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छत्तीसगढ़ में विरोध-प्रदर्शन: “कर्ज़ नहीं, कैश दो” के नारे के साथ किसानों ने कहा- देश नहीं बिकने देंगे

रायपुर। मजदूर-किसान संगठनों के देशव्यापी आह्वान पर आज छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के अनेकों गांवों, मजदूर बस्तियों और उद्योगों में केंद्र सरकार की मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए। इस प्रदर्शन के दौरान केंद्र और राज्य सरकार से किसान विरोधी, गांव विरोधी नीतियों को वापस लेने, गरीबों को खाद्यान्न और नगद राशि से मदद करने, कोयला और रेलवे सहित अन्य सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण पर रोक लगाने, मनरेगा में 200 दिन काम और 600 रुपये रोजी देने, मजदूर-किसान विरोधी अध्यादेशों और प्रशासकीय आदेशों को वापस लेने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सार्वभौमिक बनाने और सभी लोगों का कोरोना टेस्ट किये जाने की मांग जोर-शोर से उठाई गई।

छत्तीसगढ़ किसान सभा (सीजीकेएस) के राज्य अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ में ये विरोध प्रदर्शन सीटू, छत्तीसगढ़ किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के आह्वान पर “कर्ज़ नहीं, कैश दो” और “हम देश नहीं बिकने देंगे” के थीम नारे के साथ आयोजित किया गया। प्रदर्शन खेतों और गांव की गलियों में, मजदूर बस्तियों और फैक्ट्री गेटों पर सैकड़ों स्थानों पर आयोजित किये गए। इन संगठनों के नेताओं ने स्थानीय स्तर पर आंदोलनरत किसानों और मजदूरों के समूहों को भी संबोधित किया और केंद्र सरकार द्वारा घोषित पैकेज को किसानों, ग्रामीण गरीबों और मजदूरों के साथ धोखाधड़ी बताते हुए कहा कि यह पैकेज किसानों और प्रवासी मजदूरों की रोजी-रोटी, उनकी आजीविका और लॉक डाउन में उनको हुए नुकसान की भरपाई नहीं करता।

किसान नेताओं ने कर्ज़ के बदले किसान और प्रवासी मजदूरों को कैश से मदद करने की मांग पर जोर देते हुए ग्रामीण परिवारों को अगले छह माह तक 7500 रुपये की मासिक नगद मदद देने, हर जरूरतमंद व्यक्ति को अगले छह माह तक 10 किलो खाद्यान्न हर माह मुफ्त देने, किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी-2 लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में देने, किसानों को बैंकिंग और साहूकारी कर्ज़ के जंजाल से मुक्त करने के साथ ही आदिवासियों और स्थानीय समुदायों को जल-जंगल-जमीन का अधिकार देने की मांग की।

उन्होंने प्रदेश की कांग्रेस सरकार की भी आलोचना की कि उसने राज्य को आवंटित अपर्याप्त खाद्यान्न का भी उठाव अभी तक नहीं किया है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भुखमरी की स्थिति है। गरीबों को मुफ्त चावल देने की योजना तो उसने बंद ही कर दी है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही मोदी सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम को समाप्त कर सारे प्रतिबंध उठाने का नतीजा तेजी से बढ़ती महंगाई, जमा खोरी, काला बाजारी और खाद्यान्न असुरक्षा के रूप में देश को भुगतना पड़ रहा है।

किसान नेताओं ने सभी प्रवासी मजदूरों को एक अलग परिवार मानकर काम और मुफ्त राशन देने की मांग की है तथा इसके लिए बजट में अतिरिक्त आवंटन की भी मांग की है। किसान सभा नेताओं ने कहा कि हाल ही में जारी कृषि संबंधी तीन अध्यादेश खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले, किसानों को कॉरपोरेट घरानों का गुलाम बनाने वाले तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने वाले अध्यादेश हैं, जिन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के मौजूदा दौर में भाजपाई केंद्र सरकार का कुप्रबंधन सामने आ चुका है। प्रवासी मज़दूरों का अभूतपूर्व संकट सभी मोर्चों पर वर्तमान केंद्र सरकार की असफलता का एक उदाहरण भर है। केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण संबंधी क़ानूनों और बिजली क़ानून में किए गए बदलाव, कोयला खनन को वाणिज्यिक उपयोग के लिए खोल दिये जाने और रेलवे व बैंकों के निजीकरण जैसे कदमों के गंभीर परिणामों को देश के मज़दूर, किसान, आदिवासी और अन्य उपेक्षित समुदाय झेलने के लिए विवश होंगे। कोयला खदानों के निजी आवंटन के साथ-साथ ग्राम सभा के अधिकारों की पूरी नज़रंदाजी से देश में और विस्थापन बढ़ेगा, स्वास्थ्य पर गहरा असर होगा और पर्यावरण और जंगलों की क्षति भी होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आत्मनिर्भरता के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों को चंद कारपोरेट घरानों को बेच रही है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

This post was last modified on July 23, 2020 3:47 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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