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ओहदा राज्यपाल का है लेकिन आचरण नेता प्रतिपक्ष जैसा!

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा और उनके सहयोगियों पर हुए कथित हमले को लेकर वहां के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने जिस तरह राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है, वह जरा भी हैरान नहीं करता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जो धमकी वे पिछले तीन-चार महीनों से संकेतों में दे रहे थे, उसे अब खुल कर देख रहे हैं। वे राज्य सरकार से बात करने के बजाय सीधे मीडिया से बात कर रहे हैं। वे संविधान की दुहाई देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं, लेकिन संवैधानिक मर्यादा और अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए राज्य सरकार को लगातार परेशान कर रहे हैं। कुल मिलाकर कहने को तो जगदीप धनखड़ राज्यपाल हैं लेकिन वे आचरण बिल्कुल नेता प्रतिपक्ष की तरह कर रहे हैं।

विपक्ष शासित राज्यों को राज्यपालों द्वारा परेशान या अस्थिर करने की हरकतें कांग्रेस के जमाने में भी होती थीं, लेकिन कभी-कभार ही। मगर पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान तो ऐसा होना सामान्य बात हो गई है। सिर्फ पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, दिल्ली आदि राज्यों में भी वहां की सरकारों के खिलाफ राज्यपालों ने एक तरह से आंदोलन ही छेड़ रखा है। ऐसा लग रहा है मानो इन राज्यों के राजभवन विपक्षी पार्टी के कार्यालय के रूप में तब्दील हो गए हैं और राज्यपाल नेता प्रतिपक्ष के भूमिका धारण किए हुए हैं।

केंद्र सरकार की राजनीतिक भाव-भंगिमा को समझते हुए इन राज्यों में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देने वाले राज्यपालों में जगदीप धनखड़ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसलिए कि वे पिछले साल राज्यपाल बनने के बाद से ही राज्य सरकार से टकराव के हालात पैदा करते रहे हैं।

दरअसल पश्चिम बंगाल में कुछ महीनों बाद विधानसभा का चुनाव होना है। जैसे तैसे बिहार जीत लेने के बाद भाजपा का अगला लक्ष्य पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाना है। इसलिए भाजपा ने सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ एक तरह से युद्ध छेड़ रखा है। चूंकि इस युद्ध में भाजपा के सेनापति गृह मंत्री अमित शाह हैं, इसलिए राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने भी खुद को वफादार सूबेदार की तरह इस युद्ध में झोंक रखा है।

कोई भी राज्यपाल अगर अपने सूबे की सरकार के किसी कामकाज में कोई गलती पाता है तो इस बारे में उसे सरकार का ध्यान आकर्षित करने का पूरा अधिकार है। सरकार को किसी भी मुद्दे पर अपने सुझाव या निर्देश देना भी राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है। लेकिन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ऐसा नहीं करते।

राज्यपाल बनने से पहले कई दलों में रह चुके जगदीप धनखड़ राज्यपाल के रूप में भी आमतौर पर मीडिया के माध्यम से ही सरकार से संवाद करते हैं। वे कभी राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक रूप से सरकार की खिंचाई करते हैं तो कभी राज्य सरकार की नीतियों की कमियां गिनाते रहते हैं। वे विभिन्न सरकारी महकमों के शीर्ष अफसरों को भी सीधे निर्देश देते रहते हैं। कुछ दिनों पहले तो राज्यपाल ने यहां तक कह दिया था कि पश्चिम बंगाल ‘पुलिस शासित राज्य’ बन गया है। उन्होंने राज्य के शीर्षस्थ पुलिस अधिकारी पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता की तरह आरोप लगाते हुए राज्य सरकार के खिलाफ ‘सख्त’ कार्रवाई करने की चेतावनी भी दे डाली थी। धनखड़ से पहले उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता केसरीनाथ त्रिपाठी पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे। उनका भी पूरा कार्यकाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से टकराव में ही बीता था।

अपनी गैर जिम्मेदाराना और संविधान विरोधी हरकतों के लिए कुख्यात राज्यपालों में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी भी किसी से पीछे नहीं हैं। कोश्यारी ने भी अभी कुछ ही दिनों पहले अभूतपूर्व राजनीतिक बेहयाई का प्रदर्शन किया था। उन्होंने एक संगीन आपराधिक मामले में गिरफ्तार किए गए रिपब्लिक टीवी चैनल के मालिक अर्णब गोस्वामी के मामले में अनावश्यक दखलंदाजी की थी। उन्होंने जेल में बंद गोस्वामी की सुरक्षा और सेहत को लेकर राज्य सरकार के समक्ष अपनी चिंता जताई थी और सरकार से कहा था कि वह गोस्वामी से उनके परिवार को मिलने की इजाजत दे।

सीधे-सीधे एक गंभीर आपराधिक मामले के आरोपी के बचाव में कोश्यारी का इस तरह सामने आना न सिर्फ अपने अधिकार क्षेत्र को लांघना था बल्कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की मर्यादा के खिलाफ भी बेहद अशोभनीय आचरण था। अर्णब गोस्वामी न्यायिक हिरासत में था और उसकी जमानत का मामला अदालत में विचाराधीन था, इसलिए राज्यपाल का यह हस्तक्षेप सीधे-सीधे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने यानी अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश थी। इसीलिए अगर सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित न्यायिक प्रक्रिया और परंपरा को परे रखकर अर्णब की जमानत मंजूर कर ली तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।

जेल में बंद किसी भी आरोपी या सजायाफ्ता कैदी की सुरक्षा और सेहत का ध्यान रखना बेशक राज्य सरकार की जिम्मेदारी में आता है, लेकिन दो व्यक्तियों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार बताए जा रहे एक व्यक्ति विशेष के बचाव में राज्यपाल कोश्यारी का उतरना बताता है कि एक व्यक्ति और एक राजनेता के तौर पर उनके सरोकार कितने घटिया हैं। कुछ ही दिनों पहले मुंबई में फिल्मी अदाकारा कंगना रनौत के बंगले में अवैध निर्माण को प्रशासन द्वारा तोड़े जाने पर भी कोश्यारी इसी तरह कंगना के बचाव में खुलकर आए थे। पूरा देश देख रहा था कि नशे की आदी रही वह अभिनेत्री किस तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से कर रही थी लेकिन कोश्यारी राजभवन में उसे बुलाकर राज्य सरकार के खिलाफ उसकी शिकायत सुन रहे थे।

कोई भी राज्यपाल राजभवन में नागरिकों की समस्याएं सुने और उनके बारे में राज्य सरकार को कानून और संविधान के दायरे में उचित सुझाव या आदेश दे, इस पर किसी को एतराज नहीं हो सकता। लेकिन सवाल है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल की करुणा या कृपा सिर्फ आपराधिक मामलों से जुडीं उन हस्तियों पर ही क्यों बरसती है जो भाजपा के समर्थक होते हैं? सवाल यह भी है कि जितनी सहजता से अर्णब गोस्वामी के परिवारजनों या कंगना रनौत राजभवन पहुंच गए, क्या महाराष्ट्र का कोई आम नागरिक भी उतनी ही आसानी से राजभवन जाकर राज्यपाल से मिल सकता है?

दरअसल महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई में चल रही महाविकास अघाड़ी की सरकार शुरू से ही राज्यपाल के निशाने पर रही है। अव्वल तो उन्होंने केंद्र सरकार और भाजपा के प्रति अपनी वफादारी का परिचय देते हुए शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन के बहुमत को नजरअंदाज कर भाजपा के बहुमत के दावे का परीक्षण किए बगैर अचानक रात के अंधेरे में ही देवेंद्र फडनवीस को शपथ दिला दी थी। यह और बात है कि फडनवीस को महज दो दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा था और राज्यपाल को न चाहते हुए भी महाविकास अघाड़ी के नेता उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलानी पड़ी थी।

बाद में कोश्यारी ने पूरी कोशिश इस बात के लिए की कि उद्धव ठाकरे छह महीने की निर्धारित समय सीमा में विधान मंडल का सदस्य न बनने पाएं। वह मामला भी आखिरकार तब ही निबटा जब ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की गुहार लगाई। प्रधानमंत्री के दखल से ही वहां विधान परिषद के चुनाव हुए और ठाकरे विधान मंडल के सदस्य बन पाए।

यही नहीं, जब कोरोना संक्रमण के खतरे को नजरअंदाज करते हुए महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं ने राज्य के बंद मंदिरों को खुलवाने के लिए आंदोलन शुरू किया तो राज्यपाल ने खुद को उस मुहिम से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में मंदिर न खोलने के लिए ठाकरे पर बेहद अशोभनीय तंज करते हुए कहा, ”पहले तो आप हिंदुत्ववादी थे, अब क्या सेक्युलर हो गए हैं?’’ संविधान और उसके बुनियादी तत्व धर्मनिरपेक्षता का मखौल उड़ाने वाली उनकी इस फूहड़ टिप्पणी को बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी गैरजरुरी और गैरवाजिब बताया।

राजस्थान, पंजाब, और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की और केरल वाम मोर्चा की सरकार हैं। इन राज्यों में भी राज्यपाल और सरकार के बीच आए दिन टकराव के हालात बनते रहते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए विवादास्पद कृषि कानूनों पर विचार करने के लिए राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने अपने यहां राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाना चाहा तो इसके लिए पहले तो वहां के राज्यपालों ने मंजूरी नहीं दी और और कई तरह के सवाल उठाए। बाद में केंद्र सरकार के निर्देश पर विधानसभा सत्र बुलाने की मंजूरी दी भी तो विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय कृषि संबंधी केंद्रीय कानूनों के विरुद्ध पारित विधेयकों और प्रस्तावों को मंजूरी देने से इंकार कर दिया।

इससे पहले केरल में भी सरकार और राज्यपाल के बीच ऐसा ही टकराव पैदा हुआ था। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ जब केरल विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ तो राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने उसे पता नहीं किस आधार पर असंवैधानिक बता दिया। बाद में जब राज्य सरकार ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी तो राज्यपाल ने इस पर भी एतराज जताया और कहा कि सरकार ने ऐसा करने के पहले उनसे अनुमति नहीं ली। यही नहीं, राज्यपाल इस मुद्दे को लेकर मीडिया में भी गए। मीडिया के सामने भी वे राज्यपाल से ज्यादा केंद्र सरकार के प्रवक्ता बनकर पेश आए और नागरिकता संशोधन कानून पर राज्य सरकार के ऐतराज को खारिज करते रहे।

पिछले छह सालों के दौरान राज्यों में चुनाव के बाद विपक्ष को सरकार बनाने से रोकने, विपक्षी दलों की सरकारों को विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए गिराने या गिराने की कोशिश करने और वहां भाजपा की सरकार बनाने के कारनामे भी खूब हुए हैं। इन सभी खेलों में उन राज्यपालों ने अहम भूमिका निभाई है। इस सिलसिले में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का जिक्र तो ऊपर हो ही चुका है। उनके अलावा कर्नाटक में वजुभाई वाला, राजस्थान में कलराज मिश्र, जम्मू-कश्मीर में सतपाल मलिक, मध्य प्रदेश में लालजी टंडन, मणिपुर में नजमा हेपतुल्लाह और हाल ही में दिवंगत हुईं गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा आदि के दलीय राजनीति से प्रेरित असंवैधानिक कारनामे भी जगजाहिर हैं।

विपक्षी दलों की सरकारों को परेशान करने और ऊलजुलूल राजनीतिक बयान देने वाले राज्यपालों में राम नाईक, आनंदीबेन पटेल, कल्याण सिंह आदि भी किसी से पीछे नहीं रहे। इस सिलसिले में तथागत रॉय का नाम भी उल्लेखनीय है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के अध्यक्ष रहे तथागत रॉय ने त्रिपुरा का राज्यपाल रहते हुए सार्वजनिक तौर पर महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की तारीफ करने से लेकर मुसलमानों का मताधिकार छीन लेने जैसे कई बयान दिए। लेकिन उनका सबसे चौंकाने वाला बयान यह था कि भारत में हिंदू-मुस्लिम समस्या का समाधान सिर्फ गृहयुद्ध से ही निकल सकता है। हैरानी की बात यह है कि उनके इस तरह के बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ बयान का भी केंद्र सरकार और राष्ट्रपति ने संज्ञान नहीं लिया।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राज्यपाल पद के अवमूल्यन में कांग्रेस शासन के दौरान जो कमियां रह गई थीं, वह पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान केंद्र सरकार के संरक्षण में तमाम राज्यपालों ने अपने कारनामों से पूरी कर दी हैं। राज्यपालों के अमर्यादित, असंवैधानिक और गरिमाहीन आचरण के जो रिकॉर्ड इस दौरान बने हैं, उनको अब शायद ही कोई तोड़ पाएगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 12, 2020 3:17 pm

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