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रवीना ने दिल्ली में बच्चा खोया और आजमगढ़ में पति, दलित युवक की मौत संदिग्ध

लखनऊ/आजमगढ़। दिल्ली से आजमगढ़ आए एक दलित युवक की संदिग्ध परिस्थितियों में पेड़ से लटकी हुई लाश पायी गयी है। परिजन उसे हत्या का मामला बता रहे हैं जबकि पुलिस प्रशासन ने आत्महत्या बता कर उसका आनन-फानन में अंतिम संस्कार कर दिया। घटना जिले के धड़नी ताजनपुर गांव की है। इसको लेकर इलाके में तनाव है।

रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ गांव का दौरा कर मजदूर के परिजनों से मुलाकात की। इसके साथ ही उन्होेंने प्रशासन से मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

रिहाई मंच महासचिव ने कहा कि दिल्ली से आज़मगढ़ लौटे दलित प्रवासी मजदूर अंगद राम की मौत के कारणों की उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए। यह मानवाधिकार का गंभीर मसला है क्योंकि कोरोना महामारी के दौर में प्रवासी मजदूर बहुत मुश्किल से अपने घरों को पहुंचे हैं और वहां पर अगर उनकी हत्या कर आत्महत्या कहा जा रहा है तो ऐसे में यह आने वाले दिनों में गंभीर संकट खड़ा कर देगा। इस मामले में अब तक न परिजनों से किसी प्रकार का पुलिस ने बयान लिया और न ही उनके आरोपों के आधार पर शिकायत दर्ज की। ऐसे में गावों के दबंगों का मनोबल बढ़ेगा जिससे प्रवासी मजदूर के परिवारों को डर-भय के साए में जीना होगा। क्योंकि प्रवासी मजदूर का गांवों में वो सामाजिक आधार नहीं जो इस प्रकार के दबंगों का है।

दरअसल अंगद राम की पेड़ पर टंगे शव की फोटो को लेकर बहुत से सवाल हैं जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं और उनको अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्योंकि इंसान तो झूठ बोल सकता है लेकिन मौके की परिस्थितियां नहीं। मामले से जुड़े ऐसे साक्ष्यों के बारे में परिवार बताता है जिससे पहली नजर में ही लग जाता है कि उन्हें मारकर पेड़ पर टांग दिया गया। फोटो में साफ देखा जा सकता है कि चप्पल अंगद के पैरों में उसी तरह से बनी रही जैसी कि वह पहले थी। वैसे भी कोई व्यक्ति अगर फांसी लगाएगा तो तड़पेगा और छटपटाएगा ऐसे में चप्पल उसके पैर में नहीं टिक सकती। पेड़ पर चढ़ने के गीली मिट्टी के जो निशान हैं वो पैरों के बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह कैसे हो सकता है क्योंकि उसके पैरों में चप्पल मौजूद थी। क्या ऐसा हुआ होगा कि वो चप्पल निकालकर पेड़ पर चढ़ा होगा और फिर फांसी लगाते वक्त चप्पल पहना होगा।

वहीं जिस नींबू के पेड़ पर उसको टंगा हुआ बताया जा रहा है उसमें उसका पैर वहां मौजूद पुलिस के कमर के करीब दिख रहा है जो जमीन से लगभग तीन फुट के करीब है। नीचे ऐसे कोई निशान नहीं हैं जिससे यह कहा जाए कि वह किसी सहारे पर खड़ा होकर फांसी लगाया होगा। नींबू का वह पेड़ झंखाड़़ युक्त है जिसकी डालें पतली-पतली और काफी सघन हैं। ऐसे में उस पर चढ़ना और फिर उस पर से फांसी लगाना संभव प्रतीत नहीं होता। वहीं उसकी शारीरिक स्थिति भी परिजनों की आशंका को और पुष्ट करती है। परिजनों का फंदे में लटकी उसके गर्दन की स्थिति और हाथों की स्थिति पर भी सवाल है।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल बांकेलाल, विनोद यादव, अवधेश यादव और धर्मेंद्र को पच्चीस वर्षीय अंगद राम की पत्नी रवीना ने बताया कि उनके पति नई दिल्ली में जीटीबी अस्पताल की कैंटीन में नौकरी करते थे। पहले वे ताहिरपुर गांव दिल्ली में रहते थे पर कमरे का किराया काफी ज्यादा था तो वे गाजियाबाद के डिस्टेंस कालोनी भोपरा में रहने लगे और अंगद वहां से नौकरी पर जाने लगे। लाॅक डाउन में काम बंद हो गया था। रवीना गर्भवती थी 10 अप्रैल को बच्चा मरा पैदा हुआ। वहां न खाने की कोई व्यवस्था थी न चिकित्सा की। अल्ट्रासाउंड में ग्यारह-ग्यारह सौ रुपए लग जाते थे। पैसे खत्म होने के बाद रवीना अपनी मां के यहां से पैसे मंगाए और दिल्ली से आजमगढ़ ट्रेन के जरिये आ गयी। उसके साथ उसका पति भी था।

रवीना पति की आत्महत्या की पूरी कहानी को न सिर्फ नकारती हैं बल्कि कहती हैं कि उनकी हत्या हुई है। वे बताती हैं कि उनके पति राजेसुल्तानपुर अपने मौसी के घर गए हुए थे और 5 जून की शाम 6 बजे के करीब घर से लौटकर आए। लेकिन उन्होंने चाय तक नहीं पी और कहा कि प्रधान जी बुला रहे हैं मैं मिलकर आता हूं।

रात आठ बजे के करीब उनकी माता विमलौता पता करने प्रधान के घर गईं तो प्रधान घर पर नहीं थे। अंधेरा होने के बाद भी जब वह नहीं लौटकर आए तो घर वाले चिंतित होकर ढूंढने निकले। अगले दिन 6 जून की सुबह घर के लोग खेत में काम कर रहे थे कि सुबह के तकरीबन नौ बजे गांव के एक लड़के ने सूचना दी कि अंगद की लाश नींबू के पेड़ पर लटक रही है। जिसके बाद पूरा परिवार दौड़ते हुए वहां पहुंचा तो पहले से मौजूद प्रधान ने उन्हें घटना स्थल तक जाने नहीं दिया।

अंगद की मां विमलौता के मुताबिक पुलिस बेटे के शव को देखने ही नहीं दिया। उनका बड़ा बेटा राजेश आजमगढ़़ शहर में काम करता है। उन्होंने कहा कि उसको तो आ जाने दीजिए। पर पुलिस आनन-फानन में लाश को लेकर आजमगढ़ चली गई।

मीडिया में आई उस खबर को अंगद की पत्नी ने झूठ करार दिया जिसमें एक माह पूर्व विषाक्त पदार्थ का सेवन कर आत्महत्या के प्रयास की बात कही गयी थी। अंगद की पत्नी का कहना है कि हम लोग 19 मई को गाजियाबाद से श्रमिक ट्रेन द्वारा चले और 20 मई को आजमगढ़ के सरायमीर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। उसके बाद बस द्वारा सठियांव पहुंच कर वहां के कोरेनटाइन सेंटर में रात गुजारी और अगले दिन घर आए और 13 दिन तक घर के सामने की मड़ई में रहे। अचानक हुई बारिश के बाद उन्हें घर के अंदर दाखिल होना पड़ा।

अंगद की मां बताती हैं कि उनके बेटे-बहू दिल्ली से आए तो बहुत खुश थे। हों भी क्यों न इस महामारी में हर आदमी अपने परिवार में रहना चाहता है। मीडिया में आई बातों को परिजनों ने प्रधान की मनगढ़ंत कहानी बताया। उनकी मां बताती हैं कि जमीन विवाद के चलते पड़ोसी ने कई बार उनके बेटों को जान से मारने की धमकी दी थी।

उनका बेटा प्रधान के बुलावे पर गया था और उसके बाद गायब हो गया और जब मिला तो उसकी लाश मिली। साथ ही वो कहती हैं कि प्रधान कह रहे हैं कि उनके बेटे ने सुबह के आठ बजे फांसी लगाई यह उन्हें कैसे मालूम है। क्या वो घटना स्थल पर मौजूद थे। अगर उन्हें मालूम था तो बचाया क्यों नहीं। हमको उसकी मौत की खबर नौ बजे के करीब मिली जबकि घटना स्थल से उनके घर की दूरी पांच मिनट की भी नहीं है।

मंच ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, राज्यपाल उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, राज्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, गृह मंत्रालय, उत्तर प्रदेश, राज्य मानवाधिकार आयोग, उत्तर प्रदेश, आयुक्त आजमगढ़ मंडल आजमगढ़, उप पुलिस महानिरीक्षिक आजमगढ़ परिक्षेत्र आजमगढ़, जिलाधिकारी आजमगढ़, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आजमगढ़, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, नई दिल्ली, श्रम एवं सेवायोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

This post was last modified on June 13, 2020 4:41 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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