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‘डेथ वारंट’ के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं किसान

आख़िरकार व्यापक विरोध के बीच कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुगमीकरण) विधेयक, 2020 एवं मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा विधेयक, 2020 पर कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) करार आखिरकार रविवार 20 सितंबर, 2020 के दिन राज्य सभा द्वारा पारित कर दिया गया। आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 के साथ मिलकर ये विधेयक असल में भारत में कृषि क्षेत्र के उदारीकरण की योजना को अमल में लाने का का पैकेज है।

ऐसे में कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़े होते हैं, जिनके जवाब देश को हल करने हैं:

  1. क्या देश वाकई में अधिनायकवाद की गिरफ्त में जा चुका है? जिसमें सत्ताधारी दल का नेता भले ही खुद को संविधान और लोकतंत्र से ऊपर दिखाता हो, लेकिन असल में वह भारतीय दलाल पूँजी और विश्व बैंक सहित दुनिया के बड़े सरमायेदारों के लिए एजेंट की भूमिका में खड़ा हो चुका है?
  2. क्या वाकई में संघ/बीजेपी को यह लगने लगा है कि वह देश के शहरी गरीबों/सर्वहारा के ही खिलाफ खुल्लम-खुल्ला नीतियों को लागू करने में कोई कोताही नहीं बरतने के लिए छूट हासिल किये हुए है, बल्कि भारत के दो तिहाई ग्रामीण आबादी को भी अब जब जैसे मर्जी हो, घुटनों के बल मोड़ने पर विवश कर सकता है। और चुनावी समर में फिर से हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान चीन के खिलाफ वीर रस की चुस्की से ही कम से कम 70% जनता को भ्रमित कर सकता है?
  3. क्या वाकई में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सिर्फ जबानी जमाखर्च कर, पिछले मोदी कार्यकाल की तरह उनके पतन के ऊपर अपनी सत्ता वापसी के दिवा-स्वप्न पाले आराम फरमा रही है? क्योंकि कहीं न कहीं उसे भी लगता है कि यदि सत्ता हस्तांतरण कल को होता है तो उसे भी मोदी काल की ही नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए कॉर्पोरेट मजबूर करेगा। आख़िरकार मोदी भी सिर्फ कांग्रेस की लाई हुई नई आर्थिक नीतियों को ही कांग्रेस से कहीं अधिक उत्साह से लागू करने और कॉर्पोरेट की सेवा में तत्परता से जुटी हुई है?
  4. क्या वाकई में मौजूदा व्यवस्था को ऐसा लगता है कि वे जो मर्जी झटपट क़ानूनी बदलाव के जरिये इस देश को चला सकने में सक्षम हैं? उन्हें इस देश के मध्य वर्ग, बुद्धिजीवियों, न्यायपालिका, प्रेस के बारे में अच्छी तरह से मालूम है कि ये वाकई में किसी लोकतान्त्रिक संघर्षों से तपे तपाये फौलादी चरित्र से नहीं बने हैं। भारत में लोकतंत्र की नींव डाले भले ही 70 साल से अधिक हो चुके हों, लेकिन उसकी जड़े मजबूत होने की जगह 80 के दशक के बाद उत्तरोत्तर कमजोर ही होती चली गई हैं।

सरकार के पक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं कि चूँकि सरकार किसानों की आय को दुगुना करने के लिए कृत संकल्प है, और इसी के वास्ते आवश्यक क़ानूनी संशोधनों के जरिये किसानों की उपज में मिडिल मैन को उखाड़ फेंकने के लिए इन क्रान्तिकारी सुधारों को अपनाया जा रह है। हालाँकि किसानों के उग्र विरोध को देखते हुए सरकार ने अब कहना शुरू कर दिया है कि मण्डियों को खत्म नहीं किया जा रहा है, वे बदस्तूर बनी रहने वाली हैं।

तमाम अध्ययनों के आधार पर इस बारे में कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, जो कुछ इस प्रकार से हैं:-

एक मित्र से फोन पर केरल के सन्दर्भ में उत्तर भारत के किसानों के असंतोष की बात हुई। पता चला कि केरल में मुश्किल से ही खेतीबाड़ी का काम आजकल हो रहा है। इसका मुख्य कारण सुरेन्द्रन अप्पू जो कि अपने जिले में सीपीएम से जुड़े किसान मोर्चे का काम देखते हैं का कहना था, “केरल में पिछले कुछ दशकों से खेतीबाड़ी करीब-करीब खत्म ही थी। जो भी उपज पैदा होती थी, वह सब का सब सरकार खरीद लेती थी। लेकिन न्यूनतम खरीद मूल्य मिलने के बावजूद यहाँ पर लोग खेती की जगह खाड़ी से आने वाले पेट्रो डॉलर के कारण बड़े ही निष्क्रिय थे। किसान संगठन का काम भी इसी वजह से सिर्फ कुछ प्रतीकात्मक धरना, प्रदर्शन से अधिक का यहाँ नहीं है। हालाँकि पिछले 6 महीनों के दौरान कोरोना वायरस के चलते कुछ कुछ सब्जी आदि का काम शुरू हो चुका है। वरना भोजन के मामले में केरल आज पूरी तरह से तमिलनाडु पर निर्भर है।” और यही वजह है कि उन्हें उत्तर भारत की स्थिति के बारे में ज्यादा नहीं पता चल पा रहा है।

बिहार जैसे राज्यों के बारे में माना जाता है कि यहाँ एपीएमसी मण्डियों का अस्तित्व ही नहीं है। किसानों को अपनी उपज को सीधे बाजार के हाथों औने-पौने बेचना पड़ता है। कुछ बड़े व्यापारी तो यहाँ तक करते हैं कि यहाँ से सारा माल पंजाब हरियाणा की मंडियों में सरकारी दामों पर बेच देते हैं।

इसी तरह बनारस के चंदौली में एक मझोले किसान विनोद सिंह बताते हैं “हम कभी भी अपने गेहूं को मंडी में नहीं बेचते। हालाँकि उपज करीब 10 टन तक हो जाती है। लेकिन सरकारी अधिकारियों और बिचौलियों से 18 रूपये किलों पर गेहूं खरीद के लिए उनके पीछे भाग-दौड़ करने से अच्छा होता है कि 15-16 रूपये किलो के भाव में तत्काल सौदा व्यापारियों से हो जाता है। और वे आगे इसे निपटा देते हैं।”

ऐसे में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वे हरित प्रदेश वाले इलाके के ही किसान बच जाते हैं, जो गेहूं और चावल की बम्पर फसल उगाते हैं और इस इलाके में मण्डियों की अच्छी खासी उपस्थिति होने के चलते इस पर थोड़ा बहुत दबाव भी वे रखते हैं। असल में यदि यह बिल पास हो जाता है तो कहीं न कहीं हम अपनी खाद्य सुरक्षा को ही खतरे में डालने जा रहे हैं।

कायदे से होना तो यह चाहिए था कि सारे देश में केरल की तरह सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद को वर्तमान में मात्र 6% धनी एवं बड़े किसानों के हक के बजाय सभी छोटे किसानों तक सुलभ कराना था। लेकिन सरकार के पास इससे कहीं बड़े एजेंडे हैं, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र से आबादी के पलायन को सम्पन्न कराने से लेकर खेती में आधुनिक पूंजी निवेश को मुकम्मल करने वाला विश्व बैंक फार्मूले को लागू कराने की मजबूरी है।

आज किसान इसे अपने लिए डेथ वारंट बता रहे हैं, और यह बिल्कुल अतिश्योक्ति नहीं है। इस देश के किस कानून में यह लिखा हुआ है कि किसानों के अनाज पर मुनाफाखोरी करने वाले व्यापारी को ही किसान आज तक अपना माल बेचने के लिए मजबूर था? वह पहले भी उतना ही आजाद था, जितना इन कानूनों के पास हो जाने के बाद है। उल्टा 2 एकड़ से कम जोत वाले 80% से अधिक छोटे किसानों के पास पहले ही कभी भी अपनी उपज को संरक्षित रखने का कोई उपाय नहीं था, उसके पास तो अपने माल को मंडी तक ले जाने का जुगाड़ नहीं है। कौन सा कॉर्पोरेट उसके दरवाजे पर अनाज खरीदने जा रहा है?

उल्टा एक दो साल बाद धीरे-धीरे मंडियों के खात्मे के साथ ही उसके पास कोई भी नजदीक में थोक मंडी नहीं रहने जा रही है। इसके साथ ही सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा और खरीद के अभाव में किसानों के पास किसी भी प्रकार के मोलभाव की रही सही जो आज भी गुंजाइश है, वह भी खत्म हो जाने वाली है।

कॉर्पोरेट के लिए यह कहना कितना आसान होगा कि हे पिपली, हरियाणा के किसानों तुम्हारे गेहूं की जो कीमत तुमने 18 रुपये प्रति किलो लगा रखी है, उसकी तुलना में मुझे तो मुक्तसर, पंजाब मण्डी में भाव 14 रुपये किलो का मिल रहा है। मेरे पास दो दिन का समय है, उसके बाद तुम अपने अनाज को जहाँ मर्जी फेंको, मुझसे मत कहना। या किस्म, क्वालिटी इत्यादि को लेकर सैकड़ों बहाने।

कुछ लोगों का तर्क है कि यह सब सिर्फ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को व्यापारी और नेताओं द्वारा बहकाया जा रहा है। देखो महाराष्ट्र के किसान तो कोई विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्हें इस बारे में जानना चाहिए कि देश अभी भी मुख्य तौर पर गेंहू और धान ही खाता है, जो इन तीन राज्यों में ही बहुतायत में उपजाया जाता है। महाराष्ट्र में सब्जी, फल एवं कपास गन्ना होता है। इसके अलावा दूध के न्यूनतम मूल्य में जब कभी सरकार गिरावट लाती है तो सबसे पहले महाराष्ट्र का ही किसान सड़क जाम करने से लेकर उसे बहाने का काम करता है।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में सब कुछ इतनी तीव्र गति से करने का निश्चय किया है, मानो उन्हें देश को चुनिन्दा कॉर्पोरेट के इशारे पर गिरवी रखने की बड़ी जल्दी मची हुई है। पब्लिक सेक्टर की बिकवाली से शुरू होकर यह मसला करोड़ों युवाओं के रोजगार को खत्म करते हुए, आदिवासियों की जमीनों के नीचे दबे काले सोने को खोदने से होते हुए अब भारत माँ के किसानों की छाती रौंदने की ओर बढ़ चले हैं। कांग्रेस ऐतिहासिक मोड़ पर भंवर में है, उसके ऊपर का माला तो बीजेपी हथिया चुकी है। नीचे में पहले से ही बसपा, सपा, राजद जैसे दलों ने सेंध लगाकर कुतर लिया है। दलित बुद्धिजीवियों के एक हिस्से ने भी किसानों की इस दुर्दशा पर बल्लियों उछालें मारते हुए इसे सामंतवाद के समूल नाश के तौर पर चिन्हित करते हुए कॉर्पोरेट के लिए गाल बजाने का काम करना शुरू कर दिया है।

कल किसानों के लिए भारत बंद का आह्वान है। मुख्य रूप से यह उत्तर भारत के विभिन्न इलाकों को प्रभावित करने जा रहा है। लेकिन कोई नहीं जानता कि एक छोटी सी चिंगारी कब दावानल का रूप अख्तियार कर सकती है। कई जम्हाई लेते हुए मजदूरों, किसानों के संगठन और दल इस बीच कमर कसने की तयारी में लगे हैं। किसानों के पास लड़ने या फिर अगले कुछ वर्षों के भीतर शहरी सर्वहारा के तौर पर पहले से मौजूद दिहाड़ी पर काम कर रहे असंगठित मजदूर की न्यूनतम मजदूरी को और भी कम कर अपने लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ खोजने का विकल्प खुला हुआ है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

This post was last modified on September 24, 2020 6:44 pm

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