीधा मुकाबला था। इनैलो (आईएनएलडी) नाममात्र के लिए मैदान में थी। बरोदा में जीतने पर बीजेपी इसे किसानों का कृषि कानूनों पर समर्थन बताकर प्रचार करने वाली थी। इस उप चुनाव में भी अयोध्या में मंदिर और कश्मीर से धारा 370 हटाने का खूब प्रचार किया गया, लेकिन मतदाताओं ने उन मुद्दों की तरफ देखा ही नहीं।

बहुत कुछ बताता है वोट प्रतिशत
बरोदा उप चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन पिछले विधानसभा आम चुनाव 2019 से भी इस बार बदतर है। 2019 के चुनाव में इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी योगेश्वर दत्त कांग्रेस के कृष्णमूर्ति हुड्डा से 4,840 मतों से हारी थीं, लेकिन इस बार बीजेपी के उन्हीं योगेश्वर दत्त को कांग्रेस के इंदु राज नरवाल ने 10566 मतों से हरा दिया। 2019 के चुनाव में जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने भी चुनाव लड़ा था, यानी मुकाबला त्रिकोणीय भी था, लेकिन इस बार तो बीजेपी की मदद के लिए जेजेपी सुप्रीमो दुष्यंत चौटाला बरोदा के जाट बहुल गांवों में झोली फैलाकर वोट मांगने पहुंचे थे। कांग्रेस ने इस उप चुनाव में अपने मत प्रतिशत के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। कांग्रेस प्रत्याशी को 49.28 फीसदी वोट मिले हैं, जो अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। बीजेपी को 40.70 फीसदी वोट मिले हैं।   

2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 33.20 वोट प्रतिशत हासिल कर अपने दम पर 47 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में 36.5 फीसदी वोट लेकर वो 36 सीटें हासिल कर सकी और फिर नाटकीय घटनाक्रम में जेजेपी से गठबंधन कर सरकार बना ली। कांग्रेस अपना वोट प्रतिशत लगातार बेहतर कर रही है। बरोदा ने भी इस संकेत को दोहराया है।

हार के खास फैक्टर
उप चुनाव के दौरान इस संवाददाता ने देखा था कि बरोदा में प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर लगाकर वोट मांगे गए थे। इसमें अक्तूबर में संसद से पास किए गए तीन कृषि कानूनों को हवाला था, लेकिन किसान उतनी ही हिकारत से उन पोस्टरों को देखते थे। सितंबर महीने में जब इन कृषि कानूनों को संसद में लाया जा रहा था तो उस समय सबसे पहले पंजाब और हरियाणा के किसानों ने इन कृषि बिलों का तीखा विरोध शुरू किया। पंजाब में और हरियाणा के सिरसा, अंबाला और करनाल में किसान रेल पटरियों पर बैठ गए।

10 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन ने किसानों की रैली कुरुक्षेत्र के पीपली कस्बे में आयोजित की। इस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। आरोप है कि किसानों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। इसके बाद विरोध में जेजेपी के कुछ विधायकों ने अपनी ही सरकार का विरोध करते हुए किसानों का समर्थन कर दिया और उनके साथ धरने पर भी बैठ गए। बरोदा न सिर्फ जाट बेल्ट का महत्वपूर्ण इलाका है, बल्कि किसान बेल्ट का भी प्रमुख इलाका है। इसके आसपास गोहाना, इन्द्री, गन्नौर जैसी बड़ी कृषि मंडियां हैं। किसानों पर लाठीचार्ज की वजह से हरियाणा के किसान नाराज हो गए।

उप चुनाव में प्रचार के लिए खट्टर मंत्रिमंडल का कोई ऐसा मंत्री नहीं बचा था, जो वहां नहीं पहुंचा। अंतिम चरण में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर वहां चार दिन जमे रहे और बरोदा के लगभग हर गांव में पहुंचे। खट्टर के वहां पहुंचने से यह मामूली उप चुनाव और भी खास बन गया। बीजेपी ने जाट बेल्ट की इस सीट में एक दांव और भी खेला है। उसने इस मुकाबले को जाट बनाम गैर जाट बनाने की कोशिश की। बीजेपी ने जानबूझ कर गैर जाट प्रत्याशी योगेश्वर दत्त को इस चुनाव में उतारा। कांग्रेस प्रत्याशी जाट हैं।

इससे जाटों में यह संकेत गया कि बीजेपी जानबूझ कर इस समुदाय को हाशिये पर लाना चाहती है। उप चुनाव में रिपोर्टिंग के दौरान मतदाताओं में बीजेपी प्रत्याशी को लेकर कोई ललक या उत्साह नहीं दिखा। हालांकि योगेश्वर दत्त के खाते में 2012 ओलंपिक का कांस्य पदक दर्ज है, जिसका बीजेपी ने जबरदस्त प्रचार भी किया, लेकिन बरोदा के बेरोजगार युवा मतदाताओं ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया।

हुड्डा का चक्रव्यूह
इंदु राज को कांग्रेस का टिकट दिलाने से लेकर खुद प्रचार की कमान संभालने और अपने खास समर्थकों को बरोदा बुलाकर सभी को छह-छह गांव की जिम्मेदारी सौंपकर पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बरोदा को जीतने के लिए तगड़ी व्यूह रचना की थी। बरोदा की रैलियों में हुड्डा बस एक ही बात कहते थे, ‘मेरा यह आखिरी चुनाव है। उसके बाद अगली पीढ़ी मोर्चा संभालेगी।… यह उप चुनाव मेरी इज्जत का सवाल है।’ बरोदा में जो पोस्टर दिखे उसमें हुड्डा के बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा को खासतौर पर प्रोजक्ट किया गया था।

भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बरोदा के एक-एक गांव को किसी न किसी पूर्व कांग्रेस विधायक या मौजूदा विधायक के जिम्मे सौंपा था। मसलन तिगांव (फरीदाबाद) के पूर्व विधायक ललित नागर, पूर्व विधायक महेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विजय प्रताप, नूंह के कांग्रेस विधायक आफताब अहमद को 6-6 गांव सौंपे गए थे। कांग्रेस नेता लखन सिंगला की ड्यूटी भी हुड्डा ने कुछ गांवों में लगाई। इसी तरह गुड़गांव, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, करनाल, सिरसा, हिसार, हांसी आदि इलाकों के कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता बरोदा में चारों तरफ फैल गए थे। इन सभी गांवों में दीपेंद्र हुड्डा को ट्रैक्टर पर ले जाया जाता था, जिस पर पूर्व या वर्तमान कांग्रेस विधायक और उस गांव के प्रतिष्ठित जाट नेता सवार रहते थे।

हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा भी हुड्डा से तमाम मतभेदों के बावजूद बरोदा में प्रचार करने के लिए गईं। रणदीप सुरजेवाला ने भी इस उप चुनाव में हुड्डा से अपने मतभेद भुला दिए, लेकिन यह उप चुनाव हुड्डा खानदान की अगली पीढ़ी को स्थापित करने के लिए जाना जाएगा।

ओमप्रकाश चौटाला की चमक फीकी पड़ी
2014 के विधानसभा चुनाव से ही अपनी इज्जत गंवाती आ रही इनैलो (आईएनएलडी) ने कोई भी सबक न सीखते हुए इस उप चुनाव में भी अपना प्रत्याशी उतार दिया। इनैलो प्रत्याशी जोगेंद्र सिंह मलिक को कुल 5003 वोट मिले और पार्टी के खाते में 4.07 फीसदी वोट आए। 2019 के विधानसभा चुनाव में बरोदा से इनैलो प्रत्याशी को 3145 वोट मिले थे। इनैलो से बेहतर प्रदर्शन तो लोकतांत्रिक सुरक्षा पार्टी के प्रत्याशी राजकुमार सैनी का रहा, जिन्हें इस बार बरोदा में 5611 वोट मिले। हालांकि उन्हें दलित वोट काटने के मकसद से बरोदा में उतारा गया था, लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिली।

मलिक के चुनाव प्रचार के लिए ओमप्रकाश चौटाला पैरोल लेकर खुद बरोदा में चुनाव प्रचार करने पहुंचे। भ्रष्टाचार के आरोप में सजा काट रहे ओमप्रकाश चौटाला की रैलियां जाट बहुल इलाकों में कराई गईं। जाट युवा और बुजुर्ग साफा बांधकर चौधरी देवीलाल के बेटे चौटाला को देखने तो पहुंचे लेकिन भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो सकी। 2019 के विधानसभा चुनाव में इनैलो को अपने ही कुनबे से टूटकर बनी नई नवेली पार्टी जेजेपी के मुकाबले कम वोट मिले थे, लेकिन इनैलो इतनी बड़ी पराजय के बाद किसी तरह का सबक सीखने को तैयार नहीं है। इनैलो अभी भी ओमप्रकाश चौटाला को करिश्माई नेता मान रही है, लेकिन वक्त के साथ उनकी चमक फीकी पड़ चुकी है।

उन्हीं के भाई रणजीत सिंह बीजेपी में हैं और खट्टर मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री का पद हासिल कर चुप बैठ गए हैं। ओमप्रकाश चौटाला ने अपनी विरासत यानी इनैलो अभय चौटाला को सौंप रखी है तो उन्हीं के दूसरे बेटे अजय चौटाला ने बगावत कर जेजेपी बना ली और अपने बेटों को कमान सौंप दी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों के अधिकारों में गंभीर क़ानूनी कमी:जस्टिस भट

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस रवींद्र भट ने कहा है कि असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों के अधिकारों की बात आती...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.