Friday, October 22, 2021

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छत्तीसगढ़ भी उतरा मैदान में, मानव श्रृंखला बनाकर दिखाई किसानों के साथ एकजुटता

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कृषि कानूनों के खिलाफ पूरे देश के किसानों में उबाल है। दिल्ली नहीं जा पाए तमाम किसानों ने छत्तीसगढ़ में किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन और छत्तीसगढ़ किसान सभा के आह्वान पर मोदी सरकार द्वारा बनाए गए किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ किसानों, मजदूरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मानव श्रृंख्ला बनाई। प्रदर्शनकारियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था सुनिश्चित करने, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और ग्रामीण जनता के लिए न्यूनतम मजदूरी और रोजगार सुनिश्चित करने की भी मांग दोहराई। आदिवासियों ने कृषि विरोधी कानूनों की प्रतियां और मोदी सरकार के पुतले जलाए। साथ ही कॉरपोरेटपरस्त कानूनों को निरस्त करने की मांग की। आंदोलनकारी संगठनों ने केंद्र सरकार के बनाए कानूनों के दुष्प्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिए राज्य स्तर पर एक सर्वसमावेशी कानून बनाने की भी मांग की है।

आज 500 से अधिक किसान संगठनों द्वारा ‘कॉरपोरेट भगाओ- खेती-किसानी बचाओ- देश बचाओ’ के केंद्रीय नारे पर दिल्ली में संसद पर प्रदर्शन के साथ ही देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया। माकपा समेत प्रदेश की सभी वामपंथी पार्टियों के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर उतरे।

मोदी सरकार के कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ प्रदेश में छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के बैनर तले 20 से ज्यादा संगठन एकजुट हुए और कोरबा, राजनांदगांव, सूरजपुर, सरगुजा, रायगढ़, कांकेर, चांपा, मरवाही, बिलासपुर, धमतरी, जशपुर, बलौदाबाजार, बस्तर समेत 20 से ज्यादा जिलों में अनेकों स्थानों पर भारी विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन स्थानों पर किसान श्रृंखलाएं बनाई गईं और मोदी सरकार के पुतले जलाए गए। कई स्थानों पर किसानों की मांगों के समर्थन में मजदूर संगठनों ने एकजुटता दिखाई।

छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के संयोजक सुदेश टीकम और छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष संजय पराते ने सफल आंदोलन के लिए किसान समुदाय और आम जनता का आभार व्यक्त किया और कहा कि देश और छत्तीसगढ़ की जनता ने इन कानूनों के खिलाफ जो तीखा प्रतिवाद दर्ज किया है, उससे स्पष्ट है कि आम जनता की नजरों में इन कानूनों की कोई वैधता नहीं है और इन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। किसान संघर्ष समन्वय समिति के कोर ग्रुप के सदस्य हन्नान मोल्ला ने भी प्रदेश में इस सफल आंदोलन और किसान श्रृंखला बनाने के लिए किसानों को बधाई दी है।

इन संगठनों ने आरोप लगाया कि इन कॉरपोरेटपरस्त और कृषि विरोधी कानूनों का असली मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से छुटकारा पाना है। कृषि व्यापार के क्षेत्र में मंडी कानून के निष्प्रभावी होने और निजी मंडियों के खुलने से देश के किसान समर्थन मूल्य से वंचित हो गए हैं, चूंकि ये कानून किसानों की फसल को मंडियों से बाहर समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने की कृषि-व्यापार करने वाली कंपनियों, व्यापारियों और उनके दलालों को छूट देते हैं और किसी भी विवाद में किसान के कोर्ट में जाने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाते हैं, इसलिए ये किसानों, ग्रामीण गरीबों और आम जनता की बर्बादी का कानून है।

आंदोलनकारी संगठनों का मानना है कि समर्थन मूल्य पर सरकार यदि धान नहीं खरीदेगी, तो कालांतर में गरीबों को एक और दो रुपये की दर से राशन में चावल-गेहूं भी नहीं मिलेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पंगु हो जाएगी। इन कानूनों का असर सहकारिता के क्षेत्र की बर्बादी के रूप में भी नज़र आएगा। इसके साथ ही व्यापारियों को असीमित मात्रा में खाद्यान्न जमा करने की छूट देने से और कंपनियों को एक रुपये का माल अगले साल दो रुपये में और उसके अगले साल चार रुपये में बेचने की कानूनी इजाजत देने से कानून बनने के कुछ दिनों के अंदर ही कालाबाज़ारी और जमाखोरी बढ़ गई है और बाजार की महंगाई में आग लग है।

उन्होंने कहा कि इन कानूनों को बनाने से मोदी सरकार की स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और किसानों की आय दोगुनी करने की लफ्फाजी की भी कलई खुल गई है। किसान नेताओं ने कहा कि कॉरपोरेट गुलामी की ओर धकेलने वाले इन कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ देश के किसान तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक इन्हें बदला नहीं जाता। किसान आंदोलन के नेताओं ने दिल्ली पहुंचने के लिए निकले किसानों पर हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमाओं पर अमानवीय बर्बरता किए जाने की भी तीखी निंदा की है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेटों की तिजोरी भरने के लिए देश के किसानों से टकराव लेने वाली कोई सरकार टिक नहीं सकती।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार की उन नीतियों के खिलाफ भी छत्तीसगढ़ के किसान आंदोलित हैं, जिसने किसानों के हितों की रक्षा करने के वादे के बावजूद मंडी संशोधन अधिनियम में न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने तक का प्रावधान नहीं किया है और डीम्ड मंडियों के प्रावधान के जरिये केंद्र सरकार द्वारा मंडियों के निजीकरण के कॉरपोरेटपरस्त फैसले का अनुमोदन कर दिया है। यही कारण है कि इस मौसम में मंडियों में भी किसान धान के समर्थन मूल्य से वंचित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा नवंबर माह में सोसायटियों के जरिये धान नहीं खरीदने के कारण प्रदेश के किसानों को 1000 करोड़ रुपयों से ज्यादा का नुकसान होने जा रहा है।

आज के आंदोलन में सभी किसान संगठन मंडियों में समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने और घोषित समर्थन मूल्य से कम कीमत पर फसल की खरीदी को कानूनन अपराध घोषित करने की भी मांग कर रहे हैं।

बयान जारी करने वालों में छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन की ओर से सुदेश टीकम, संजय पराते, आलोक शुक्ला, विजय भाई, रमाकांत बंजारे, नंदकुमार कश्यप, आनंद मिश्रा, जिला किसान संघ (राजनांदगांव), छत्तीसगढ़ किसान सभा, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), किसान संघर्ष समिति (कुरूद), आदिवासी महासभा (बस्तर), दलित-आदिवासी मजदूर संगठन (रायगढ़), दलित-आदिवासी मंच (सोनाखान), भारत जन आन्दोलन, गांव गणराज्य अभियान (सरगुजा), आदिवासी जन वन अधिकार मंच (कांकेर), पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति (बंगोली, रायपुर), उद्योग प्रभावित किसान संघ (बलौदाबाजार), रिछारिया केंपेन, आदिवासी एकता महासभा (आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच), छत्तीसगढ़ प्रदेश किसान सभा, छत्तीसगढ़ किसान महासभा, परलकोट किसान कल्याण संघ, अखिल भारतीय किसान-खेत मजदूर संगठन, वनाधिकार संघर्ष समिति (धमतरी), आंचलिक किसान संघ (सरिया) आदि संगठन शामिल हैं।

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