Saturday, January 22, 2022

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आजादी के 75 साल बाद भी खत्म नहीं हुआ जातिवाद:सुप्रीमकोर्ट

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ऑनर किलिंग पर उच्चतम न्यायालय ने सख्त नाराजगी प्रकट करते हुए कहा है कि जातिवाद से प्रेरित यह हिंसा साबित करती है कि आजादी के 75 साल बाद भी देश से जातिवाद का खात्मा नहीं हुआ है। इस तल्ख टिप्पणी के साथ ही उच्चतम न्यायालय ने नागरिक समाज से कहा कि यह उचित समय है जब वह अपनी प्रतिक्रिया दे और जातिवाद के नाम पर होने वाली इस भयानक हिंसा को पूरी ताकत के साथ नामंजूर करे।

उच्चतम यायालय के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा है कि जाति से प्रेरित हिंसा की घटनाओं से पता चलता है कि आजादी के 75 साल बाद भी जातिवाद खत्म नहीं हुआ है और यह सही समय है जब नागरिक समाज जाति के नाम पर किए गए भयानक अपराधों के प्रति कड़ी अस्वीकृति के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त करे। पीठ ने उत्तर प्रदेश में 1991 में ऑनर किलिंग से संबंधित मामले में दायर याचिकाओं के समूह पर फैसला सुनाते हुए कहा कि वह अधिकारियों को ऑनर किलिंग रोकने के लिए कड़े कदम उठाने का पहले कई निर्देश जारी कर चुका है। उन निर्देशों को बिना और देरी किये लागू किया जाना चाहिए। इस मामले में एक महिला समेत तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी।

पीठ ने कहा कि जाति-आधारित प्रथाओं द्वारा कायम कट्टरता आज भी जारी है और यह सभी नागरिकों के लिए संविधान के समानता के उद्देश्य को रोकती है। पीठ ने कहा कि जातिगत सामाजिक बंधनों का उल्लंघन करने के आरोप में दो युवकों और एक महिला पर लगभग 12 घंटे तक हमला किया गया और उनकी हत्या कर दी गई। देश में जाति-प्रेरित हिंसा के ये प्रकरण इस तथ्य को प्रदर्शित करते हैं कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष के बाद भी जातिवाद खत्म नहीं हुआ है।

पीठ ने इस मामले में 23 आरोपियों को दोषी करार दिया और तीन लोगों को साक्ष्यों के अभाव में बरी करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। गवाहों के संरक्षण के पहलू का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि मामले में अभियोजन पक्ष के 12 गवाह मुकर गए।

पीठ ने कहा कि भले ही गवाह मुकर गए हों, लेकिन अगर वे स्वाभाविक और स्वतंत्र गवाह हैं और उनके पास आरोपी को झूठ बोलकर फंसाने का कोई कारण नहीं है, तो उनके सबूतों को स्वीकार किया जा सकता था। पीठ ने कहा कि अदालतों में बिना किसी दबाव और धमकी के स्वतंत्र तथा निष्पक्ष तरीके से गवाही देने के अधिकार पर आज भी गंभीर हमले होते हैं और अगर कोई धमकियों या अन्य दबावों के कारण अदालतों में गवाही देने में असमर्थ है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) और 21 के तहत अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

पीठ ने कहा कि इस देश के लोगों को मिले जीने के अधिकार में एक ऐसे समाज में रहने का अधिकार भी शामिल है जो अपराध और भय से मुक्त हो। गवाहों को बिना किसी डर या दबाव के अदालतों में गवाही देने का अधिकार है। पीठ ने कहा कि गवाहों के मुकर जाने का एक मुख्य कारण यह है कि उन्हें राज्य द्वारा उचित सुरक्षा नहीं दी जाती है। यह एक कड़वी सच्चाई है, खासकर उन मामलों में जहां आरोपी प्रभावशाली लोग हैं और उन पर जघन्य अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जाता है तथा वे गवाहों को डराने या धमकाने का प्रयास करते हैं।

पीठ ने उच्चतम न्यायालय के पहले के एक निर्णय का जिक्र करते हुए कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति इस कारण बरकरार है कि सरकार ने इन गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं किया है, जिसे आमतौर पर गवाह संरक्षण के रूप में जाना जाता है। पीठ ने कहा कि अपने नागरिकों के संरक्षक के रूप में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई गवाह सुनवाई के दौरान सुरक्षित रूप से सच्चाई को बयान कर सके।

पीठ ने कहा कि डॉक्टर बी. आर. आम्बेडकर के अनुसार अंतर-जातीय विवाह समानता प्राप्त करने के लिए जातिवाद से छुटकारा पाने का एक उपाय है। पीठ ने कहा कि समाज के सभी वर्गों, विशेष रूप से दबे कुचले वर्गों के लिए न्याय व समानता सुनिश्चित करने का उनका दृष्टिकोण संविधान की प्रस्तावना में अच्छी तरह से निहित है। पीठ ने कहाकि इस देश में ऑनर किलिंग के मामलों की संख्या थोड़ी कम हुई है, लेकिन यह बंद नहीं हुई है और यह सही समय है जब नागरिक समाज जाति के नाम पर किए गए भयानक अपराधों के बारे में कड़ी अस्वीकृतियों के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त करे।

साल 1991 के उत्तर प्रदेश ऑनर किलिंग मामले में नवंबर 2011 में एक निचली अदालत ने 35 आरोपियों को दोषी ठहराया था।उच्च न्यायालय ने दो लोगों को बरी कर दिया था जबकि शेष व्यक्तियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। हालांकि, इलाहबाद उच्च न्यायालय ने आठ दोषियों को दी गई मौत की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया था।
(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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