Friday, January 27, 2023

होली के दिन हरियाणा में दलित उत्पीड़न! जाट युवकों ने गाली-गलौच के साथ मिर्चपुर दोहराने की दी धमकी

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बधावड़ (हरियाणा)। हरियाणा जहां दलित उत्पीड़न की घटनाएं ऐसे घटती हैं जैसे आप कपड़े बदलते हों। मिर्चपुर, भगाना, भाटला, डाबड़ा, मिरकां, छातर अनेक ऐसे गांव हैं जहां दलित उत्पीड़न की घटनाएं हुईं लेकिन उनको इंसाफ नहीं मिला। ये सब इंसाफ के लिए या तो धरना लगाए हुए हैं या अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। दलित उत्पीड़न की घटनाएं आगे से आगे बढ़ती जाती हैं। इन गांवों की सूची में नया नाम जुड़ता जाता है। अब एक नया नाम जुड़ा है बधावड़।

बधावड़ बरवाला उपमंडल का गांव है, जिसकी बरवाला से दूरी 10 किलोमीटर, बरवाला से जींद रोड पर स्थित है। बधावड़ गांव बरवाला के पूर्व-उत्तर दिशा में है। हिसार से भी उसकी दूरी 40 किलोमीटर है। गांव में जाट समुदाय बहुमत में है। जिनके पास खेती की जमीन है। दलित जातियों में चमार, वाल्मीक, धानक हैं जिनके पास खेती की जमीन तो छोड़िए गोबर डालने तक कि जगह नहीं है। दलितों में सरकारी नौकरी भी नाम मात्र है। अधिकांश दलित मजदूरी करते हैं।

होली से अगले दिन फ़ाग का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग आपस में रंग लगाकर व पानी डालकर इस त्यौहार को मनाते हैं। हरियाणा में महिला को उसका देवर पानी से भिगोता है महिला अपने देवर को कोड़े (कपड़े को लपेट कर बनाई गई रस्सी) से पीटती है। बधावड़ गांव में भी सभी जातियों के लोग ये त्यौहार मना रहे थे। दलित समुदाय के मोहल्ले में महिलाएं एवं पुरुष फ़ाग का त्यौहार मना रहे थे। तभी जाट समुदाय के कुछ लड़के वहां अर्धनग्न होकर तांडव करने लगे एवं जातिसूचक गालियां देने लगे।

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गांव के बच्चे।

जनचौक की टीम अगले दिन ही गांव में पहुंची। टीम ने पीड़ितों से मुलाकात की और उनसे पूरी घटना जानने की कोशिश की।

गांव की दलित बस्ती में जब हम पहुंचे तो सभी पुरुष, महिला, बच्चे इकठ्ठे हो गए। हमने उनको जब बताया कि हम मीडिया से हैं तो उनको थोड़ा हौसला आया। उसके बाद उन्होंने हमको बताना शुरू किया।

एक बुजर्ग महिला जिनका नाम निर्मला है, ने बताया कि हमारे बेटे व बहुयें इस गली में फ़ाग खेल रहे थे। गली की चौड़ाई बमुश्किल 8 फिट होगी। वो तीन लड़के स्कूटी लेकर बार-बार उस गली से आ-जा रहे थे। जबकि ये गली गांव की आम गली नहीं है। तीनों लड़के शराब पिये हुए थे और बार-बार स्कूटी का हॉर्न बजा रहे थे। वो तीनों जान-बूझ कर फ़ाग खेलने वालों को परेशान कर रहे थे। जब मोहल्ले के एक लड़के ने उन तीनों लड़कों से कहा कि बार-बार इधर से स्कूटी क्यों ला रहे हो। मोहल्ले के लड़के के इतना कहते ही उन तीनों लड़कों ने उस लड़के को गालियां देनी शुरू कर दी और उससे हाथापाई करने लग गए। उन लोगों ने 4-5 अपने और साथियों को भी बुला लिया। मोहल्ले के लोग डर गए क्योंकि गाली-गलौच करने वाले लड़के अपराधी किस्म के हैं।

उस दिन फ़ाग खेल रही नौजवान महिला रेखा ने बताया कि हम फाग खेल रहे थे। लेकिन इन लड़कों को जलन हो रही थी कि दलित लोग कैसे फ़ाग खेल सकते हैं। इसलिए वो बार-बार झगड़े की नीयत से वहां से स्कूटी लेकर गुजर रहे थे। उन्होंने हमें जातिसूचक गालियां दीं। वो हमारे मोहल्ले में अर्धनग्न होकर तांडव कर रहे थे। वो मां-बहन की गलियां दे रहे थे।

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गांव की गली जिसमें घटना हुई

मोहल्ले में मौजूद कविता ने बताया कि वो लड़के पहली बार झगड़ा करने के बाद चले गए। उसके बाद वो दोबारा आये उनके पास डंडा व हथियार (साइकिल के चांद के उन्होंने लोहे की रॉड लगवाई हुई) थे।

उन्होंने मिर्चपुर कांड दोहराने की बात कही, वो जोर-जोर से बोल रहे थे कि तुम्हारी लड़कियों को उठा लेंगे। बच्चों को स्कूल भेज कर दिखाना, उन्होंने नौजवान लड़कों को भी चेतावनी देते हुए गांव के बस स्टैंड पर मिलने या गांव से बाहर मिलने को कहा, बाहर मिलना सीधी धमकी थी।

यह पूछे जाने पर कि आप लोगों ने जो तादाद में बहुत ज्यादा हैं उनका विरोध या पिटाई क्यों नहीं की तो एक नवयुवक आनन्द ने कहा कि ये अपराधी किस्म के लड़के हैं। इन्होंने इससे पहले भी अलग-अलग मोहल्ले के लड़कों की पिटाई की है। हम गरीब लोग हैं, हम जातीय स्तर पर गांव में अल्पसंख्यक हैं। ये जिस जाति से हैं उसका गांव में बहुमत है। वैसे भी आर्थिक संसाधनों पर उनकी जाति का ही कब्जा है। इनके पास खेती की जमीन है हमारे पास खेती की जमीन तो छोड़िए गोबर डालने तक कि जमीन नहीं है। ये बार-बार धमकी देते हैं कि हमारा क्या बिगड़ेगा हम जमीन बेच कर पैसा कोर्ट-पुलिस में लगा देंगे। हमारी पुलिस से भी सेटिंग है। हमारी राजनीति में भी सेटिंग है।

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स्कूटर जिससे जाट युवक कर रहे थे धमाल

जब हमने सवाल किया कि पंचायत के पास जमीन कितनी है। तो एक बुजर्ग ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि गांव के पास 50-60 एकड़ जमीन खेती के लिए थी। लेकिन 10 एकड़ गांव ने गऊशाला को दी हुई है। लोगों ने 40 एकड़ के आस-पास जमीन यहां एक तेल ऑयल का डिपो लगा था उसको बेच दी। अब गांव के पास 9 एकड़ के लगभग जमीन बची है। लेकिन अब भी उस जमीन को गांव के जाट ही खेती के लिए पंचायत से किराए पर लेते हैं।    

बुजुर्ग समेत लगभग सभी ने बताया कि वैसे तो गांव में माहौल ठीक है, लेकिन ये लड़के हैं बार गड़बड़ करते हैं। जो बोलता है उसको पीटते हैं। जब इनकी शिकायत करते हैं तो गांव का पंचायती फैसला गांव में करने का दबाव बना देते हैं। ये लड़के कभी भी अपनी जाति वाले मोहल्लों में हुड़दंग करने नहीं जाते क्योकि वहां इनको पिटने का डर रहता है लेकिन हम दलित गरीब लोग हैं इसलिए ये यहां हुड़दंग करने बार-बार आते हैं। हमारे यहां किसी की शादी भी हो तो ये डीजे पर आकर हुड़दंग करने लगते हैं। जब विरोध करें तो लड़ाई कर लेते हैं और बाहर कहीं मिलने की धमकी देते हैं।

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गांव में पहुंची पुलिस लोगों से पूछताछ करती हुई

जब टीम गांव में पीड़ितों से बात कर रही थी उसी समय उप पुलिस अधीक्षक रोहतास सिंह भी वहां आ चुके थे। DSP ने पीड़ितों से मामले की पूरी जानकारी ली। गांव में एक PCR की ड्यूटी लगा दी गयी है। लेकिन DSP इस मसले पर चुप हैं कि गांव में उस दिन बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस घटना के एक घण्टे बाद क्यों पहुंची। पुलिस जो मुस्तैद रहने का दावा करती है वो फोन करने के बाद भी 1 घण्टे तक नहीं पहुंचती है। क्यों पुलिस का हर जगह ऐसा रवैया रहता है? क्यों पुलिस हर जगह सवर्ण जातियों के साथ खड़ी मिलती है?

गांव में पंचायत से जुड़े लोग एक बार फिर से पंचायती समझौता करवाने के लिए पीड़ितों पर दबाव बना रहे हैं। समझौते के लिए गांव के भाईचारे की, गांव की संस्कृति की दुहाइयां दी जा रही हैं।

लेकिन सवाल एक बार फिर वही है। आरोपियों को ये हौसला कहां से आता है कि वो दलितों की बस्तियों में जाकर, अर्धनग्न होकर तांडव करते हैं, उनकी लड़कियों को उठाने की धमकियां देते हैं, उनको जातिसूचक गालियां देते हैं। मिर्चपुर कांड करने की धमकी हर उस गांव में दी जाती है जहां दलित उत्पीड़न की घटना होती है?

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गांव के पुरुष और महिलाओं में घटना को लेकर बेहद रोष है

अगर सरकार व हरियाणा के लोग मिर्चपुर गांव की घटना (जिसमें दलितों के घर जला दिए गए थे। एक पांव से विकलांग लड़की व उसके अंधे पिता को जिंदा जला दिया गया था) पर आरोपियों को सजा दी जाती तो हर गांव में कोई मिर्चपुर कांड दोहराने की बात नहीं करता।

हरियाणा के लगभग सभी गांवों में दलित भूमिहीन हैं। ये भी सच्चाई है कि उनके पास जमीनें होतीं तो उनका ये उत्पीड़न भी नहीं होता। पंचायतों की जमीन को सरकार 33% दलितों के लिए आरक्षित रखती है लेकिन कागज जरूर दलित का लगता है, खेती गांव की सवर्ण जातियां ही करती हैं।

(हरियाणा के बधावड़ से उदय चे की रिपोर्ट।)

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