कांग्रेस में माझा के सेनापति को बदलने की तैयारी

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गुरदासपुर। पंजाब कांग्रेस के दो सत्ता केंद्रों में अब अंतिम रण की सीमाएं खिंचने लगी हैं। जिस प्रकार आलाकमान के अट्ठारह सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने के नाम पर कैप्टन अमरेंद्र सिंह द्वारा एक एक मुद्दे को शुरू करने के नाम पर नई फाइलों में पुराने कागजों का तबादला करके कार्रवाई की जा रही है। दूसरी तरफ कभी चिट्ठी देने व कभी ट्विटर के माध्यम से नवजोत सिंह सिद्धू उन्हें काम करने का नोटिस दे रहे हैं उससे लग रहा है जैसे जैसे समय गुजरता जाएगा वैसे वैसे दोनों खेमों में कुलबुलाहट बढ़ती ही चली जाएगी।

कांग्रेस के हाल में हुए टकराव का सबसे बड़ा केंद्र पच्चीस विधानसभा हलकों वाला व रावी तथा व्यास दरिया के मध्य वाला इलाका माझा बना था। लगता है कि आगामी युद्ध की लड़ाई का रण भी माझा ही बनेगा। माझा में कांग्रेस के चल रहे आपसी महाभारत में सेनापति बदलने के तगड़े संकेत मिलने लगे हैं। दो खेमों में बंटी कांग्रेस जिनमें एक धड़े के पास पार्टी की सरदारी यानि प्रधानगी है व दूसरे के पास सरकार है। अब प्रधान नवजोत सिद्धू व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की आपसी जंग की पहली भिड़ंत का गवाह बनने वाला है माझा। वैसे माझा में जरनैलों की हमेशा तूती बोलती रहती है वो चाहे अकाली राजनीति में हों या कांग्रेस की सियासत में हर दबंग नेता की ये ख्वाहिश तो रहती ही है कि मीडिया वाले उसके बारे में लिखते समय माझा का जरनैल वाला अलंकार जरूर लगाएं।

कैप्टन के सुर में सुर मिला कर साढ़े चार साल तक महाराजा के कैबिनेट में नित्त ढोले दियां लाऊंदे रहे (अपने मन की मौज के हिसाब से काम करते रहे) तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, सुखसरकारिया व सुक्खी रंधावा के राजयोग को राहू इसलिए टेढ़ा होकर देखता प्रतीत हो रहा है क्योंकि इन तीनों ने मुश्किल की घड़ी में महाराजा को टेढ़ी आंखों से देखने की गुस्ताखी कर दी थी। सो मंत्रिमंडल में फेरबदल का समय सिर पर है और उससे पहले माझा के इस कुरुक्षेत्र में पहले दौर की हलकी गोलीबारी में बटाला के इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन कस्तूरी लाल सेठ की बलि लेकर पवन कुमार पम्मा की नये चेयरमैन की नियुक्ति कर ये साफ संकेत दिया है कि जो साथ नहीं वो खिलाफ है। उल्लेखनीय है कि जिस प्रधान को उतारा गया है वो पंचायत मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा का खास था।

चूंकि तृप्त बाजवा का चुनावी क्षेत्र फतेहगढ़ चूढ़ियां है पर साढ़े चार साल में कोई भाग्यों वाला दिन ही होगा जब बाजवा अपने हलके में गए हों। वे शुरु से ही अपना विधानसभा क्षेत्र बटाला को ही मान कर चल रहे थे और कैप्टन का आशीर्वाद था सो अपनी टीम बनाने के उद्देश्य से बाजवा ने अपने मतलब का चेयरमैन लगवा लिया था ताकि चुनावी दौर में लाभ मिल सके। अब परिस्थितियां बदल गई हैं। पहली बात बटाला सीट से 2017 में बहुत ही नाममात्र अंतर से हारे कांग्रेसी अश्विनी सेखड़ी जो लगभग साढ़े चार साल नजरंदाज रहे, उन्होंने बदलती परिस्थितियां भांप कर दबाव की राजनीति का हथियार अपनाया। कैप्टन को भी भूले बिसरे गीतों की तरह सेखड़ी याद आ गए। उन्होंने एक बोर्ड का चेयरमैन बना कर व अगली बार का टिकट बटाला से ही देने का आश्वासन देकर तृप्त के पैरों तले की जमीन को हिला दिया। इस खेल में ये जानना भी दिलचस्प रहेगा कि नया चेयरमैन बनाया गया शख्स असल में प्रताप सिंह बाजवा का है।

इसका अर्थ क्या निकलता है। बड़ा सीधा सा अर्थ है कि माझा के तीन ताकतवर मंत्रियों को यदि कैप्टन ड्राप करना चाहते हैं तो एक हैवीवेट को तो साथ में रखना ही पड़ेगा, और प्रताप सिंह बाजवा से बड़ा माझा का हैवीवेट कांग्रेसी यदि कोई दूसरा हो तो मैं समझता हूं कि उसका नाम बताने वाला सज्जन मेरा राजनीतिक ज्ञानवर्धन करेगा। परिस्थितियां ऐसी दिखाई पड़ रही हैं कि प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लगने में लगभग पांच महीने बचे हैं। इन हालात में राज्यसभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा को यदि कैप्टन कैबिनेट में नंबर दो या फिर उप—मुख्यमंत्री बना देते हैं तो माझा एक्सप्रेस में बदलाव का संतुलन साधा जा सकता है। हम मई से लिख रहे हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की परिस्थितियां जो भी रहें पर उसमें प्रताप सिंह बाजवा 9 का पहाड़ा तो बनेंगे ही। याद रहे कि नौ के अंक को जिस अंक से भी गुणा कर लें, जवाब नौ ही मिलेगा।

(पंजाब से वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन शर्मा की रिपोर्ट।)

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