Friday, December 3, 2021

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कांग्रेस ने ट्विटर इंडिया को पत्र लिखकर 11 भाजपा नेताओं के ट्वीट पर ‘मैनिपुलेटेड मीडिया’ टैग लगाने की मांग की

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टूलकिट मामले में आज कांग्रेस ने ट्विटर इंडिया को पत्र लिखकर ग्यारह भाजपा नेताओं की पोस्ट पर ‘मैनीपुलेटेड मीडिया’ टैगिंग करने की मांग की है। कांग्रेस ने ये चिट्ठी ट्विटर की लीगल हेड विजया गड्डे और लीगल डिपार्टमेंट के वाइस प्रेसिडेंट जिम बेकर को लिखा है। कल सुबह ट्विटर इंडिया को भेजे गये दिल्ली पुलिस की नोटिस और रात में छापेमारी के बाद अमेरिका स्थित ट्विटर हेडक्वार्टर ने मामला जिम बेकर को ही सौंपा है।

कांग्रेस की ओर से पत्र में लिखा गया है कि हमने पहले भी आपको फर्जी टूलकिट के बारे में जानकारी दी थी, जिसे कुछ भाजपा नेताओं ने गलत तरीके से सियासी फायदा उठाने के लिए बनाया है। ये नेता अपने ट्विटर हैंडल से कांग्रेस और उसके लीडर्स के ख़िलाफ़ झूठी, मनगढ़ंत और ख़तरनाक जानकारियां फैला रहे हैं। हमने 25 मई को भेजी चिट्ठी में आपको बताया था कि मोदी सरकार के कुछ मंत्री अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल्स से ये साजिश रच रहे हैं।

कांग्रेस ने पत्र में आगे कहा है कि आपने हमसे इन ट्वीट्स के यूआरएल और अन्य चीजें मांगी थीं। इन नेताओं द्वारा 18 मई को किए गए इन ट्वीट्स का लिंक हम आपको भेज रहे हैं। ये गलत नीयत से किये गये थे और पूरे भारत में झूठ और प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए ट्विटर के सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। कांग्रेस ने ग्यारह भाजपा नेताओं के ट्वीट भी ट्विटर के लीगल डिपार्टमेंट को भेजे हैं और कहा है कि इन नेताओं पर एक्शन लिया जाए।

कांग्रेस की ओर से पत्र में आगे कहा गया है कि #CongressToolkitExposed हैशटैग के साथ भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पोस्ट की थी। इसी तरह अन्य नेताओं ने भी पोस्ट की, जिसे ट्विटर ने मैनीपुलेटेड मीडिया की-वर्ड से टैग किया है। पात्रा के खिलाफ छत्तीसगढ़ के रायपुर में इसी मामले को लेकर केस भी दर्ज किया गया है। अगर कोई केंद्रीय मंत्री अपने अकाउंट से ऐसी जानकारियां शेयर करता है तो लोग उसे सही ही मानेंगे।

पूरे मामले में कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि ऐसे में इस तरह के सभी अकाउंट से किए गये ट्वीट को मैनीपुलेटेड मीडिया घोषित करना ज़रूरी हो जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि हमने फर्जी टूलकिट को लेकर जिन अकाउंट्स का जिक्र किया है, उन पर भी वैसा ही एक्शन लिया जाएगा, जैसा एक्शन ट्विटर के प्लेटफार्म के गलत इस्तेमाल किए जाने पर लिया जाता रहा है।

छापेमारी के बाद एक्टिव हुआ ट्विटर का अमेरिकी हेडक्वार्टर

टूलकिट केस में कल दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा ट्विटर इंडिया के दफ़्तर को भेजे नोटिस और छापेमारी के बाद ट्विटर कंपनी का अमेरिकी हेडक्वार्टर एक्टिव हो गया है। ट्विटर ने अपने ग्लोबल डिप्टी जनरल काउंसिल और लीगल वीपी जिम बेकर को ये मामला सौंपा है। बता दें कि जिम बेकर अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई में भी काम कर चुके हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक टूलकिट मामले को लेकर ट्विटर यूएसए की सरकार के पास भी जा सकती है। गौरतलब है कि अमेरिकी हेडक्वार्टर ने इस मामले में दखल दिया है। ट्विटर हेडक्वार्टर लगातार भारत स्थित दफ्तर के संपर्क में है।

किसान आंदोलन के बाद से ही ट्विटर मोदी सरकार के निशाने पर
किसान आंदोलन के समय मोदी सरकार के खिलाफ़ चलाये गये हैशटैग वाले सबी एकाउंट को बंद न करने और 18 मई को भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के ट्वीट को ‘मैनीपुलेटेड मीडिया’ (तोड़-मरोड़कर पेश किया गया मीडिया) टैग करने के बाद से ही ट्विटर केंद्र सरकार के निशाने पर है। कल शाम दिल्ली पुलिस टूलकिट जांच को लेकर ट्विटर के दिल्ली और गुड़गांव स्थित दफ्तरों पर छापेमारी की गयी।

वहीं टूलकिट और मैनीपुलेटेड मीडिया मामले की जांच कर रही दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का कहना है कि हम जिस शिक़ायत की जांच कर रहे हैं, उसमें हमें ट्विटर का स्पष्टीकरण चाहिए। ट्विटर के पास कुछ जानकारियां है, जो हमें नहीं पता हैं। ट्विटर इन्हें क्लासीफाइड बता रहा है, लेकिन हमारी जांच के लिए ये जरूरी हैं। हम सच जानना चाहते हैं।

नई गाइडलाइंस लागू करने की डेडलाइन आज खत्म

किसान आंदोलन के समय नरेंद्र मोदी के निर्दोशों को न मानकर भारत के संविधान और अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में केंद्र सरकार के खिलाफ़ ट्विटर के तनकर खड़े होने के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नकेल लगाने के लिये 25 फरवरी 2021 को एक गाइडलाइन जारी करते हुये इन्हें 3 महीने में लागू करने का डेडलाइन तय किया था। ये डेडलाइन आज 25 मई मंगलवार की रात 12 बजे खत्म हो रही है। बता दें कि ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने केंद्र सरकार को अब तक नहीं सूचित किया है कि गाइडलाइंस को लागू किया गया या नहीं। ऐसे में सरकार इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकती है।

दक्षिणपंथी नस्लवादी विचारधारा के पक्ष में हरदम खड़ा रहने वाले फेसबुक द्वारा केंद्र सरकार को बताया गया कि वह आईटी के नियमों का पालन करेगी। साथ ही कुछ मुद्दों पर सरकार से बातचीत जारी रखेगी। फेसबुक ने यह भी कहा है कि आईटी के नियमों के मुताबिक ऑपरेशनल प्रोसेस लागू करने और एफिशिएंसी बढ़ाने पर काम जारी है। कंपनी इस बात का ध्यान रखेगी कि लोग आज़ादी से और सुरक्षित तरीके से अपनी बात फेसबुक प्लेटफॉर्म के जरिए कह सकें।

सोशल मीडिया पर नकेल लगाने वाली केंद्र सरकार की नयी गाइडलाइंस में क्या है

केंद्र सरकार की गाइडलाइंस के मुताबिक सभी सोशल मीडिया संस्थान भारत में अपने 3 अधिकारियों, चीफ कॉम्प्लियांस अफसर, नोडल कॉन्टेक्ट पर्सन और रेसिडेंट ग्रेवांस अफसर नियुक्त करें। ये भारत में ही रहते हों। इनके कॉन्टेक्ट नंबर ऐप और वेबसाइट पर पब्लिश किये जायें।

नयी गाइडलाइंस के मुताबिक सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सरकार को बतायें कि शिक़ायत दर्ज़ करवाने की व्यवस्था क्या है। अधिकारी शिकायत पर 24 घंटे के भीतर ध्यान दें और 15 दिन के भीतर शिक़ायत करने वाले को बतायें कि उसकी शिक़ायत पर क्या कार्रवाई किया गया और अगर कार्रवाई नहीं किया गया तो क्यों नहीं किया गया।

नरेंद्र मोदी सरकार की नयी गाइडलाइंस के मुताबिक सभी सोशल मीडिया संस्थान ऑटोमेटेड टूल्स और तकनीक के जरिए ऐसा सिस्टम बनाएं, जिसके जरिए रेप, बाल यौन शोषण के कंटेंट की पहचान करें। इसके अलावा इन पर ऐसी इन्फार्मेशन की भी पहचान करें, जिसे पहले प्लेटफॉर्म से हटाया गया हो। इन टूल्स के काम करने का रिव्यू करने और इस पर नजर रखने के लिए भी पर्याप्त स्टाफ हो।

सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक मंथली रिपोर्ट पब्लिश करें। इसमें महीने में आई शिकायतों, उन पर लिए गए एक्शन की जानकारी हो। जो लिंक और कंटेंट हटाया गया हो, उसकी जानकारी दी गई हो।

और सबसे आखिरी बात कि अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किसी आपत्तिजनक जानकारी को हटाता है तो उसे पहले इस कंटेंट को बनाने वाले, अपलोड करने वाले या शेयर करने वाले को इसकी जानकारी देनी होगी। इसका कारण भी बताना होगा। यूजर को प्लेटफॉर्म के एक्शन के ख़िलाफ़ अपील करने का भी मौका दिया जाए। इन विवादों को निपटाने के मैकेनिज्म पर ग्रेवांस अफसर लगातार नज़र रखें।

अब क्या करेगी सरकार?
डेडलाइन खत्म होने तक किसी भी सोशल मीडिया का जवाब नहीं आता है तो सरकार इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होगी। यदि सरकार के बनाये नये नियमों का पालन नहीं होता है तो सरकार इन सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स को दी हुई इम्युनिटी वापस ले सकती है। गौरतलब है कि इम्युनिटी के तहत सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स का रोल भारत में मध्यस्थ यानी बिचौलिए के तौर पर दर्ज़ है। इसके मायने यह हैं कि अगर कोई यूजर किसी पोस्ट को लेकर कोर्ट जाना चाहे तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अदालत में पार्टी नहीं बनाया जा सकता है। लेकिन अगर सरकार इम्युनिटी हटा लेगी तो इन सोशल मीडिया प्लेटफार्म को भी कोर्ट में पार्टी बनाया जा सकता है। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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