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Monday, September 27, 2021

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थम गईं उंगलियां तो बेजान हो जाएंगी कठपुतलियां!

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वाराणसी। वृद्ध इमरती की उंगलियों में कठपुतलियों की जान बसती है। 72 साल के इमरती जब अपनी उंगलियों को नचाते हैं तो कठपुतली के नाचने के साथ ही लोक कला की मरती दुनिया का सच सामने आ जाता है जिसके एक सिरे पर Kite Maker के पतंग बनाने वाले महमूद अपने दर्द और तन्हाई के  साथ बैठे मिलते हैं जिन्हें इस बात की चिंता थी कि उनके दुनिया से खुदा हाफ़िज़ होने के बाद ये हुनर भी खत्म हो जाएगा। महमूद की उसी पीड़ा की डोर इमरती की उंगलियों से होकर कठपुतलियों को नचाती तो है लेकिन साथ में बोल उठती है “हम जब गुजर जाएंगे तो कोई और इसे कर नहीं सकता” क्योंकि इस हुनर को सीखने में उसके बच्चे लजाते हैं वो कठपुतलियों को छूना नहीं चाहते।

कंधे पर झोला और हाथ कठपुतली थामे इमरती बनारस की गलियों में घूमते रहते हैं। कोई देखवार मिल जाए तो कठपुतली भी नाच लेंगी और जिंदा रहने के लिए रोटी भी मिल जाएगी। 

मिर्जापुर के रहने वाले इमरती पिछले 50 सालों सालों से कठपुतलियों का करतब दिखाते आ रहे हैं। पहले लोग बुलाकर देखते थे और अब वो लोगों के पास जाकर कठपुतली नाच  देखने की गुजारिश करते हैं। स्मृतियों से गुजर कर कहते हैं एक जमाना था कि हम बुलवाए जाते थे और आज हम लोगों तक जाकर उनकी खुशामद करते हैं कि देखेंगे साहब। दौर था कि रात में सैकड़ों लोग जुटकर कठपुतली का खेल देखते थे अब देखते नहीं।

मोबाइल हाथों में थामे बचपन को कठपुतलियों में दिलचस्पी नहीं तो उनके बड़ों को इतनी फुर्सत नहीं कि वो अपने नौनिहालों की उंगली पकड़कर लोककला की दुनिया तक ले जाएं जहां कोई इमरती दादू उन्हें रंगीन काठ की पुतलियों के जरिए उनके बचपन को लोककला के रस से भरने के साथ ही सामूहिकता से जोड़ दे। 

दिन में तीन-चार सौ तो किसी दिन ऐसे ही गुज़ार देने वाले इमरती जब ये कहते हैं हमारे बाद कोई और नहीं इसको करेगा तो उनका अनबोला दर्द कह उठता है सरकार कभी हमारे तरफ भी एक नजर…। खैर हर बरस 21 मार्च को मनाये जाने वाले कठपुतली दिवस पर सोशल मीडिया पर संदेश से ट्रैफिक जाम करने वालों जब कभी कोई इमरती विश्वकर्मा आपके शहर की गलियों या सड़क पर से कंधे पर झोला और हाथ में कठपुतली लेकर गुजरता दिखे तो उनका हाथ पकड़ कर रोक लें कठपुतलियां नाच उठेंगी। लोककलाओं की धड़कनें चलती रहेंगी और इमरती जैसे बचे हुए लोगों की हंसी और रोजगार भी नहीं तो महमूद की तरह इमरती की जिंदगी की डोर भी कट जाएगी। याद आएगी उनकी बात  “हम जो गुज़र गए तो फिर कोई?

      (वाराणसी से पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट।)

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