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नहीं थम रहा राजनीति में अपराधियों के दाखिले का सिलसिला

कहा जाता है कि अपराधियों की आखिरी शरणस्थली राष्ट्रवाद होता है। लेकिन भारत में वह सीढ़ी राजनीति से होकर गुजरती है। देश के कई सूबों में जब चुनावी माहौल गरम है तो इन अपराधियों के भी पौ बारह हो गए हैं। इसका नतीजा यह है कि जिन्हें जेल की सींखचों के पीछे होना चाहिए वो अब विधानसभा और संसद में जाने का न केवल ख्वाब देख रहे हैं बल्कि उसको पूरा करने के लिए चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं।

राजनीति के अपराधीकरण का सवाल लगातार उठता रहा है और इस मसले पर देश में काफी बहस भी हुई है। और उसी का नतीजा है कि इस पर कानून भी बना है। जिसके तहत तीन साल से ज्यादा सजायाफ्ता कोई भी शख्स चुनाव नहीं लड़ सकता है। माना जा रहा था कि इस प्रावधान के बाद राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया रुक जाएगी। लेकिन जमीनी हालात बिल्कुल अलग हैं। न तो अपराधियों ने राजनीति छोड़ी और न ही उन पर इन कानूनों ने कोई लगाम कसा। नतीजा यह है कि अभी भी भारी तादाद में अपराधी राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं और चुनावों में जीत के जरिये विधानसभा और संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं।

दरसअल देश की राजनैतिक और चुनावी व्यवस्था दलगत हिसाब से चलती हैं। यानी राजनीति और चुनाव के केंद्र में पार्टियां होती हैं और अपनी नीतियों और योजनाओं, वादों और इरादों के आधार पर वो सत्ता में आती-जाती हैं। ऐसे में नेता और उनकी व्यक्तिगत छवि गौड़ हो जाती है। इसी चीज का फायदा दागी छवि के नेता उठाते हैं और पैसे तथा ताकत के बल पर राजनीति और चुनाव को अपनी जेब में कर लेते हैं। देश में होने वाले मौजूदा चुनावों में भी इसी तरह के लोगों का बोलबाला है। मध्य प्रदेश में यह बात उस समय खुलकर सामने आ गयी जब इस मामले से जुड़ी एक एजेंसी ने उसके आंकड़े पेश कर दिए।

मध्यप्रदेश में 28 सीटों पर उपचुनाव के लिए मतदान हो गया। इन्हीं 28 सीटों के परिणाम पर राज्य का राजनीतिक भविष्य तय है। इस चुनाव में सभी दलों ने खुलकर आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट दिया है।

कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अलावा 178 निर्दलीय उम्मीदवार इस बार मैदान में हैं।

इस बार मध्य प्रदेश उपचुनाव में किस्मत आजमा रहे कुल 355 उम्मीदवारों में से 63 उम्मीदवारों (18 प्रतिशत) ने चुनावी हलफनामे में बताया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। चुनाव अधिकार समूह एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार 11 प्रतिशत अथवा 39 उम्मीदवारों ने बताया है कि उनके खिलाफ संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। संगीन आपराधिक मामले गैर जमानती होते हैं। इनमें पांच से लेकर कई सालों तक के कारावास की सजा होती है।

एडीआर ने कहा कि प्रमुख राजनीतिक दलों की बात करें तो कांग्रेस उम्मीदवारों की दी हुई जानकारी का विश्लेषण करने पर पता चला कि उसके 28 में 14 (50 प्रतिशत) उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि भाजपा के 28 में से 12 उम्मीदवारों  (करीब 43 प्रतिशत) ने घोषित किया है कि उनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज हैं।

एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बसपा के 28 में आठ, सपा के 14 में से चार और 178 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 16 ने अपने हलफनामों में बताया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।

बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने बीते फरवरी में तमाम राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि सभी दल अपनी वेबसाइट पर आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड के साथ सूची अपलोड करें। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने का कारण बताने का भी निर्देश दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, 355 में से 80 यानी 23 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं। जिनमें बीजेपी के 23, कांग्रेस के 28 में से 22 उम्मीदवार हैं। वहीं, बीएसपी के 28 में से 23, समाजवादी पार्टी के  14 में से 2 और 178 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 14 लोग करोडपति हैं।

वहीं आज गुजरात में भी आठ विधानसभा सीटों पर कड़ी सुरक्षा के बीच उपचुनाव के लिए मतदान हुआ। यहां शाम पांच बजे तक 55.84 फीसद मतदान हुआ है। यहां भी 18 फीसदी उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।

बिहार पहला राज्य हैं जहाँ कोरोना काल में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में चुनाव लड़ रहे 1,195 उम्मीदवारों में से 31 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 282 या 24 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है। गंभीर आपराधिक मामले गैर-जमानती अपराध हैं जिनमें पांच साल से अधिक की कैद हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 361 यानी 30 प्रतिशत उम्मीदवारों ने अपनी वित्तीय संपत्ति करोड़ों रुपये की बताई है।

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 282 या 24 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है। गंभीर आपराधिक मामले गैर-जमानती अपराध हैं जिनमें पांच साल से अधिक की कैद हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार राजद के 44 उम्मीदवारों में से 32 (73 फीसदी) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं और उनमें से 22 (50 फीसदी) ने अपने हलफनामों में खुद के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है।

भाजपा के 34 उम्मीदवारों में से लगभग 26 (76 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं और 22 (65 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में खुद के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है।

वहीं, कांग्रेस के 25 उम्मीदवारों में से 19 (76 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं और 14 (56 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में खुद के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है।

एलजेपी के 42 उम्मीदवारों में से लगभग 18 (43 प्रतिशत), जद (यू) से 37 उम्मीदवारों में से 21 (57 प्रतिशत) और बसपा से 19 उम्मीदवारों में से पांच (26 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में खुद के खिलाफ आपराधिक मामले होने की घोषणा की है ।

एलजेपी के 42 उम्मीदवारों में से ग्यारह (26 प्रतिशत), जेडी (यू) के 37 उम्मीदवारों में से 11 (30 प्रतिशत) और बसपा से विश्लेषण किए गए 19 उम्मीदवारों में से 4 (21 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में खुद के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है।

बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ रहीं सभी बड़ी पार्टियों ने 37 से 70 प्रतिशत तक ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिये हैं जिन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किये हैं।

इन रिपोर्टों से साफ़ पता चलता है कि तमाम दलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्दोषों को दरकिनार कर आपराधिक छवि लोगों को चुनावी मैदान में उतारा है।

(नित्यानंद गायेन वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)

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This post was last modified on November 3, 2020 9:51 pm

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