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भारतीय नागरिकता: सवाल और बवाल

संविधान की सत्तरवीं वर्षगांठ मनाते समय भी, हम भारत के लोग अपनी नागरिकता (अस्तित्व) के बारे में आशंकित और भयभीत हैं। देश के विभिन्न भागों में हिंसक विरोध प्रदर्शन, आंदोलन, हड़ताल, घेराव जारी है। संसद से सड़क तक गंभीर सवालों का दबाव-तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। बेरोज़गारी और आर्थिक बोझ से हैरान-परेशान युवा-रक्त, अभेध चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। अनेक विश्वविद्यालय (एएमयू से जामिया और जेएनयू) के छात्र-छात्राएं लहूलुहान है। चारों तरफ धूल है, धुंआ है और धुंध है।

नागरिकता पर बहस करने से पहले, गुलशेर खान ‘शानी’ के कालजयी उपन्यास ‘कालाजल’ का यह अंश पढ़ लें, ‘‘कुछ हमदर्दों ने दबी जबान में (अब्बा को) समझाया तो बोले कि मरना-कटना होगा तो यहीं मर-कट जाएंगे, बुढ़ापे में मिट्टी खराब करने कहां जाएं? और उसी के साथ वाला वह दौर, जब हम सब शक की नजर से देखे जाते थे।

स्कूल में लड़के हम लोगों को देखकर ताने कसते कि ‘भेजो सालों को पाकिस्तान, बांधों सालों को जिन्ना साहब की दुम से…’ और मुझे तब यह सोचकर रोना आता था कि लोग हमें बेईमान क्यों समझते हैं। हमारा दोष क्या सिर्फ यही है कि हमने मुस्लिम परिवार में जन्म लिया है?’’ (पृष्ठ-291)

‘‘काफी बहस के बाद अन्ततः बब्बन ने कहा, ‘चलो, अच्छा है, जाना ही चाहते हो तो, अभी न सही, फूफी को दफन करके चले जाना। लेकिन पाकिस्तान पहुंचने के बाद भी अगर तुम्हें लगा कि ठगे गए, तो फिर कहां जाओगे-अरब या ईरान?” (पृष्ठ-291) ‘‘क्या वहां भी ‘प्रताड़ित’ हुए तो फिर लौट पाओगे ‘हिंदुस्थान’?’’

नागरिकता कानून में संशोधन
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 में दिसंबर 2019 में हुए (किए) संशोधन के अनुसार अगर 31 दिसंबर, 2014 से पांच साल पहले तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए प्रताड़ित हिंदू (बौद्ध, सिक्ख, जैन) पारसी और ईसाई) शरणार्थी की तरह (31 दिसंबर, 2019 तक) रह रहे हैं, तो इन सब को भी ‘हिंदुस्थान’ की नागरिकता मिल सकती है… मिल जाएगी। (नागरिकता अधिनियम, 1955 में दिसंबर 2019 में हुए संशोधन अनुसार)

नागरिकता बिल (विधेयक) 2019 संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ‘गज़ट नोटिफिकेशन’ भी हो चुका है। संशोधित कानून के लागू होने-करने की तारीख (दस जनवरी, 2020) भी घोषित कर दी गई है। सो ‘नया कानून’ बन गया है और लागू भी हो गया है। इससे पहले सिर्फ सार्वजनिक प्रयोगशाला में परीक्षण हो रहा था।

दिसंबर 2019 के इस संशोधन को लेकर पहला मुख्य विवाद यह है कि इस कानून में  ‘मुस्लिम’ शरणार्थी शामिल नहीं हैं और दूसरा यह कि ‘पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान’ ही क्यों, बाकी पड़ोसी देश क्यों शामिल नहीं किए गए? अधिनियम में ‘प्रताड़ित’ होने के बारे में तो कोई जिक्र तक नहीं है।

सही कह रहे हो कि भारतीय संविधान के अनुसार देश के हर नागरिक को ‘कानून के समक्ष समानता और समान कानूनी संरक्षण’ का मौलिक अधिकार है। मगर अधिकार सिर्फ भारतीय ‘नागरिकों’ के लिए है… विदेशियों या ‘अवैध प्रवासियों’ के लिए नहीं। हां! ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार “समानता का मतलब है, समान लोगों में समानता।” बराबरी का अर्थ है, बराबरों में बराबरी। सो यह पढ़ कर आश्चर्य न करें कि कानून में पड़ोसी देशों से आए सब शरणार्थियों (धर्मावलंबियों और नास्तिकों सहित) के लिए बनाए गए नियम एक समान नहीं हैं। भला सब एक समान, कैसे हो सकते हैं!

सुना नहीं क्या कि ‘धर्म’ के आधार पर नहीं, ‘माइनॉरिटी’ और ‘उत्पीड़न’ के आधार पर ‘उचित वर्गीकरण’ किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार ही तो किया है। अनपढ़ जनता को समझ नहीं आ रहा, उन्हें विपक्षी, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘ख़ान मार्केट बुद्धिजीवी’ भड़का रहे हैं।

लगता है घर-घर जाकर बताना-समझाना पड़ेगा! नागरिकता सिर्फ राष्ट्रीय पहचान ही नहीं, राजनीतिक सत्ता और संवैधानिक संरक्षण से जुड़ा अटूट मामला भी है। राजसत्ता हमेशा से तय करती आई है कि उनके न्याय क्षेत्र में नागरिक कौन होंगे और कौन नहीं। धर्म, जाति, लिंग और सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को अनदेखा कैसे करें!

मत भूलो की नागरिकता के लंबे इतिहास में रोम, इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक में ‘गुलामों’ (विधर्मियों) को नागरिकता पाने का अधिकार नहीं था। अधिकांश अरब देशों में नागरिकता का अधिकार सिर्फ मुस्लिमों को है और इस्राइल में यहूदियों को… क्या यह सब भी बताना-गिनाना पड़ेगा?

नए कानून के विरोध में देश भर में शांतिपूर्ण (अहिंसक) आंदोलन-प्रदर्शन हो रहे हैं। आश्चर्य जनक रूप से नागरिकता संशोधन विरोधी आंदोलन में सभी धर्म-जाति की महिलाएं भी बढ़-चढ़ कर भाग ले रही हैं। कुछ जगह तो नेतृत्व महिलाओं के ही हाथ में है। मीडिया के अधिकांश नौसिखिए-उत्साही पत्रकार नागरिकता कानून या बिल (विधेयक) के बारे में ‘उल्टा-पुल्टा’ बोले जा रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ भी पक्ष-विपक्ष में तर्क (कुतर्क) किए जा रहे हैं। राजघाट के ठीक सामने लाठी, गोली, आंसू गैस, आगजनी, पत्थरबाजी का ‘लाइव’ प्रसारण जारी है।

हालांकि संशोधित कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीमकोर्ट में दायर बहुत सी याचिकाओं पर सरकार को नोटिस जारी किया गया है, बिना किसी स्थगन आदेश के। केंद्र सरकार ने गुहार लगाई है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं की सुनवाई भी सुप्रीमकोर्ट ही करे। संभावना है कि सुप्रीमकोर्ट ही सबकी सुनवाई के बाद फैसला करेगी।

दरअसल राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के आसाम अनुभव को ध्यान में रखते हुए, राष्ट्रव्यापी आशंका और भय यह भी है कि उपरोक्त कानूनों और नियमों के अनुसार अपना (या) और अपने माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र और निवास स्थान सम्बंधी दस्तावेज़ बताना (दिखाना) अनिवार्य हो सकता है।

ध्यान रहे कि आसाम समझौते के बाद (1986) राजीव गांधी सरकार द्वारा नागरिकता को जन्म के आधार की बजाए पिता या माता (रक्त सम्बंध) की नागरिकता से जोड़ा गया था। नागरिकता अधिनियम में (जनवरी 2004 से) अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा व्यापक संशोधन किए गए। फौरन बाद कांग्रेस सरकार द्वारा (वामपंथी दलों और अन्य के सहयोग से) रचित राष्ट्रीय जनगणना/ नागरिकता रजिस्टर के लिए कानूनी संशोधन और नियम में पूरी वैधानिक व्यवस्था पहले ही की जा चुकी है।

आसाम नागरिकता रजिस्टर के भयावह परिणामों का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मां-बाप का नाम रजिस्टर में शामिल है, लेकिन बच्चों के नाम गायब। तभी तो सुप्रीमकोर्ट को (7 जनवरी, 2020) को सरकार ने विश्वास दिलाया कि ऐसे बच्चों को ‘डिटेंशन कैंप’ (यातना शिविर) नहीं भेजा जाएगा।

विभाजन के बाद संविधान और नागरिकता
उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त, 1947 को ‘अविभाजित’ भारत (1935 अधिनियम के अनुसार) का विभाजन हुआ। एक हिस्सा बना पाकिस्तान (बांग्लादेश समेत) और दूसरा भारत। विभाजन के परिणाम स्वरूप लाखों लोग भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत गए-आए। विभाजन के समय अविभाजित भारत में जन्मे बहुत से लोग अन्य देशों में भी रह रहे थे। मौजूदा भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू हो पाया।

संविधान सभा में बहस के दौरान राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि भारत में जन्में व्यक्तियों को सिर्फ जन्म के आधार पर ही नागरिकता देना उचित नहीं, भारत में जन्मे व्यक्ति के मां-बाप (दोनों या एक) का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य हो। विदेशी पर्यटक भारत में बच्चा जनेंगे तो क्या उसे भारतीय नागरिकता देना राष्ट्र हित में होगा? हमारे यहां जनसंख्या पहले ही इतनी है कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा संभव नहीं।

नागरिकता के बारे में प्रावधान किया गया कि संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी,1950) जो व्यक्ति भारत का निवासी है और (ए) जिसका जन्म भारत में हुआ था या (बी) जिसके माता या पिता भारत में जन्मे थे या (सी) जो आम तौर पर संविधान लागू होने के ठीक पिछले पांच सालों से भारत का निवासी रहा है, वो भारत का नागरिक होगा। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 5)

मतलब संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी,1950) अगर कोई व्यक्ति भारत का निवासी जो भारत में पैदा हुआ था या जिसके माता या पिता भारत में जन्मे थे या पिछले पांच साल से भारत का निवासी था, वो भारत का नागरिक था। ऐसा मान लिया गया था या समझ लिया गया था। सिद्धान्ततः भारतीय नागरिकता ‘जन्म’ और निवास के आधार पर ही तय की गई।

उदाहरण के लिए एक व्यक्ति की नाबालिग एक पुत्री का जन्म 1949 में कराची में और दूसरी का जन्म 1954 में इंदौर में हुआ था। अदालत ने माना कि दोनों बच्चे निस्संदेह (संविधान के अनुच्छेद 5 और नागरिकता अधिनियम,1955 की धारा 3 के अंतर्गत) भारत के नागरिक हैं। नाबालिग होने के कारण बच्चों द्वारा पिता के निवास को ही अपना निवास मानने का अधिकार है। (नज़ीरन बाई बनाम राज्य, ए आईआर 1957 मध्य भारत 1) संविधान के इस अनुच्छेद के अनुसार संविधान लागू होने के समय नागरिक होने के लिए, भारत का निवासी होना और भारत में जन्म लेना ही अनिवार्य शर्त है। (शांति सिंह बनाम राज्यपाल पंजाब, एआईआर 1959 पंजाब 375)

एक मार्च, 1947 के बाद पाकिस्तान चले गए व्यक्तियों की नागरिकता के बारे में प्रावधान किया गया है। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 7) बशर्ते कि जो 19 जुलाई,1948 तक स्थाई तौर पर पाकिस्तान से वापस न लौट आए हों। (नज़ीर अहमद बनाम कमिश्नर दिल्ली पुलिस, एआईआर 1959 पंजाब 261)

19 जुलाई, 1948 तक पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की नागरिकता के बारे में प्रावधान किया गया। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 6) सर्वज्ञात है कि विभाजन के बाद लाखों शरणार्थी (हिंदू-मुस्लिम) अविभाजित भारत के विभिन्न भागों से भारत आए थे और अब तक भारत के नागरिक (माने-समझे जाते रहे) हैं।

शन्नो देवी बनाम मंगल सैन (एआईआर 1961 सुप्रीमकोर्ट 58) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 26 जनवरी, 1950 से पहले भारत आए व्यक्ति को भी भारत का नागरिक माना जाएगा। मंगल सैन 1957 में जनसंघ के टिकट पर रोहतक (हरियाणा) विधान सभा से विधायक चुने गए थे। विभाजन के बाद बर्मा चले गए थे। और वहां की नागरिकता न मिलने पर लौट आए थे। शन्नो देवी ने याचिका में उनकी नागरिकता पर सवाल उठाए थे।

विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति जिनके बाप-दादा का जन्म भारत में हुआ था, वो चाहें तो भारत के नागरिक बने रह सकते हैं। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 8) अगर किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार की है, तो उसे भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 9) अगर कोई व्यक्ति अनुच्छेद 5 से 8 के अनुसार भारत का नागरिक है या मान (समझ) लिया गया है, तो ऐसा व्यक्ति भारत का नागरिक माना-समझा जाता रहेगा। (भारतीय संविधान, अनुच्छेद 10) संविधान के अनुच्छेद 5 से 10 के प्रावधान किसी भी रूप में नागरिकता सम्बंधी कानून बनाने के लिए भारतीय संसद के अधिकारों को सीमित नहीं करेंगे।

नागरिकता अधिनियम, 1955
खैर… संविधान लागू होने के लगभग पांच साल बाद बने भारतीय नागरिकता अधिनिमम, 1955 में प्रावधान किया गया कि संविधान लागू होने के बाद अगर किसी व्यक्ति का भारत में जन्म हुआ है, तो उसे भारत का नागरिक माना-समझा जाएगा। भारतीय नागरिकता अधिनियम,1955 में जनवरी, 2004 से संशोधन किया गया कि सात जुलाई, 1987 के बाद, मगर सात जनवरी, 2004 से पहले भारत में पैदा हुआ व्यक्ति भारत का नागरिक माना-समझा जाएगा, बशर्ते कि जन्म के समय उसके माता या पिता भारत के नागरिक हों।

सात जनवरी, 2004 के बाद जन्मा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा, बशर्ते कि उसके माता-पिता भारत के नागरिक हों या दोनों में से एक भारत का नागरिक हो और दूसरा ‘अवैध घुसपैठिया’ न हो। 19 जुलाई, 1948 से पहले भारत आए ‘रिफ्यूजी’ भारत के नागरिक माने गए। 26 जनवरी, 1950 से 1987 तक भारत में जन्मे बच्चे भी भारत के नागरिक हैं। 1987 के बाद जन्में बच्चे भारत के  नागरिक माने-समझे जाएंगे, अगर उनके माता-पिता में से एक भारत का नागरिक है। (नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 (1) (b) में 2004 में हुए संशोधन के अनुसार)

सात जनवरी, 2004 के बाद भारत में जन्में बच्चे भारत के नागरिक होंगे अगर उनके माता-पिता दोनों नागरिक हैं या एक नागरिक है, तो दूसरा ‘अवैध घुसपैठिया’ नहीं होना चाहिए। (नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 (1) (c) में 2004 में हुए संशोधन के अनुसार)

जन्म, मृत्यु और विवाह प्रमाण पत्र
भारतीय नागरिकता कानून को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जन्म और मृत्यु  पंजीकरण अधिनियम, 1970 में एक अप्रैल से लागू हुआ। दिल्ली में एक जुलाई, 1970 से लागू हो पाया। 1970 से पहले, जन्म या मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य नहीं था। सो, हर नागरिक के पास जन्म प्रमाण पत्र होना असंभव है।  हालांकि 1970 के बाद जन्में बहुत से नागरिकों के पास भी, जन्म प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं (होगा) है।

अधिकांश लोगों के पास अनेक दस्तावेज़ (पासपोर्ट, राशन कार्ड, आधार, पैन, ड्राइविंग लाइसेंस और…) हैं, मगर अपना या अपने मां-बाप का जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। हालांकि पासपोर्ट भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता (रहा) है, मगर वह सिर्फ ‘यात्रा दस्तावेज़’ है। मां-बाप के अफगानी नागरिक होने के संदेह पर पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं किया गया। (देखें: प्रभलीन कौर बनाम भारत सरकार, मामले में दिल्ली उच्च न्यायलय का निर्णय 3 अक्टूबर, 2018)

यहां प्रश्न यह भी है कि अपने पैदा होने या मरने की ख़बर सरकार को न देने वालों के विरुद्ध, सरकार (कांग्रेस व अन्य) ने कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की? अब पचास साल बाद पूछा जा (सकता) रहा है, “आपका नाम, बाप (मां का नहीं) का नाम! कब, कहां, किस धर्म-जाति में पैदा हुए!” अपनी ही जन्मपत्री नहीं है, तो पुरखों की जन्मपत्री कहां से आएगी? देसी-विदेशी महिला (पुरुष) से विवाह का पंजीकरण अभी तक अनिवार्य नहीं है। अनाथ और लावारिस व्यक्तियों की नागरिकता का क्या होगा? एकल या अनब्याही मांओं के बारे में भी सोचना पड़ेगा या नहीं?

चंडीगढ़ से समाचार है कि क्षेत्रीय पासपोर्ट दफ्तर ने नेपाली दिखने वाली लड़कियों को पासपोर्ट देने से पहले उनकी और उनके मां-बाप की नागरिकता की जांच के आदेश दिए हैं। पचास साल से परिवार अम्बाला में रह रहा है और लड़की का जन्म 1986-87 में हुआ बताते हैं। प्रभलीन केस में भी ऐसा ही कुछ हुआ था न!

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24 के अनुसार वकील बनने के लिए भारतीय नागरिक होना पहली शर्त है, मगर कभी किसी बार काउंसिल ने नागरिकता संबंधी दस्तावेज़ नहीं मांगा। क्या अब पंजीकरण के समय भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार नागरिक होना सिद्ध करना होगा?

अनब्याही मां के बच्चे की नागरिकता!
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1970 से लागू हुआ। 2015 में  देश की सर्वोच्च अदालत के विद्वान् न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की खंडपीठ ने ‘ऐतिहासिक फैसला’ (एबीसी बनाम दिल्ली राज्य, एआईआर 2015 सुप्रीमकोर्ट 2569, दिनांक 6 जुलाई, 2015) सुनाते हुए कहा था कि अनब्हाही मां को अपने बच्चो की संरक्षता (‘गार्जियनशिप’) के लिए, पिता की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब भी एक एकल अभिभावक या अविवाहित मां अपने बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करे, तो सिर्फ एक हलफनामा पेश किए जाने पर बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए।

सुप्रीमकोर्ट के उपरोक्त निर्णय के बावजूद जन्म प्रमाणपत्र के लिए ‘ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सिस्टम’ में अभी (दिसंबर 2019) भी बच्चे के बाप का नाम बताना अनिवार्य है। नहीं बताने (लिखने) पर रजिस्ट्रेशन संभव नहीं। हां! मां की उम्र अगर 18 साल से कम है (नाबालिग है), तो भी मौजूदा ‘सिस्टम’ सूचना स्वीकार नहीं करता। 21 दिन के बाद रजिस्ट्रेशन करवाने पर 10 रुपये रोज का हर्जाना भी देना पड़ेगा और अधिक देरी होने पर ‘एसडीएम’ के दफ्तर के चक्कर भी काटने पड़ेंगे। 2020 में भी जन्म प्रमाणपत्र लेना इतना आसान नहीं है!

धर्मनिरपेक्ष ‘हिंदूस्थान’
कहने को संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। हम भारत के लोग (नागरिक!) ऐसा ही कहते-मानते हैं। मगर अक्सर यह महसूस होता है कि आज़ादी के बाद धर्म निरपेक्ष संविधान के बावजूद, हम भारत को दरअसल ‘हिंदूस्थान’ ही बनाते रहे हैं। सब मिल कर धर्म और जाति की बेड़ियां तोड़ने की अपेक्षा, मज़बूत करते रहे हैं। भारतीय हिंदू (बौद्ध, सिक्ख, जैन) किसी हिंदू स्त्री या पुरुष (भले ही अंतर्जातीय विवाह हो) से ही विवाह करे, तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। लेकिन…!

अंतरधार्मिक विवाह को संचालित करने वाले बुनियादी कानून (विशेष विवाह कानून,1954) में प्रावधान है कि अगर कोई हिंदू (बौद्ध, सिख, जैन) किसी अन्य धर्मावलंबी से शादी रचता रचाता है, तो संयुक्त हिंदू परिवार से उसके सारे संबंध समाप्त माने समझे जाएंगे। हां! अगर संयुक्त परिवार की संपत्ति में कोई हिस्सा बनता है तो मिल जाएगा। हिंदू परिवार में ‘अधर्मी-विधर्मी’ (बहू या दामाद) का क्या काम!

भारतीय हिंदू किसी हिंदू बच्चे को ही गोद ले, तो भी भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। लेकिन…. किसी और धर्म का बच्चा गोद नहीं ले सकता। (हिंदू दत्तकता अधिनियम, 1956) अनुसूचित जाति के नागरिक जब तक हिंदू (बौद्ध, सिक्ख) बने रहेंगे, तो ‘आरक्षण का लाभ’ मिलता रहेगा और मानना पड़ेगा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन… किसी अन्य धर्म को स्वीकार करेंगे तो आरक्षण समाप्त। आरक्षण चाहिए तो बने रहो दलित और बनाए-बचाए रहो हिंदू बहुमत (बाहूमत)।

अनुसूचित जनजाति के सदस्य हिंदू माने-समझे जाते हैं, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। लेकिन… हिंदू विवाह, दत्तकता और अन्य हिंदू कानून उन पर लागू नहीं होते। इसी तर्ज पर अगर मुस्लिम शरणार्थियों पर नागरिकता संशोधन अधिनियम (2019) लागू नहीं होता तो भी भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है… रहेगा। ‘धर्मांतरण’ के प्रायः सभी वैधानिक रास्ते बंद (किए जा चुके) हैं। हां! कहना कठिन है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में ‘नास्तिकों’ की वैधानिक स्थिति क्या है (होगी)! हर मुद्दे पर ‘सुप्रीमकोर्ट का फैसला सर्वमान्य’ है…. होगा और यही है ‘धर्मनिरपेक्षता’ की भाषा-परिभाषा…अर्थ (अनर्थ)!

ऐसे दहशतज़दा माहौल में फिलहाल तो यही लगता है कि इस मुद्दे पर समय रहते विचार-पुनर्विचार या गंभीर चिंतन के तमाम रास्ते खोलने की जरूरत है, न कि जानबूझ कर बंद करने की। रास्ता भटक जाएं तो ‘यू टर्न’ लेकर लौटना ही बेहतर (लाज़िम) है।

अरविंद जैन

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

This post was last modified on January 31, 2020 12:01 pm

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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