Wednesday, October 20, 2021

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बीएसएनएल की बोली लगेगी, जिओ की झोली भरेगी!

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार बीएसएनएल और एमटीएनएल को बेचने जा रही है। नब्बे के दशक में बने बीएसएनएल का नेटवर्क देश के गांव गांव तक रहा है। इसकी संपत्ति भी देशभर में फैली हुई है। देश में संचार क्षेत्र में जितनी भी कंपनियां आईं सब बीएसएनएल की कीमत पर ही फली फूलीं। यह काम केंद्र सरकार की नीति और नीयत के चलते हुआ। नतीजा यह हुआ कि आज देश की सबसे बड़ी सरकारी संचार कंपनी की कभी भी बोली लग सकती है तो दूसरी तरफ अंबानी के जिओ ने दूसरे नेटवर्क पर की जाने वाली काल का पैसा लेने का एलान कर दिया है। जिओ को सरकारी शह मिली और संरक्षण भी। लेकिन बीएसएनएल को बेसहारा छोड़ दिया गया।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, वित्त मंत्रालय ने बीएसएनएल और एमटीएनएल को बंद कर देने का प्रस्ताव रखा है। कुछ समय पहले तक दूरसंचार मंत्रालय बीएसएनएल और एमटीएनएल की हालत दुरुस्त करने के लिए एक पैकेज लाने की सोच रहा था। लेकिन वित्त मंत्रालय ने सुझाया है कि 74 हज़ार करोड़ रुपए लगाकर इन कंपनियों को दोबारा खड़ा करने से बेहतर है कि 95 हज़ार करोड़ लगाकर दोनों कंपनियों को बंद कर दिया जाए। इस वक्त बीएसएनएल में क़रीब 1 लाख 65 हज़ार और एमटीएनएल में 22 हज़ार कर्मचारी हैं। ऐसे में दोनों कंपनियां बंद होती हैं तो इन कर्मचारियों पर सीधा असर पड़ेगा।

देश में सरकारी स्वामित्व वाली छह टेलीकॉम कंपनियां हैं। इनमें से सबसे बड़ी दो हैं- बीएसएनएल और एमटीएनएल दोनों घाटे में हैं। बीएसएनएल वित्त वर्ष 2018-19 में करीब 13 हज़ार 804 करोड़ रुपए के घाटे में थी। और देश की सबसे ज्यादा घाटा उठाने वाली सरकारी कंपनी बनी। एमटीएनएल 3 हज़ार 398 करोड़ रुपए के घाटे के साथ इस सूची में तीसरे नंबर पर थी। मौजूदा वक्त में प्राइवेट कंपनियों के लिए 4G से होने वाली आय सबसे बड़ा स्रोत है। लेकिन बीएसएनएल के पास 4G सर्विस नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बीएसएनएल की आमदनी का 75 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ तनख़्वाह देने में खर्च होता है।

सरकार विनिवेश यानी डिसइनवेस्टमेंट की राह पर है। 5 जुलाई, 2019 को अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार वित्त वर्ष 2020 में सरकारी कंपनियों और उनकी हिस्सेदारी को बेचकर 1.05 लाख करोड़ रुपए जुटाएगी। बीएसएनएल को चलाने से सरकार को नुकसान ही हो रहा है। पर सरकार ने इस नुकसान से उबरने का कोई गंभीर प्रयास किया हो यह नजर नहीं आया। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र की जिओ को जिस तरह बढ़ावा दिया गया वह कई सवाल खड़े करता है।

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