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Monday, September 27, 2021

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एनडीए से दोस्ती, नीतीश से दुश्मनी की राह पर लोजपा!

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चिराग पासवान किशोरावस्था में मुंबई की गलियां छान रहे थे। बड़े और सफल पिता का बेटा होने का उन्हें गौरव मिला था। मुंबई मायानगरी में हीरो बनने गए चिराग हीरो तो नहीं बन पाए। एकाध फिल्मों में काम किया जो चला नहीं। कहते हैं कि बड़े पासवान साहब ने फिल्म चलाने की काफी कोशिश की लेकिन हार गए। चिराग को राजनीति से लगाव नहीं था। राजनीति के झूठ और फरेब से उन्हें चिढ़ थी, लेकिन तब वे किशोरावस्था में भी थे। मुंबई उन्हें रास नहीं आई। लौट आए।

घर में मंत्रणा हुई। तय हुआ कि चिराग लोजपा के वारिस होंगे। पासवान के घर में, भाई-बंधुओं में पार्टी के वारिस पर चर्चा हुई और फिर बड़े पासवान के सामने यह तय हो गया कि पिता के मौसम विज्ञान और चिराग की युवा शक्ति से पार्टी आगे बढ़ेगी। चिराग के हाथ में पार्टी की कमान थमा दी गई। जो चिराग मुंबई से निराश होकर लौटे थे, राजनीति में सफल होते गए।

आज चिराग बिहार ही नहीं देश की राजनीति में एक सफल चेहरा हैं। बिहार की एक बड़ी जमात चिराग के संग है। जातीय राजनीति के लिए कुख्यात रहा बिहार अब चिराग के साथ भविष्य की राजनीति को तलाश रहा है। चिराग भी सीएम बनना चाहते हैं। बड़े पासवान की भी यह चाहत थी, पूरी नहीं हुई। चिराग के सामने यह अवसर है। अवसर है तो गणित भिड़ाना कोई पाप नहीं। पार्टियों के दलदल में चिराग भी अपना झंडा उठाए अपने तर्कों से आगे बढ़ रहे हैं।

2014 को याद कीजिए। बड़े पासवान बीजेपी की सरकार में शामिल नहीं होना चाहते थे। तब बड़े पासवान सोनिया गांधी के ज्यादा करीब थे, लेकिन चिराग ने बदलती राजनीति में बड़े पासवान को मनाया और एनडीए में लोजपा को शामिल करा लिया। तब से ही लोजपा बीजेपी के संबंध मधुर हैं। आगे क्या होगा कोई नहीं जानता।

लोजपा का खेल
सामने बिहार का चुनाव है। बिहार की सत्ता पर काबिज होने की लड़ाई है। एक तरफ महागठबंधन के अगुआ राजद का नेतृत्व लालू पुत्र तेजस्वी यादव के हाथ में है। साथ में कमजोर हो चुकी कांग्रेस की डफली बज रही है। तेजस्वी भी सीएम उम्मीदवार हैं। चाचा नितीश ने उन्हें धोखा दिया था। साथ लड़कर भी बीजेपी के संग चले गए चाचा नीतीश की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तेजस्वी कुछ भी करने को तैयार हैं।

इधर, चिराग को भी नीतीश कुमार की राजनीति से परहेज है और चिढ़ भी। एक दिन पहले लोजपा की बैठक हुई और तय हो गया कि लोजपा एनडीए के साथ भी है, लेकिन नीतीश के खिलाफ भी। यह विचित्र नजारा है। जाहिर है इस खेल के रचयिता बड़े पासवान हैं। उनका मौसम विज्ञान स्थित प्रज्ञ लग रहा है। कोई आहट उस विज्ञान से अभी नहीं मिली है, इसलिए मामला अधर में है। यह अधर ही शंका का समाधान निकालेगा। चिराग उसी राह पर लहे-लहे बढ़ रहे हैं। 

खेल के भीतर का खेल
ऊपर का खेल तो साफ़ है कि लोजपा नीतीश की राजनीति का विरोध करेगी। एनडीए में रहकर भी जदयू के विरोध में चुनाव लड़ेगी। नीतीश की राजनीति के खिलाफ लोजपा उम्मीदवार उतारेगी। नीतीश को हर हाल में चुनौती देगी। यह तो ऊपर का नजारा है, लेकिन भीतर का नजारा बड़ा ही दिलचस्प और मजेदार है। कहानी ये है कि बीजेपी खुद चाहती है कि उसका जदयू से साथ छूट जाए। जदयू के साथ रहकर बीजेपी कभी इकलौती सरकार नहीं बना पाएगी। बीजेपी कभी अपना सीएम नहीं बना पाएगी। बीजेपी को यह सब असह्य है। बीजेपी घुटन में है। बीजेपी ने चिराग को बल दिया। आगे बढ़ाया। सौदा किया और चिराग मैदान में खड़े हो गए।

इधर चिराग ने बड़े पासवान से मंत्रणा की। राजनीति का करवट पूछा। बड़े पासवान ने तरकीब निकाली। शांत रहो और वाच करो। रास्ता निकल जाएगा। पासवान की समझ जुदा है। खेल यह है कि लोजपा ने 243 सीटों में से 143 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया है। याद रहे जदयू अपने सहयोगी मांझी के साथ 143 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रही है।

अब लोजपा वहां अपना उम्मीदवार भी उतारेगी। बाकी की सौ सीटों पर बीजेपी चुनाव लड़ेगी। वहां लोजपा के लोग बीजेपी का समर्थन करेंगे या फिर मौन रहेंगे। नीतीश कुमार चूंकि घाघ नेता हैं, इसलिए इन खेलों को समझ रहे हैं, लेकिन अभी कुछ कर नहीं सकते। वे बीजेपी के आतंरिक खेल को भी समझ रहे हैं लेकिन मौन हैं। मुकाबला तो मैदान में होना है।

बड़े पासवान का गणित
बड़े पासवान का खेल निराला है। चिराग जदयू के उम्मीदवार के खिलाफ लोजपा उम्मीदवार उतारेंगे, यह तो साफ़ है। इसमें खेल यह है कि अगर बीजेपी को चुनाव में बढ़त मिल गई तो लोजपा के साथ मिलकर सरकार बन सकती है। जानकारी के मुताबिक़ लोजपा की सीट से बीजेपी के भी कई बागी उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। और पार्टी की जीत हासिल हो गई तो सब मिलकर सरकार बनाएंगे। सीटें कम पड़ीं तो महागठबंधन में भी घुसपैठ की जा सकती है।

ऐसे में चिराग को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सकती है और बीजेपी सरकार बनाने लायक सीटें नहीं ला सकी तो भी कोई बात नहीं। एनडीए में रहते हुए लोजपा फिर अपनी शर्तों के मुताबिक़ महागठबंधन को रोकने के लिए सरकार में शामिल हो जाएगी। नीतीश कुमार की तब मजबूरी होगी।

एक और कहानी है। अगर चुनाव परिणाम  महागठबंधन के पक्ष में जाते हैं तो चिराग यहां भी हाथ मार सकते हैं। चिराग अगर ज्यादा सीटें जीतने में सफल हो जाते हैं तो यहां भी मोलभाव का सकते हैं। जितनी ज्यादा सीटें होंगी लोजपा का कद उतना ही बड़ा होगा और उसका पद उतना ही ऊंचा होगा। चिराग के दोनों हाथों में लड्डू है। बड़े पासवान का यह विज्ञान चिराग को लुभाता है, लेकिन बिहारी समाज को भरमाता है।

  • अखिलेश अखिल

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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