जब मंच पर लगे ताले, तो ये कर रहे हैं थियेटर वाले

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प्रतीकात्मक फोटो।

थियेटर और फिल्मों के अभिनेता-लेखक-कवि दोस्त अमितोष नागपाल की फेसबुक वॉल पर कुछ रंगकर्मियों की तरफ़ से एक कवितानुमा मार्मिक अपील है। ये युवा रंगकर्मी इस मुश्किल वक़्त में दर्शकों के प्यार को याद करते हैं और उनकी ज़िन्दगियों में घुल जाने वाले अपने चेहरों की याद दिलाते हैं। और फिर यह सवाल- `अब जब मंच पर लगे हैं ताले/क्या करेंगे थियेटर वाले?` यह भी कि `कहाँ से चलेगा घर/कहाँ से रेन्ट आएगा?` उदास सवालों के बीच ये रंगकर्मी संकल्प की तरह रास्ता भी सुझाते हैं – `आइए इस मुश्किल को मिलके आसान करते हैं।` `सोशल डिस्टेंसिंग` के शर्मनाक स्लोगन के राष्ट्रव्यापी शोर के बीच ये थियेटर वाले जानते हैं – `टुगैदर वी आर स्ट्रोंगर/टुगैदर वी आर अनब्रोकन/टुगैदर वी कैन ऐनीथिंग।` 

अमितोष नागपाल, निशांत, राजा, मनीष वर्मा, पूर्णा, राहुल, सुप्रिया, ब्रेशना, जाह्नवी, कौस्तव, नीलिमा, विपिन, अंकिता, नेहा, कल्याणी आदि ये रंगकर्मी जब यह प्रस्तुति तैयार कर रहे होंगे तो उन्हें लॉकडाउन में मुंबई में अचानक आर्थिक संकट में फंसकर रह गए रंगकर्मियों के अवसाद में जाने के संकट का अहसास भी रहा होगा। मूलत: मध्य प्रदेश की निवासी युवा रंगकर्मी प्रेक्षा मेहता की मौत मुंबई से मध्य प्रदेश तक और देश के दूसरे हिस्सों तक थियेटर से जुड़े लोगों को गहरे दु:ख और आशंकाओं से भर चुकी है। प्रेक्षा मुंबई में रहती थीं और टीवी के लोकप्रिय सीरियल्स से भी जुड़ी हुई थीं। थियेटर, फिल्म, सीरियल्स आदि से जुड़े बहुत से लोगों ने प्रेक्षा को अपने-अपने ढंग से याद करने के साथ ही एक अलग तरह के अभियान की शुरुआत भी की। एक-दूसरे का हला-चाल लेते रहने की मुहिम। 

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अमितोष ने लिखा- 

बस वक़्त के सही होने
का इंतज़ार मत करिये
अगर वक़्त है
तो किसी दोस्त से बात करिये
‘सब ठीक हो जायेगा’
ये बस खुद से मत कहिये
किसी दोस्त से भी कहिये
हो सकता है
आपके इतना कहने भर से
वो अपनी उदासी से लड़ जाए
नहीं तो जब सब ठीक होगा
तब हम ऐसे कई चेहरों को याद करके उदास होंगे
जो जब उदास थे तो निपट अकेले थे…

मुंबई में सक्रिय कवि दंपति बोधिसत्व व आभा बोधिसत्व ने अकेले पड़ गए या उलझन में घिरे साथियों के लिए अपील जारी की- “मुंबई के लोग और सिनेमा टीवी और साहित्य से जुड़े लोगों से निवेदन है कि किसी भी उलझन में कैसी भी समस्या में बात करें। हम सब अकेले और मुश्किल में हैं लेकिन बात करने से हर समस्या का समाधान निकलेगा। आप सामने टिप्पणी या कमेंट में नहीं लिख सकते तो इनबॉक्स में लिखें। हम साथ हैं आपके, आप भी हमारे साथ रहें।

आपको आपके घर जाने का, आप जहां हैं वहां भोजन पहुंचाने का और आगे आपको काम दिलाने का यत्न किया जाएगा। कृपया अपने फोन को चार्ज रखें। और फोन की ही तरह खुद को भी तैयार और फिट रखें। आप जो भी जहां भी हों अकेला और छूटे हुए नहीं हैं। यह अकेले की आफत नहीं है। इसलिए आप अकेले नहीं जूझें। हमारी पोस्ट को निजी चिट्ठी समझें। पुकार मान कर टच में रहें। मुंबई के बाहर के भाई-बंधु साथी वे जहां भी हों अगर उलझन में हों तो वे भी बात कर सकते हैं।“

दरअसल, मुंबई में थियेटर और फिल्मों में ऐसे फ्रीलांसर्स की संख्या बहुत बड़ी है जो लगभग डेली वेजेज जैसी स्थिति में काम का जुगाड़ कर जीवनयापन करते हैं। बिना काम के और आगे कोई उम्मीद का सिरा दिखाई न देने की स्थिति में उन लोगों को ही कोई रास्ता नहीं सूझ पा रहा है जिनकी स्थिति ज़रा सी ठीक कही जा सकती है। फ्लैट का किराया देना नामुमकिन हो रहा है। एक रंगकर्मी ने कहा, लॉकडाउन अचानक लागू नहीं किया जाता तो शायद बहुत से लोग अपने किराये के ठिकाने छोड़कर किसी के साथ एडजस्ट कर लेते। पटकथा लेखक उमाशंकर सिंह कहते हैं कि जब देश का मज़दूर सड़कों पर इतनी असहायता और दमन की स्थिति में फंसा हुआ हो तो छतों के साये में बैठे हुए लोगों के बारे में बात करने में संकोच होता है। फिल्मी दुनिया के बहुत से सीनियर और संपन्न लोग अपने स्तर पर मदद कर रहे हैं लेकिन संकट वाकई कल्पना से ज़्यादा बड़ा है।     

इस भयानक विपदा के दौरान मुंबई की फिल्मी और थियेटर की दुनिया से एक ख़ूबसूरत बात सामने आ रही है, वह है इस दुनिया के बहुत से ऐसे लेखकों, अभिनेताओं वगैरह की भूमिका जो बहुत ज़्य़ादा संपन्न भी नहीं हैं। बतौर आर्टिस्ट उनकी यह प्रतिबद्धता एनआरसी/सीएए आंदोलन के दौरान भी मुखर रूप से सामने आई थी। ये लोग सिर्फ आर्टिस्ट्स के लिए ही नहीं बल्कि आम लोगों की मदद के लिए भी निरंतर सक्रिय हैं। सभी लोगों का ज़िक्र मुमकिन नहीं है पर मुंबई के गोरेगांव, मढ़, मलाड, मालवानी, अंधेरी, बांद्रा, वर्सोवा, दहीसर, मीरा रोड, वसई, घाटकोपर, कांदीवली, धारावी, बोरीवली, आदर्श नगर, कोलाबा, डोंगरी, जेजे ह़ास्पिटल तेलीपुरा, भिंडी बाज़ार हांडीवाली मस्जिद, मुंबई सेट्रल, बुस्तान अपार्टमेंट, मदनपुरा, डागर चाल आदि विभिन्न इलाकों में ज़रूरतमंदों के लिए भोजन पहुँचाने के अभियान में सक्रिय कुछ कलाकारों का नाम सोशल मीडिया से उठाकर यहाँ बतौर उदाहरण उल्लेख कर दे रहा हूँ।

अर्पण रायचौधुरी, कुलदीप रुहिल, अजीत सिंह पालवट, दुर्वेश आर्य, मोहम्मद गिलानी पाशा, शुभम तिवारी, अमितोष नागपाल, अफ़रोज़ खान अंसारी, प्रणव सिंह, विवेक कुमार, दिलीप कुमार पांडेय, नेहा सिंह, अश्विनी श्रीवास्तव, मंगेश हडावले, प्रणव सिंह, रसिका आगाशे, सुखदेव सिंह, ज्ञानेंद्र त्रिपाठी, शशि रंजन, केसी पांडेय, सीमा पारी, निशंक वर्मा, शाहिद शेख़, विनीता वर्मा, विनोद चांद, एकता तिवारी, परेश नीरु पटेल, संजय भाटिया, हार्दिक शाह, श्रुति अग्रवाल, शनील सिन्हा, एमएन पार्थ, मिकी चिमनानी, सिमरिता उपाध्याय आदि कलाकार ख़ुद तो राहत अभियान संचालित कर ही रहे हैं, विभिन्न इलाकों में सक्रिय संस्थाओं के जरिये भी मदद उपलब्ध करा रहे हैं।

दिल्ली में अस्मिता थियेटर की मुहिम

रंग आलोचक और सोशल एक्टिविस्ट राजेश चन्द्रा ने दिल्ली के कलाकारों के लिए अस्मिता थियेटर ग्रुप की तरफ़ से मदद की मुहिम की जानकारी अपनी फेसबुक वॉल पर दी है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के रंगकर्मी, कलाकार और कला से जुड़े किसी भी साथी को लॉकडाउन में राशन सम्बन्धी बुनियादी दिक्कतें हों तो वे अस्मिता थियेटर से सम्पर्क कर सकते हैं। अस्मिता के साथी उन तक पहुंचेंगे। अस्मिता के एक्टिविस्ट अपने सीमित संसाधनों और साथियों की मदद से शुरुआती दिनों से ही व्यक्तिगत स्तर पर यह काम कर रहे हैं। कला जगत के लिए स्थितियां विकट हो रही हैं तो सबको मिलकर इसका सामना करना होगा। सहायता देने वाले और जरूरतमंद दोनों के लिए ही सम्पर्क नं. 9711100036 जारी किया गया है। राजेश चन्द्रा ने बताया कि निराशा या अवसाद की स्थितियों के मद्देनज़र यह अपील भी की गई है कि आर्टिस्ट सुबह से रात 12 बजे तक कभी भी फोन कर सकते हैं। फोन बिजी हो तो एसएमएस किया जा सकता है ताकि वापस फोन किया जा सके।

कई दूसरे राज्यों में भी विभिन्न संस्थाएं और थियेटर एक्टिविस्ट अपने स्तर से कलाकारों की मदद के लिए सक्रिय हैं। लेकिन, जितना बड़ा संकट है और यह जिस तरह लंबा खिंच रहा है, इन अभियानों के सामने भी संकट घिरने की आशंकाएं बढ़ गई हैं। रंगकर्मी सतीश मुख्तलिफ कहते हैं कि हर शहर में ऐसे अभियानों को मदद देने वाले गिने-चुने लोग होते हैं। ऐसे लोगों में बड़ी संख्या उन उदार लोगों की होती है जो ख़ुद कोई धन्ना सेठ नहीं होते। सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से जिस तरह मुँह मोड़ रही है, उससे इस संकट की सीमा का अंदाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में मदद करने वाले लोग अपने लिए भी आशंकित होने लगे हैं।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)  

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