कानपुर एनकाउंटर: आम पुलिस के बस की बात नहीं, क्राइम विशेषज्ञों को लगाए सरकार

कानपुर मुठभेड़ कांड उत्तर प्रदेश सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। यदि सरकार ने अपराध अन्वेषण में दक्ष पेशेवरों को नहीं लगाया तो यह ट्रायल के स्तर पर अदालत में भी पुलिस प्रशासन के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकता है, क्योंकि मुख्य आरोपी विकास दुबे के अलावा पूरा मामला ब्लाइंड केस की तरह है, जिसमें अन्य हमलावरों की पहचान करना, गिरफ्तार करना और उनकी भूमिका को अदालत में बिना संदेह के सिद्ध करने की चुनौती है।

यूपी के कानपुर में दबिश देने जाना पुलिस बल पर बहुत भारी पड़ा और विभीषण पुलिस के कारण पहले से ही घात लगाकर 8 पुलिसकर्मियों की हत्या की घटना के बाद से हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे फरार है। फ़िलहाल उस पर ढाई लाख का ईनाम घोषित हो चुका है और पुलिस की 40 टीमें उसकी गिरफ्तारी के लिए रात दिन एक किये हुए हैं। कानून के जानकारों का कहना है कि भले ही अचानक ये कांड घटित हुआ हो पर यदि विकास दुबे पकड़ भी लिया जाए तो क़ानूनी दृष्टि से उसे सज़ा दिलाने में पुलिस को नाकों चने चबाना पड़ सकता है। यह पूरा प्रकरण बिहार के तमाम नरसंहारों की तरह है, जहाँ हत्यारों को सबूत के अभाव में अदालत को बरी करना पड़ा क्योंकि ट्रायल कोर्ट में ऐसी कोई गवाही नहीं हुई जिससे हत्या अभियुक्तों को सीधे हत्याओं से जोड़ा जा सके।

कानपुर की मुठभेड़ रात के अँधेरे में हुई और मौका ए वारदात पर संदिग्ध परिस्थितियों में  बिजली भी बंद थी। ऐसे में जिन अन्य असलहाधारियों को विकास दुबे ने बुलाकर घात लगाया था कोर्ट ऑफ़ लॉ में उनकी संलिप्तता कैसे प्रमाणित होगी, जबकि अभी तक उनके नाम अज्ञात हैं? विकास दुबे मौका ए वारदात पर मौजूद था यह भी पुलिस को असंदिग्ध रूप से सिद्ध करने की चुनौती होगी।

हत्याकांड के चार दिन से ज्यादा का समय बीत चुके हैं, लेकिन विकास दुबे पुलिस की पहुंच से दूर है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या दुबे इतना शातिर है कि पुलिस दबिश की सूचना पाकर जहाँ घटना को अंजाम देने के लिए अपने गिरोह के हमलावरों को बड़ी संख्या में बुला लिया वहीं घटना के बाद गिरोह के अन्य लोगों के साथ निकल भागने में भी सफल रहा। वारदात में कहा जा रहा है कि कम से कम 50 अपराधी शामिल रहे होंगे। फिर इतनी बड़ी संख्या में वे किधर भागे होंगे और सभी के सभी कहाँ गुम हो गए हैं।

इस बीच पूर्व वित मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने भी रात के अँधेरे में दबिश पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया है कि यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि एक प्रशिक्षित पुलिस बल सूर्यास्त के बाद किसी कुख्यात अपराधी को गिरफ्तार करने उसके ही गढ़ में जाएगी। त्रासदी का पूर्वाभास हो गया था।

कानपुर पुलिस ने विकास दुबे का घर जेसीबी से ध्वस्त करा दिया और जब इसकी वैधता पर सवाल उठा तो बहाना बनाया गया की उसने दीवारों में असलहे और गोला बारूद चुनवा रखे थे। पुलिस के इस दावे पर भी सवाल हैं।

पूर्व आईपीएस, यूपी बद्री प्रसाद सिंह ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है कि कानपुर देहात में अपराधियों द्वारा पुलिस कर्मियों की हुई जघन्य हत्या बहुत ही दुखद एवं पुलिस के इकबाल पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली है, लेकिन पुलिस द्वारा अपराधी का मकान ध्वस्त करना, उसकी गाड़ियों को नष्ट करना उसकी व्यवसायिक दक्षता की कलई खोल रहा है। किसी अपराधी की नियमानुसार कुर्की का तो प्रावधान है लेकिन उसकी सम्पत्ति को सरेआम नष्ट करने का अधिकार कहीं नहीं दिया गया। यह कर पुलिस क्या संदेश देना चाहती है कि उसे कानून की जानकारी नहीं है, वह अपराधियों को गिरफ्तार करने में असमर्थ है अथवा उसके ऊपर जनता , अधिकारी, शासन अथवा मीडिया का अत्यधिक दबाव है।

बद्री प्रसाद सिंह ने कहा है कि पुलिस अपना इतिहास क्यों भूल रही है कि पहले भी ऐसे अवसर आए हैं जब वह अपराधियों के सफाए के लिए दुर्दांत अपराधियों, आतंकियों को फर्जी मुठभेड़ में मारा है अथवा पुलिस कर्मी की हत्या के बदले उसने किसी अपराधी या निर्दोष को मारा है और बाद में जेल की सलाखों में शेष जीवन बिताना पड़ा है। कभी ये नुक्ते कारगर थे और चल जाते थे लेकिन अब मानवाधिकार आयोग, न्यायालय, मीडिया, वीडियो क्लिपिंग राज नेताओं के कारण ऐसे विधिविरुद्ध कार्य संभव नहीं हैं।

कानपुर में जब प्रदेश मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस के सभी वरिष्ठतम अधिकारी वहां थे, किस वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के निर्देश पर यह कार्यवाही हुई, शोध का विषय है। जो माफिया पुलिस कर्मियों की हत्या कर सकता है, वह तथा उसके शुभचिंतक निश्चित ही इसे न्यायालय ले जायेंगे तब केवल निचले पुलिस कर्मी ही फसेंगे क्योंकि साक्ष्य उन्हीं के विरुद्ध होगा। वरिष्ठ अधिकारी तो तत्काल अपने निर्देश से मुकर जाएगा।

बद्री प्रसाद सिंह ने कहा है कि माफिया सरकार, प्रशासन एवं पुलिस की नाजायज औलाद है। पहले वह जाति बिरादरी, रिश्र्वत, राजनेताओं का सहयोग लेकर ठेका परमिट का धंधा कर धन अर्जित करता है, पुलिस तथा प्रशासन की सेवा कर स्वयं को बचाता है। धीरे-धीरे अपना कद बढ़ा कर राजनीति में आता है या किंगमेकर बनता है। चुनाव में धनबल, बाहुबल का प्रदर्शन कर सत्तारूढ़ दल का विश्वास पात्र बनकर स्थानीय अधिकारियों को अपनी जूती के नीचे रख कर अपना आर्थिक साम्राज्य तथा बाहुबल का विस्तार करता है और अपने क्षेत्र, अपनी जाति का राबिन हुड बन जाता है। माफियाओं का हर विभाग में तथा आपस में भी संबंध होता है। उन्हें विभाग की सारी खबरें मिलती रहती हैं इसके लिए वे धन तथा जाति का सहारा लेते हैं। जिस माफिया की शासन, प्रशासन, न्यायपालिका तथा सत्ताधारी दल एवं मीडिया पर जितना दबदबा होगा वह उतना ही प्रभावशाली होगा।

उन्होंने कहा है कि कानपुर के इस प्रकरण में किसी थानाध्यक्ष द्वारा मुखबिरी की चर्चा है। विचारणीय है कि पूर्व सूचना पर भी विकास दुबे ने साथियों के साथ न भागकर पुलिस से मुठभेड़ करने का आत्मघाती कदम क्यों उठाया? रात के अंधेरे में आक्रमण करने वालों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य एकत्र करना भी आसान नहीं होगा। जो व्यक्ति थाने में प्रभावशाली की हत्या कर छूट जाए, ऐसे को इस प्रकरण में सजा कराना दुष्कर होगा। उन्होंने अपने पुलिस भाइयों से अनुरोध किया है कि किसी के दबाव, उकसाने पर गैरकानूनी कार्य न करें अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा।

अब सामने आ रहा है कि विकास दुबे और उसके गिरोह ने बहुत क्रूर तरीके से पुलिसकर्मियों को मारा। जहां एक गोली से जान ली जा सकती थी, वहां दर्ज़नों गोली मारी गयी। सीओ बिल्हौर देवेन्द्र मिश्रा को गोली मारने के बाद उनके अंग-भंग कर दिए गए। एक-एक पुलिसकर्मी को कई-कई गोली एक ही जगह मारी गयी । मारने के बाद शवों को जलाने के उद्देश्य से एक के ऊपर एक रखना और अतिरिक्त पुलिस बल के पहुंच जाने के कारण बिना जलाये भाग जाना दबिश देने गयी पुलिस से अत्यंत घृणा का परिचायक है।

यह भी संभव है कि मुखबिरी करने वाले थानेदार ने पहले से विकास को बता रखा हो कि सीओ देवेन्द्र मिश्रा उसकी खिलाफत करते हैं और उन्हीं के कारण यह दबिश पड़ रही है जो उसके और खूंखार होने का कारण बन गया। दरअसल विकास दुबे पूरी प्लानिंग में था कि कैसे ज्यादा से ज्यादा पुलिस वालों को नुकसान पहुंचाया जा सके।

कानपुर का बिकरू कांड पुलिस की आपसी ‘रंजिश’ का नतीजा है। चौबेपुर थाने के तत्कालीन एसओ विनय तिवारी और बिल्हौर सर्किल के डीएसपी देवेंद्र मिश्रा के संबंध बहुत तल्ख थे। विनय किसी भी तरह देवेंद्र को सर्किल से हटवाना चाहते थे।इसके अलावा चौबेपुर एसओ विनय तिवारी की गिनती कुख्यात विकास दूबे के बेहद करीबियों में होती थी। सीनियर अधिकारी देवेंद्र मिश्रा के हस्तक्षेप से एसओ विनय तिवारी खिसियाता था। विकास के सियासी रसूख का इस्तेमाल कर उसने देवेंद्र मिश्रा को हटवाने का प्रयास किया। विनय ने कथित तौर पर विकास के मन में सीओ के खिलाफ खूब जहर भरा।

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विकास अपने परिवार में अकेला हिस्ट्रीशीटर नहीं है, बल्कि उसके तीन भाई अतुल दुबे, दीपू दुबे और संजय दुबे भी चौबेपुर थाने में हिस्ट्रीशीटर के तौर पर दर्ज हैं। थाने में लगे हिस्ट्रीशीट बोर्ड पर चारों भाइयों के नाम लिखे हुए हैं।

कुछ सुर्खियाँ –

-कानपुर मुठभेड़ में शहीद हुए डीएसपी देवेंद्र मिश्रा ने सस्पेंड एसएचओ विनय तिवारी को करप्ट बताते हुए उनकी काई शिकायत की थी।

-अपराधियों ने एके-47 जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल किया।

-सीओ देवेंद्र मिश्रा को – चेहरे से सटाकर गोली मारी गई। उनका सिर और गर्दन का हिस्सा तक उड़ गया।

-चौकी प्रभारी अनूप सिंह को सात गोलियां मारी गईं। थाना प्रभारी महेश को चेहरे पीठ और सीने पर पांच गोली, -दरोगा नेबूलाल को चार गोलियां लगीं।

-चार सिपाही थे, जिनके शरीर से गोलियां आर-पार हो गईं.

-शूट आउट को लेकर जांच में विकास दुबे से कुछ पुलिस वालों की मिलीभगत सामने आई है। इस मामले में कॉल डीटेल के आधार पर दो दरोगा और दो सिपाही समेत चार पुलिसकर्मी सस्पेंड।

-पुलिस वालों के कॉल रेकॉर्ड से पता चला दबिश से पहले भी वे विकास दुबे के संपर्क में थे।

-विकास दुबे के करीबी दयाशंकर अग्निहोत्री ने भी पुलिस को दिया था बयान कि थाने से दबिश की दी गई थी सूचना।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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