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कोविड ग्रस्त इंसानी जिंदगियों के अनूठे तरीके से रहबर बने नगालैंड के कोन्याक

इस कोविड महामारी के दौरान नगालैंड के मोन जिले में रहने वाले 39 वर्षीय होंगनाओ कोन्याक ने अपनी एम्बुलेंस से सैकड़ों लोगों की जान बचाई। इस अभूतपूर्व लॉकडाउन के दौर में अपनी निजी गाड़ी को एक कामचलाऊ एम्बुलेंस में बदल कर, अपने खर्च पर वे आपातकालीन स्थितियों में फंसे मरीजों को चौबीसों घंटे मुफ्त सेवा देते रहे हैं।

जब मोन जिला अस्पताल को कोविड अस्पताल घोषित कर दिया गया तो इनडोर मरीजों को तो दूसरी जगहों पर शिफ्ट किया जाने लगा लेकिन ओपीडी मरीजों के पास कोई रास्ता नहीं बचा। मोन जिला मुख्यालय नगालैंड की राजधानी कोहिमा से 330 किलोमीटर दूर है। जिले में एक भी एम्बुलेंस नहीं थी। बाहर कोई वाहन नहीं चल रहा था। मेडिकल इमरजेंसी की हालत में लोग कहां जाते? कैसे जाते? होंगनाओ को यह बात बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी कि मेरी कार घर में खड़ी थी, जबकि मेरे समाज के लोग इतनी भीषण चुनौतियों से जूझ रहे थे। उन्होंने तय कर लिया कि इस दिक्कत को मैं दूर करूंगा। हालांकि वे एक बेरोजगार युवक हैं और दो वक्त की रोटी जुटाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं।

होंगनाओ ने सोचा, “इंसान की सेवा ही भगवान की सेवा है।” उन्होंने तय किया कि आपदा के इस काल में मैं अपनी क्षमता भर अपना योगदान दूंगा। उन्होंने जिला प्रशासन और जिला टास्क फोर्स से मिलकर अपनी कार से चौबीसों घंटे की मुफ्त एम्बुलेंस सेवा देने की इच्छा जाहिर की। प्रशासन ने उनके प्रस्ताव का स्वागत करते हुए आवश्यक एहतियात बरतने की हिदायत के साथ लिखित अनुमति दे दिया।

26 अप्रैल से 4 अगस्त, 2020 के बीच उन्होंने न केवल नगालैंड के मोन, अबोई और टिजिट से, बल्कि पड़ोसी राज्य असम के तेजपुर तक के मरीजों की मदद की। मरीजों को उनके घरों से लेकर अस्पताल पहुंचाना, उनकी अनिवार्य कोविड जांच कराना, उनके इलाज में मदद करना, उनके घरों तक छोड़ना, यह सब काम वे पूरे उत्साह और संवेदना के साथ करते रहे। सरकार और गुड़गांव स्थित एक एनजीओ की ओर से घोषित तीन एम्बुलेंसों में से एक के 4 अगस्त, 2020 को मोन जिला अस्पताल में पहुंच जाने के बाद वे 100 दिनों की इस अहर्निश सेवा से मुक्त हुए हैं।

उन्हें अफसोस है कि उनकी पूरी कोशिश के बावजूद दुर्भाग्य से कुछ मरीजों की जान नहीं बच सकी, फिर भी उन्होंने समय से चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचा कर सैकड़ों जिंदगियां बचाईं। उन्होंने कम से कम पचास गर्भवती महिलाओं को प्रसव कालीन आपात स्थिति में समय से अस्पताल पहुंचाया। ऐसी ही एक स्त्री को बुरी तरह से रक्तस्राव हो रहा था, उन्होंने अपना खून देकर उसकी जान बचाई।

इस घटना के बाद उन्होंने लोगों से संपर्क करके स्वैच्छिक रक्तदान करने वालों का एक समूह गठित किया जिससे काफी मरीज लाभान्वित हुए। उनके समूह के रक्तदान की ही वजह से कम से कम छह गर्भवती महिलाओं को रक्त मिल सका और उनकी जान बचाई जा सकी। इसी तरह हीमोफीलिया (एक वंशानुगत बीमारी जिसमें रक्तस्राव जल्दी रुकता नहीं है, क्योंकि खून को जमाने वाली प्रक्रिया क्षतिग्रस्त हो जाती है) से ग्रस्त एक युवक की जान बची। उसे बचाने के लिए ए-पॉजिटिव ग्रुप का पांच यूनिट खून होंगनाओ के इसी समूह ने उपलब्ध कराया। उस युवक के परिजन होंगनाओ को किसी मसीहा से कम नहीं समझते हैं।

सुदूरवर्ती गांवों से आने वाले ग्रामीण वहां बोली जाने वाली कोन्याक जनजातीय बोली को अपने-अपने इलाक़ाई प्रभावों के हिसाब से अलग-अलग तरीक़े से बोलते हैं। अतः उनकी बातों को कोन्याक बोली न समझने वाले चिकित्सा कर्मियों को समझाने के लिए उन्हें उनके और ग्रामीणों के बीच दुभाषिये के रूप में भी काम करना पड़ता था। साथ ही वे जहां भी जरूरत पड़ती थी, चिकित्सा कर्मियों को भी मदद करते थे। उन्होंने लॉकडाउऩ की वजह से देश के अनेक शहरों से लौट रहे प्रवासियों को भी उनके घरों तक पहुंचाने में मदद किया। वे चौबीसों घंटे फोन पर उपलब्ध रहते थे। उनके पास लोगों के दुखों और पीड़ा की असंख्य कहानियां हैं।

होंगनाओ के पिता हमशेन कोन्याक एक शिक्षक थे। तीन साल पहले अपने रिटायरमेंट के पैसे से उन्होंने अपने बेटे को यह एसयूवी खरीद कर देते हुए उनसे कहा था कि इस गाड़ी का इस्तेमाल अच्छे काम में करना। बेटे ने इस गाड़ी का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया कि आज उनका व्यक्तित्व नवयुवकों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुका है।

इस काम के दौरान बहुत सारे शुभेच्छुओं ने उनकी आर्थिक मदद करने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उन्होंने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। वे अपनी स्वेच्छा से यह खर्च खुद वहन करना चाहते थे। वे कहते हैं कि “इन स्थितियों ने मेरे भीतर जीवन का एक नया नजरिया पैदा किया, कि केवल इंसान ही है जो इंसानियत को बचाए रख सकता है। हमें दुनिया में अन्य किसी भी चीज से ज्यादा जरूरत एक-दूसरे की है। मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो किसी ने अब तक न किया हो, लेकिन जो अनुभव और संतुष्टि मैंने हासिल की है, वह अवर्णनीय है।”

होंगनाओ की कहानी इतनी आशंकाओं के बीच भी हमें मनुष्यता और उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। आज हमारा समाज एक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। हमारा देश दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी का देश है। इस युवा शक्ति का इस्तेमाल हम एक बेहतर वर्तमान और एक खूबसूरत कल के निर्माण के लिए कर सकते हैं। लेकिन युवा शक्ति के एक बड़े हिस्से को अंधेरे की शक्तियां बरगलाने में लगी हुई हैं। वे उन्हें अपने साथी मनुष्यों से जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर घृणा करना सिखा रही हैं।

वे युवकों को दकियानूसी और कूपमंडूक बनाए रख कर अपनी राजनीतिक सीढ़ी तैयार करने में लगी हैं। लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय का रोज गला घोंटा जा रहा है। अँधेरे की इन शक्तियों के बरक्श उजाले की ताक़तें काफी कमजोर दिख रही हैं। इसलिए आधुनिकता की चेतना पर आधारित वैश्विक भाईचारे वाली दुनिया, जिसे सच्चे अर्थों में ‘धरती पर स्वर्ग उतार लाना’ कहा जा सकता है, अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है।

लेकिन होंगनाओ कोन्याक जैसे युवाओं में पनप रही अपने समाज के अन्य मनुष्यों की वेदना के प्रति निःस्वार्थ सरोकार और त्याग की यह भावना बेहतर कल के प्रति हमारी उम्मीद और भरोसे के इस बिरवे को मुरझाने नहीं देगी। हम उम्मीद कर सकते हैं कि सभी युवाओं के पास एक बेहतर स्वप्न लेकर जाने की कोशिश ही घृणा फैलाने वाली अंधेरे की ताक़तों की गिरफ्त से उन्हें छुड़ाने और और उनकी असीम ऊर्जा को प्रेम तथा सहकार पर आधारित सुंदर समाज रचने की दिशा में नियोजित करने की पूर्वपीठिका तैयार करेगी।

(शैलेश स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

This post was last modified on October 15, 2020 7:17 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi