Tuesday, March 5, 2024

15 वर्षों से केवल जड़ी-बूटियों से सर्पदंश का इलाज कर ग़रीबों को जीवन दान दे रहे हैं हनुक लकड़ा

झारखंड। लातेहार जिला मुख्यालय से लगभग 47 किमी दूर है बालूमाथ प्रखंड, और बालूमाथ प्रखंड मुख्यालय से 8 किमी दूर बसा है चितरपुर गांव। जहां के निवासी हैं हनुक लकड़ा। 32 वर्षीय हनुक लकड़ा विगत 15 वर्षों से निर्बाध रूप से सर्पदंश जैसे जानलेवा विष से प्रभावित पीड़ितों का उपचार करते आ रहे हैं। खासकर इनके पास ऐसे लोगों का उपचार होता है जिनके पास ऐसी स्थिति नहीं होती कि वे अपने इलाज के लिए निजी अस्पताल तो क्या सरकारी अस्पताल भी जाएं। क्योंकि बालूमाथ प्रखंड मुख्यालय के एकमात्र अकेले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रायः सर्पदंश की दवाएं उपलब्ध नहीं रहतीं, वहीं लातेहार जिला अस्पताल की दूरी इतनी अधिक है कि वहां तक जाने के लिए इनके पास साधन नहीं होते। आज के इस प्रचारतंत्र और अर्थ प्रधान युग में जब कोई बिना किसी लोभ-लालच के जनहित के काम में अपना कीमती समय लगा रहा हो तो इससे बड़ी जनसेवा और क्या हो सकती है।

ऐसी ही जनसेवा में लगे हैं लातेहार जिले के बालूमाथ प्रखंड अंतर्गत चितरपुर गांव निवासी के हनुक लकड़ा। हनुक लकड़ा पिछले डेढ़ दशक से लगातार सर्पदंश से प्रभावित लोगों का मुफ्त इलाज करते आ रहे हैं। इतना ही नहीं कई आर्थिक रूप से अक्षम लोगों के इलाज के दौरान उनके भोजन की भी व्यवस्था करते हैं। इस काम में इनके परिवार सदस्यों की भी भूमिका अहम होती है। इनके इसी सद्प्रयास से 15 सालों में सर्पदंश से क्षेत्र के सैकड़ों पीड़ितों को जीवन दान मिलना संभव हो सका है। हनुक लकड़ा का दावा है कि सर्पदंश से पीड़ित यदि दवा निगलने वाली स्थिति तक उनके पास पहुंच जाएं तो निश्चय ही वे उनको मौत से बचाने में वे कामयाब रहेंगे।

फनिक, करैत, रसेल वाईपर जैसे विषैले सांपों के डसने से मनुष्य के शरीर में विष फैलने की गति की सूक्ष्मता को हनुक भली भांति जानते हैं और उसी गति से वे दवाओं को तैयार कर मरीज को सेवन कराते हैं तथा प्रभावित अंगों में लेप लगाते हैं। इनकी खासियत यह है कि ये केवल जंगली जड़ी-बूटियों से ही इलाज करते हैं। जिसके कारण उन्हें कोई आर्थिक बोझ जैसी परेशानी नहीं होती है और क्षेत्र के लोग भी बिना खर्च के इलाज करा पाते हैं।

नगर चंदवा निवासी अशोक उरांव और उनकी पत्नी सोनू उरांव (25 वर्ष) मजदूरी करके अपनी जीविका चलाते हैं। उनका पांच साल का एक बेटा है। सोनू उरांव 2 नवम्बर को जलावन की लकड़ी लाने जंगल गई थी। सूखी लकड़ियों को इकट्ठा करने के क्रम में उसे रसेल वाइपर जिसे सोनू स्थानीय भाषा में बहीरा जड़ा सांप बताती है, के ऊपर सोनू का पैर पड़ गया। पैर पड़ते ही सांप ने उसे डंस लिया। सोनू घबरा गई और घर आकर सांप के काटने की जानकारी घर वालों को दी।

हाथों में जड़ी-बूटी लिए हनुक लकड़ा

उसकी तबीयत भी खराब होने लगी तब घर वाले उसे लेकर हनुक लकड़ा के पास आए। लकड़ा ने जंगल की कई तरह की जड़ी-बूटियों को पीसा और सोनू को खिलाया और उसका लेप सोनू उरांव के पूरे पैर में लगाकर कपड़े की पट्टी बांधी। सोनू बताती हैं कि हनुक लकड़ा द्वारा दवा खिलाने और लेप लगाने के कुछ ही देर बाद उसे बेहतर महसूस होने लगा। सोनू बताती है कि हनुक वैद्य ने कहा है कि उनकी इलाज में 22 दिन तक रहना होगा, तब जाकर सांप शरीर के अंदर गया विष पूरी तरह खत्म होगा।

कहा जाता है कि रसेल वाइपर काफी जहरीला सांप होता है। वैसे तो वह काफी शिथिल होता है और उसके काटने की संभावना कम होती है, लेकिन जब उसके शरीर पर पैर वगैरह पड़ जाता है तब वह काटने में कोई गुरेज नहीं करता है। उसकी शारीरिक बनावट लगभग सूखी लकड़ी सी होती है जिसकी वजह से वह जंगल झाड़ी में दिख कर भी नहीं दिखता है और उसपर पैर पड़ जाता है, तब लोग उसके दंश का शिकार ही जाते हैं।

56 वर्षीय नावाडीह निवासी बनारस उरांव को 19 अगस्त को शौच के दौरान एक झाड़ी में रसेल वाइपर यानी स्थानीय भाषा में बहीरा जड़ा सांप ने काट लिया था। जिसका इलाज हनुक लकड़ा ने किया और वे ठीक हो गए। इस बावत जानकारी के लिए जब हमने बनारस उरांव से भेट करने की कोशिश की तो वे नहीं मिले। उनके बेटे मनोज लकड़ा ने बताया कि – “पिताजी को 19 अगस्त को शाम के करीब 5 बजे शौच के दौरान एक झाड़ी में बहीरा जड़ा सांप ने काट लिया था। हमलोग को पता चला तो हमलोग उन्हें हनुक लकड़ा के पास चितरपुर ले गए, जो हमारे गांव से एक किमी दूर है। उन्होंने तुरंत खाने के लिए दवा दी और उसके बाद जिस पैर में सांप ने काटा था उसमें दवाई का लेप लगाया। यह इलाज 21 दिन तक चला। मेरे पिता 21 दिन तक लकड़ा जी के घर पर ही रूके रहे।”

यह पूछे जाने पर कि “इलाज का कितना पैसा लगा?” मनोज ने कहा कि “हनुक ने कोई पैसा नहीं मांगा, 21 दिन तक पिताजी वहीं रहे। हमलोग उनके लिए खाना वगैरह वहां पहुंचाते थे, बस इतना ही, बाकी कुछ नहीं देना पड़ा।“ कहा जाता है कि हनुक लकड़ा को यह नैसर्गिक गुण अपने मामा नेम्हस मिंज और अपने जीजा अयूब कुजूर से मिली हुई है। नेम्हस मिंज प्रसिद्ध होड़ोपैथ के जानकार पी० पी० हेम्ब्रोम के शिष्य रहे थे। वहीं अयूब कुजूर हटिंग होड़े का चेला रहे हैं।

हनुक लकड़ा को मिला प्रमाण पत्र

हनुक लकड़ा बताते हैं कि उन्होंने भी बालूमाथ, चंदवा और चतरा के इलाके में प्रदीप उरांव, राजू उरांव, आशिष उरांव, प्रेम प्रकाश लकड़ा, मुकेश उरांव, सोमा उरांव, मुनेश्वर उरांव, प्रकाश उरांव और सुरेन्द्र उरांव को इस होड़ोपैथी चिकित्सा पद्धति के लिए तैयार किया है, जो इस पद्धति से सर्पदंश से प्रभावित लोगों का इलाज कर उन्हें जीवन दान दे रहे हैं।

हनुक बताते हैं कि रसेल वाइपर के काटे जाने के बाद मनुष्य के शरीर में होने वाले गंभीर बारीकियों को हम बारीकी से समझते हैं। वे बताते हैं कि मरीज के शरीर में पहले तीव्र लहर और जलन होती है, जिससे इन्सान बेहद घबराने लगता है। वे बताते हैं कि इस अवधि में हम जंगली जड़ी-बूटियों को खिलाकर और पिलाकर लहर और जलन को शांत कर देते हैं। इसके बाद शरीर के डसे हुए भाग पर लेप चढ़ाने का काम करते हैं। क्योंकि शरीर के डंसे हुए भाग में सूजन प्रारंभ हो जाता है और चौथे चरण में शरीर के उस भाग का मांस सड़ने-गलने लगता है जो कि बेहद खतरनाक स्थिति होती है।

वे बताते हैं कि लगातार दिए जा रहे दवाइयों के असर के बाद भी दंश प्रभावित उस भाग में करीब 96 घंटे तक सूजन और सड़न की प्रक्रिया बनी रहती है। यही वह स्थिति होती है जब पीड़ित और उनके परिजन घबराने लगते हैं, उन्हें लगने लगता है कि वे यहां बेवजह अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से सक्षम कई मरीज के परिजन इलाज के लिए मरीज को बड़े अस्पताल में ले जाते हैं। जबकि गरीबों के लिए ऐसा कर पाना बेहद मुश्किल होता है ऐसे में वे हम पर भरोसा करते हैं और हम उनके भरोसा टूटने नहीं देते। अंततः वे ठीक होकर ही घर जाते हैं।

बकौल हनुक लकड़ा सूजन यदि मनुष्य के किडनी और लीवर तक पहुंच जाए तो लाख दवाइयों के बाद भी मरीज की जान बचाना नामुमकिन सा हो जाता है। वो कहते हैं उनके पास तो किडनी और लीवर इन्फेक्शन जांच के लिए उपकरण तो नहीं है, लेकिन पीड़ित मरीज का पेशाब और पाखाना रुक जाता है, तो हम समझ जाते हैं कि उनके किडनी और लीवर ने काम करना बन्द कर दिया है।ऐसे गम्भीर मरीजों को ईलाज करने का जोखिम हम नहीं उठाना चाहते हैं। लेकिन यदि कोई निर्धन मरीज हाथ खड़े कर देते हैं कि वो कहीं और ले जाने में सक्षम नहीं हैं, जो होगा देखा जाएगा। वैसी परिस्थितियों में अंतिम सांस तक हम पीड़ित मरीजों की सेवा करते हैं।

जड़ी-बूटी तैयार करते हनुक लकड़ा

हनुक बताते हैं कि सूजन बढ़ने के दौरान 96 घंटे तक वे मरीज को प्रत्येक 4 से 6 घंटे के अंतराल में जड़ी-बूटियों से तैयार लेप से सर्प के विष के प्रभाव को कम करते हैं। इस दरम्यान मरीज हनुक लकड़ा के घर में ही रहते हैं। इसके लिए हनुक या उनका परिवार किसी तरह की राशि का भुगतान नहीं लेते हैं। यहां तक कि उल्टे गरीब मरीज हनुक और उसके परिवार के लिए जो खाना बनता है, उसी में वे पारिवारिक सदस्य की तरह आहार ग्रहण करते हैं। मरीजों के लिए हनुक के यहां रुकना अनिवार्य होता है और इसी शर्त पर वो इलाज भी शुरू करते हैं। पीड़ित मरीज में विष की मात्रा के अनुसार मरीज को पूर्णत: ठीक होने में 12 से 22 दिन का समय लग जाता है।

हनुक बताते हैं कि रसेल वाईपर जब सामान्य स्थिति में किसी वजह से डसता है तो उसमें विष की मात्रा कम छोड़ता है, किन्तु यही सांप गुस्से की स्थिति में ज्यादा विष छोड़ता है। इस परिस्थिति में पूर्णत: ठीक होने में मरीज को 22 दिनों का समय लगता है। बालूमाथ प्रखंड मुख्यालय में स्थित अकेले बालूमाथ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. प्रकाश बड़ाइक से जब हमने सवाल किया कि चितरपुर गांव के निवासी हनुक लकड़ा सर्पदंश का इलाज जंगल की जड़ी-बूटियों से करते हैं, इसपर आप क्या कहना चाहेंगे? इस डॉ. बड़ाइक कहते हैं कि आदिवासी समाज प्रारंभ से ही जंगल की जड़ी-बूटियों पर निर्भर रहा है। अगर इलाज करने वाले व्यक्ति को जानकारी सही है तो इलाज संभव है, इसे नकारा नहीं जा सकता।

जंगलों के तेजी से बंजर भूमि में परिवर्तित होने के कारण हनुक ही नहीं कई ऐसी जड़ी-बूटी से इलाज में महारत हासिल किए लोगों को अपने पुश्तैनी ज्ञान को संजोये रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बिगड़ते पर्यावरण की स्थिति के कारण अब जंगलों में जड़ी बूटी ढूंढने में काफी समय लग जाता है। हनुक इस विद्या को अधिक से अधिक जानकारों तक फैलाना चाहते हैं। इसके लिए वे समय-समय पर ट्रेनिंग प्रोग्राम भी संचालित करते हैं।

हनुक कहते है कि उनकी दिली इच्छा है कि आयुष मंत्रालय, भारत सरकार और ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा 20 अगस्त 2020 को संयुक्त रूप से जारी दिशा-निर्देश के आलोक में मनरेगा के तहत जड़ी बूटियों की बागवानी जिला प्रशासन प्रारंभ करे। इससे लोगों को रोजगार भी मिलेगा और हम अपने आदिवासी धरोहर को संरक्षित करने में सक्षम भी हो सकेंगे।

(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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