इलेक्टोरल बॉन्ड: राजनीतिक दलों को फंडिंग का तरीका या नये तरह का चुनावी भ्रष्टाचार?

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विश्व में चुनावी भ्रष्टाचार के सबसे अधिक मामले भारत में हैं। ऐसे मामलों में सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, कई तरह की चुनावी बेईमानी भी शामिल हैं। इस सबके बावजूद भारत में वोटिंग लगातार बढ़ रही है। चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। कोई पैसे बांट कर लुभाता है, कोई शराब बांट कर लुभाता है, तो कोई उपहार बांट कर। करोड़ों रुपये पकड़े जाते हैं। हजारों बोतल शराब पकड़ी जाती है। जाहिर है, जिन पैसों से यह सब होता है, वह पैसा सही तो नहीं ही होगा। जो पैसा सही नहीं है, वह काले धन की श्रेणी में अपने आप आ जाता है।

ऐसे में चुनावों में काले धन के बारे में बात करने से पहले हमें कुछ अहम बातों को समझ लेना चाहिए कि आखिर इस काले धन के पीछे का सच क्या है। काला धन और भ्रष्टाचार की जड़ कहां है। दरअसल, सरकार का मतलब होता है राजनीतिक पार्टी, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक पार्टियां ही सरकार बनाती हैं।

केंद्र में एनडीए की सरकार है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी मुख्य घटक दल है। देश के सभी राज्यों में किसी न किसी पार्टी की सरकार है। कहीं कांग्रेस तो कहीं किसी क्षेत्रीय दल की। यानी यह स्पष्ट है कि राजनीतिक पार्टियां ही सरकारें बनाती हैं। इस ऐतबार से जो फैसले सरकारें लेती हैं, एक हिसाब से वे फैसले राजनीतिक पार्टियां ही लेती हैं। ऐसे में यदि किसी सरकार ने कोई फैसला लिया या यूं कह लें कि राजनीतिक पार्टी ने कोई फैसला लिया कि देश में यह होना चाहिए, तो हमें यह समझना होगा कि ये फैसले देश के हित में लिये जाते हैं या पार्टी हित में।

अमूमन जनता का विश्वास सरकारों में और राजनीतिक पार्टियों में होता है। हालांकि पिछले दस-बीस सालों में देश में जो राजनीतिक वातावरण बना है, जनता को राजनीतिक पार्टियों और नेताओं पर यह विश्वास नहीं है कि वे देशहित और जनता के हित में काम कर रहे हैं।

राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से मिलता है, इसकी पारदर्शिता के अभाव के चलते विभिन्न प्रकार के राजनीतिक भ्रष्टाचार पनपते हैं। इसी के मद्देनजर, 23 मार्च, 2016 को दिल्ली हाइकोर्ट ने एक फैसला लिया था, जिसका पहला वाक्य था- ‘आज से 40 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजनीति में और चुनाव में बहुत ज्यादा पैसे का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे चुनाव प्रक्रिया खराब हो रही है।’

ऐसे में मेरा यह मानना है कि अगर 40 साल से देश की जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को पैसा कहां से किस रूप में आता है, तो यह स्वाभाविक है कि लोगों को शक होता है। क्योंकि अगर सब कुछ ठीक है, तो पार्टियों को यह बताने में क्या दिक्कत है कि उन्हें पैसा कहां से आता है? पार्टियों के इस धन को कालाधन कहें कि न कहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन यह बेहिसाब-किताब वाला धन (अनएकाउंटेड मनी) तो जरूर है।

शायद यही वजह है कि पिछले 40 साल से देश की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने चंदों के हिसाब-किताब छुपाती आ रही हैं। इस छुपाने की प्रक्रिया से ही भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है। चुनावों में पैसे, शराब, उपहार आदि बांटने का काम इसी भ्रष्टाचार का हिस्सा है। चुनावी बॉन्ड भारत में राजनीतिक दलों को फंडिंग का एक तरीका है। चुनावी बांड की योजना केंद्रीय बजट 2017-18 के दौरान वित्त विधेयक, 2017 में पेश की गई थी, जब केंद्रीय वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने राजनीतिक दलों को नकद दान की अधिकतम सीमा 2,000 रुपये तक सीमित कर दी थी।

चुनावी बांड को विशेष रूप से केंद्रीय बजट के एक अभिन्न अंग के रूप में पेश किया गया था और इसलिए इसे धन विधेयक के रूप में वर्गीकृत किया गया था। भारतीय संविधान के अनुसार, धन विधेयक ऐसे कानून हैं जिन्हें राज्यसभा में “पारित” होने की आवश्यकता से छूट दी गई है, क्योंकि उच्च सदन को केवल लोकसभा में पेश किए गए ऐसे बिलों पर टिप्पणी देने की अनुमति है।

इलेक्टोरल बॉन्ड एक प्रकार का उपकरण है जो प्रॉमिसरी नोट और ब्याज मुक्त बैंकिंग टूल की तरह काम करता है। भारत में पंजीकृत कोई भी भारतीय नागरिक या संगठन आरबीआई द्वारा निर्धारित केवाईसी मानदंडों को पूरा करने के बाद इन बांडों को खरीद सकता है। इसे दानकर्ता द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की विशिष्ट शाखाओं से एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ जैसे विभिन्न मूल्यवर्ग में चेक या डिजिटल भुगतान के माध्यम से खरीदा जा सकता है।

जारी होने के 15 दिनों की अवधि के भीतर, इन चुनावी बांडों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (धारा 29ए के तहत) के तहत कानूनी रूप से पंजीकृत राजनीतिक दल के निर्दिष्ट खाते में भुनाया जा सकता है, जिसे कम से कम 1% वोट मिले हों। चुनावी बांड में गुमनामी की सुविधा होती है क्योंकि इसमें दाता और जिस राजनीतिक दल को इसे जारी किया जाता है उसकी कोई पहचान नहीं होती है।

आर्थिक सुधारों एवं चुनावों में होने वाले भ्रष्टाचार को एक-दूसरे से जोड़ना भले ही असंगत और नामुनासिब प्रतीत होता हो, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में जमीनी सच्चाई यही है कि इन दोनों का एक-दूसरे से गहरा नाता है। एक और पक्ष है जो निर्माण, उत्पादन और तथाकथित विकास से जुड़ा है।

व्यवसायिक तौर पर कुछ फैसले उस कंपनी के हित में लिये जाते हैं, जिसे उन फैसलों के तहत प्रोजेक्ट पर काम मिलनेवाला होता है और उसे अधिक कारोबारी मुनाफा मिल सकता है। उत्पादन और सेवा क्षेत्र की कारोबारी कंपनियों को अधिक लाभ पहुंचाने के लिए नीतियां बनाई जाती हैं, टैक्स में छूट दी जाती है। उनपर लागू नियम-कानून लचीले किए जाते हैं। बैंकों से अधिक कर्ज दिलाया जाता है। उधारी बट्टा में डाल दी जाती है या माफ कर दी जाती है। कंपनियों के हित में फैसले लिये जाते हैं। तो क्या ये अच्छे फैसले हैं, या इसलिए लिये जाते हैं कि इससे कंपनी को फायदा होगा और फिर कंपनी से पार्टी को फायदा होगा। यह जो अतिरिक्त लाभ दिया जाता है वह पैसा जनता से ही वसूला जाता है तरह तरह के टैक्स लगाकर।

इस पूरी प्रक्रिया को कहते हैं- कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट यानी एक ऐसी स्थिति, जिसमें किसी जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रुचि से प्रभावित हो। अगर पार्टियां अपने फंड को लेकर पारदर्शी हो जायें, तो उससे यह पता लगाना आसान हो जायेगा कि उनकी सरकारों द्वारा लिये गये फैसलों में कहीं कोई कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की बात तो नहीं है। जब तक पार्टियों में पारदर्शिता नहीं आयेगी, तब तक भ्रष्टाचार बना रहेगा।

(शैलेन्द्र चौहान साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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