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‘सिधपुर की भगतणें’ : प्रमादग्रस्त स्त्रियों की शील कथा

लगभग तीन साल पहले अपनी एक ट्रेन यात्रा में हमने इस उपन्यास को पढ़ने की कोशिश की थी। उसे इसलिये महज एक कोशिश ही कहेंगे क्योंकि उपन्यास की तरह की एक रचनात्मक विधा में किये गये किसी भी गंभीर काम को तब तक सही ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता है जब तक आप इतने इत्मिनान में न हों जिसमें अपनी कल्पनाशीलता के घोड़ों को दौड़ा कर लेखक ने चरित्रों के अंदर और बाहर में जो अंतराल छोड़े हैं, उन्हें यथासंभव पाटते हुए उनके सत्य के बहुआयामी रूप को नहीं पकड़ पाते हैं । इसीलिये ट्रेन में पढ़ा गया उपन्यास उससे महज एक प्रारंभिक परिचय कर लेने का उपक्रम ही साबित हुआ ; इस बात भर की जांच हुई कि क्या इस कृति की हमसे और गंभीर अन्वीक्षा की अपेक्षा भी है, अथवा तमाम अभिधामूलक वृत्तांतों की तरह उलट-पुलट कर देख लेने तक की मांग तक ही यह सीमित है !

ट्रेन से ही हमने इस उपन्यास पर अपनी एक तात्कालिक प्रतिक्रिया फेसबुक पर पोस्ट की थी, जिसमें वस्तुतः इतना ही प्रेषित किया गया था कि इस उपन्यास को गहराई से खंगाल कर देखने की गंभीर कोशिश की जरूरत है । और तभी से दिमाग में राजस्थान के एक सुदूरवर्ती सिधपुर गांव की एक हवेली के अंदर और उसके बाहरी दायरे की स्त्रियों के रहस्यमय प्रमादग्रस्त जीवन की एक पूरी श्रृंखला, शहर से कमाई करके गांव में सामंती ठाठ से जीने वाले एक ब्राह्मण परिवार के प्रतीकात्मक जगत की जटिलताओं, शिव मंदिर, बावड़ी, और उसके बीच गाड़ कर रखे गए त्रिशूल, भूत-प्रेत की बातें, आक, केर, करील, खेजड़ी, बबूल, खींप, धूल के बवंडर, आदि आदि के एक के बाद एक शब्द चित्रों और लोक मुहावरों, कहावतों तथा मान्यताओं के प्रयोग से निर्मित की गई पटकथा की छाया अटक सी गई थी ।

कुल मिला कर, उस पहली झलक ने विषय के प्रति एक आकर्षण पैदा करने का काम किया और यह इच्छा पैदा हुई कि आगे इस परिचय को गाढ़ा किया जाएगा, उपन्यास की गहराइयों में उतर कर अपने ढंग से इसके रहस्यों के पीछे की अटकी हुई बातों को निकाल कर प्रकृत अर्थों में इसका अपने लिये विमोचन किया जाएगा ।

बहरहाल, यात्रा के उपरांत उपन्यास न जाने मेरी किताबों के जंगल में कहां खो गया । हम इस उम्मीद में बैठे रहे कि हमने जरूर उसे अपनी पुस्तकों की सूची में उतार लिया है, मौका लगते ही या तलब होते ही उसे निकाल लूंगा । प्रथम परिचय के प्रभाव के चित्र अवचेतन में कहीं सरक गए थे, जिन्होंने गाहे-बगाहे कई मौकों पर दस्तकें भी दीं । पर हमेशा खोजने पर फिर किताब हाथ नहीं लगी । परिचय बढ़ाने की मन की इच्छा मन में ही रह गई ।

पर, हाल की अपनी लंदन यात्रा के पहले फिर एक बार हमें इस उपन्यास की तलब हुई । जब समझ में नहीं आया कि किताब को तत्काल कैसे हासिल करूं तो बहुत संकोच के साथ हमने खुद लेखक को ही एक निवेदन भेज दिया कि अगर मुझे किताब मिल जाती तो हमारा उपकार होगा । यह उनकी नेकदिली या सदाशयता थी कि प्रकाशक को कह कर उन्होंने मुझे किताब उपलब्ध करा दी और किताब हमारे साथ लंदन की सैर पर भी निकल पड़ी ।

लंदन यात्रा के कुछ अपने ही ऐसे तनाव और भाग-दौड़ थी कि बीस दिन में भी हम किताब पर ध्यान देने का मन नहीं बना सके । पर सहेज कर उसे साथ वापस जरूर ले आए । कोलकाता लौटने के पहले ही कोरोना वायरस का तांडव शुरू हो चुका था, और हफ्ते भर बाद ही भारत का लॉक डाउन शुरू हो गया । हमारे नियमित कामों के बीच इस एक नई उत्तेजना ने और प्रवेश कर लिया । देखते-देखते अस्तित्व की चिंता की गहरी व्यग्रताओं में कैसे लगभग दो महीने बीत गए, पता ही नहीं चला । पर, उपन्यास ने हमारी मेज पर अपना जैसे एक स्थाई वास बना लिया ।

इस प्रकार, इतनी तमाम बाधाओं को पार करके ही उपन्यास से हम अपने एक अंतरंग संबंध बनाने की मंजिल तक पहुंच पाए । पांच दिन पहले हमने पढ़ना शुरू किया और कल ही इसे पूरा किया है । जो प्रारंभिक चित्र अपने धूसर रंग में भी किसी मरीचिका की तरह रह-रह कर खींच रहे थे, वे अब जाकर हमारे अपने भाषाई जगत में ठोस रूप में शामिल हो पाए ।

भगतणें लेखक का गढ़ा हुआ एक रूपक है, चरित्रों की एक श्रृंखला को उनकी ठोस पहचान से कुछ लाक्षणिकताओं के आधार पर एक भिन्न छवि में विस्थापित करने का लेखकीय उपक्रम । लेखक ने प्रथम पुरुष के निजी अनुभव की शैली में सिधपुर गांव में अपनी नानी के घर की स्त्रियों की एक ऐसी श्रृंखला की कहानी कही है जो इसके केंद्रीय चरित्र भजन मामी के ही कुछ और रूपों, ललिता मौसी, गुलाब मामी की दमित भावनाओं से होती हुई बिल्कुल नई पीढ़ी की सौभाग्य के जरिये जैसे अपनी मुक्ति का, स्वातंत्र्य से जुड़े मोक्ष का, स्वच्छंद की प्राप्ति के उद्वेलित आनंद का प्रसाद पाती है ।

ननिहाल की स्त्रियों की कल्पना से हमें हमेशा गैब्रियल गार्सिया मार्केस के जीवन की कहानी की याद आ जाती है जिसमें उन्होंने अपने पूरे बचपन और किशोर वय को नाना के घर की स्त्रियों के साथ जीया था । लेकिन मार्केस के ननिहाल पर समग्र रूप से उनके नाना के विराट पुरुष व्यक्तित्व की छाया थी । पर यहां नाना और सारे मामा लगभग दृश्य में ही नहीं हैं । जो है वह है नानी, मान-मर्यादाओं और जगत व्यवहार की जैसे अपनी ही एक स्वायत्त संहिता की मालकिन ।

भजन मामी नामर्द छोटे मामा केदार की पत्नी, जिसे, कहानी के अनुसार, कच्ची उम्र में ही नानी ने गांव के ठाकुर बीर जी का शिकार बना कर जैसे नाथ दिया था । सास की इस काली करतूत और पति की नामर्दगी के दंश ने इस गरीब परिवार से आई बेसहारा स्त्री से उसकी स्वाभाविक मानवीय गति को ही छीन लिया । यथार्थ के सत्य से मुकाबले के उस खास, बीर जी के औचक आक्रमण के क्षण ने भजन मामी को वह तिरछी नजर दी जिसके दरार पड़े आईने में उसे कोई भी प्रतिबिंब अपनी समग्र एकान्विति में नहीं दिखता है। वह जीवन के उन रहस्यों को देख पाती है, जिनमें स्त्री के शील अर्थात् उसकी गुलामी की संहिताएँ रची जाती हैं ।

वह एक कर्त्तव्य-परायण, पर उतनी ही तुनकमिजाज, सत्य के दंश से विक्षिप्त, जुनूनी स्त्री का रूप ले लेती है । उसके चित्त की, अर्थात् उसके प्रतीक जगत की अपनी एक अलग संहिता ही उसे संचालित करती है, वह नानी, बड़े मामा, बड़ी मामी और गांव के पूरे परिवेश में होते हुए भी उनसे स्वतंत्र अपने ही एक और संसार की मालकिन होती है । उसके इस अन्य संसार के दूसरे सदस्य हैं — गांव के मसान से लगे शिव मंदिर में धूनी रमाए बैठी मद्रासिन ललिता मौसी, जिसे वहां जमने में हवेली वालों की मदद और भजन मामी और उनके पति की भी सहानुभूति मिली थी और गुलाब, गौना के पहले ही गुजर चुके सबसे बड़े मामा की परित्यक्त विधवा, जो सिधपुर से तीन कोस दूर पाटण में भोमिया जी के थान पर महंत के साथ घर बनाए हुए हैं, पर सिधपुर की हवेली से मिली सती की पातड़ी के डोर को जीवन भर तोड़ नहीं पाई है ।

ललिता लगभग भूतनी बन कर हवेली के पास की उस असंभव दुर्गम जमीन पर अपनी मेहनत के बल जमी थी । जवानी में ही वहां आ गई ललिता का अनुभव था कि वह यदि अपने पर हाथ डालने की कोशिश करने वाले “टुच्चे-पुच्चों को मारती रहती तो गांव की बीसियों लुगाइयां रांड हो जातीं ।” गुलाब, अपने पिता की साजिश से जयपुर के मेले के वक्त भोमिया जी के थान के महंत के द्वारा भगा ली गयी स्त्री, उसे अपने बाप की उम्र के महंत से कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि उसके बाप ने उससे पैसे लिये थे और उसने उसे अपने साथ गाय की तरह रखा था । वह भोमिया जी की सेवा में जीवन गुजार रही थी पर ‘मन और धरम से व्यासों की ही बहू थी’ । महंत से उसे इसलिये भी शिकायत नहीं थी क्योंकि उसने उसे कोई दुख नहीं दिया, कभी नहीं सताया — “उसको चरस का सुट्टा और चार रोटी के अलावा कुछ नहीं चाहिए ।”

भगतणों की इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में रखा गया है भजन मामी के बेटे भैरो की डाक्टर बेटी सौभाग्य को । उसकी शिक्षा ने उसे जीने का एक स्वतंत्र आधार और साथ ही आधुनिक मानवीय दृष्टि दी है । शिव के समान ‘इंटेलिजेंट, लिबरल और रेशनल, वाइफ की फ्रीडम और इंडीविजुअलिटी का रेसपेक्ट करने वाले’ पति को पाने के लिये अपने दुनिया के बेस्ट पापा पर भरोसा करने वाली सौभाग्य ने हवेली की सारी श्रृंखलाओं को तब एक झटके में तोड़ डाला था, जब उसने डा. अमजद खान से शादी करने के अपने इरादे की घोषणा की । और, इस प्रकार सौभाग्य के स्वातंत्र्य की कार्रवाई ने भजन की कामनाओं को भी जैसे मूर्त करके भजन की श्रृंखला की सारी भगतण कड़ियों को मुक्त कर दिया ।

जो व्यग्रता इन भगतणों की व्यक्तिगत सीमाओं में कभी दूर नहीं हो सकती थी, उस पर पीढ़ियों के एक दीर्घ विमर्श के जरिये विजय हासिल की जा सकी । व्यक्ति नहीं, एक विमर्श विजयी हुआ । मनोविश्लेषण का विमर्शमूलक होना ही उसे सत्य के संधान का दार्शनिक आयाम प्रदान करता है, वह प्रमाता के बजाय समाज के प्रतीकात्मक जगत की विकासमान श्रृंखला का विषय बन जाता है । भजन, ललिता, गुलाब और सौभाग्य मुक्ति की एक रिले रेस के भागीदार बन कर यथार्थ की विजय की पताका लहराते हैं । हमारे अभिनवगुप्त के यहां स्वातंत्र्य ही विमर्श कहलाता है — भैरवीय चिदाकाश में प्रतिबिंबित संसार ।

पर, यहां सबसे गंभीरता से गौर करने की चीज है उपन्यास का संघटन । इसमें इन सभी भगतणों के सत्य को उनके अपने ही कथन के आधार पर रखा गया है, लेखक अर्थात् विश्लेषक ने उन पर कोई शक-सुबह करने की जरूरत नहीं समझती है । जबकि सच यह है कि ये सभी चरित्र अपनी कहानी अपने-अपने अहम् के आधार पर कहते हैं, जिसमें हमेशा यह ताकत होती है कि वह व्यक्ति के सत्य को झुठला कर उसके एक अन्य विधेयात्मक सत्य का प्रतिरूप गढ़ लेता है । व्यक्ति को उसकी अपनी समग्र वास्तविकता से काट कर ही उसमें अहम् का प्रवेश होता है । उसके अहम् में ही उसकी आत्ममुग्धता का भी अधिष्ठान होता है । मनोविश्लेषण के बुनियादी सिद्धांतों में माना जाता है कि प्रमाता के खुद के बारे में कथन को कभी सच मत मानो । अहम् हमेशा प्रमाता को जानने का सबसे अप्रमाणिक माध्यम है, क्योंकि इसके जरिये ही वह अपनी खुद की अखंडता की कमियों को ढंकने की कोशिश में लगा रहता है । और इसके लिये वह खुद के बारे में, और अपने संपर्क के चरित्रों के बारे में न जाने कितनी काल्पनिक कहानियां गढ़ता चला जाता है ।

मसलन इस उपन्यास में भजन पर ठाकुर बीर जी के जुल्म की कहानी जिसमें नानी को उसका मुख्य सरगना बताया गया है, प्राथमिक रूप में नानी के मर्यादित व्यक्तित्व को देखते हुए कतई विश्वास योग्य नहीं मानी जा सकती। नामर्द बेटे की मर्यादा की खयाली बात से कहीं ज्यादा भजन को हुए उसकी नामर्दी का कष्ट कहीं अधिक स्वाभाविक लगता है । लेकिन इस पूरे कथानक में इस विषय पर नानी के पक्ष के लिये कोई जगह नहीं रखी गई है । नानी और भजन मामी के बीच के तनावपूर्ण सह-अवस्थान में सिर्फ नानी की नहीं, भजन की भी कोई नैतिक मजबूरी का होना कम तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है ।

इसी प्रकार, जो ललिता वैसे तो अपने बने रहने के पीछे अपने ‘स्वांग की माया’ और जगन्नाथ गूजर और ठाकुर रामधन को दौड़ाने की कहानी इतने ठसके के साथ कहती है, लेकिन इसी बहक में जिस क्षण वह जगन्नाथ जैसे राक्षस का जिक्र करते हुए एक झटके में कहती है कि “ऐसे टुच्चे-पुच्चों को मारती रहती तो गांव की बीसियों लुगाइयां रांड हो जातीं”, वह क्षण किसी भी विश्लेषक के लिये अकेली जान ललिता के जीवन की त्रासदी का एक अन्य पट प्रकाशित करने के लिये काफी हो सकता था । सत्य इसी प्रकार बातों के बीच से किसी खास बिंदु पर ही औचक अपने को प्रकाशित किया करता है । लेकिन वह बात यहां यूं ही आई-गई हो गई । वैसे ही गुलाब का उसे भगा ले गये महंत जी पर दया भाव भी स्वयं में बहुत कुछ कहता है, पर वह लेखक का ध्यान नहीं खींच पाया ।

कहने का मतलब यही है कि विश्लेषक लेखक के लिये इन हिस्टेरिक से दिखने वाले चरित्रों के सत्य की तलाश के ऐसे दूसरे भी अनेक, उनसे स्वतंत्र बिंदु हो सकते थे । इनसे ही भजन को ललिता और गुलाब से जोड़ने वाले वे सहज सूत्र भी मिल सकते थे जिनसे ये तीनों भगतणें एक ही भगतण के अलग-अलग आयाम प्रतीत होने के कारण भगतण के रूपक के कोष्ठक को सार्थक करती हुई नजर आती । इन सभी चरित्रों को गहराई से देखें तो पायेंगे कि वाह्य जगत में अपने प्रतिबिंबों की कल्पना का दबाव ही उन्हें उस ऩाटक का हिस्सा बना देता है जिसमें उनमें अपनी कमी को पूरा करने की तीव्रता पैदा होती है और वे अपनी पहचान के चक्कर में अपने व्यक्तित्व की विखंडित कल्पना से प्रारंभ करके एक समग्रता को पाने की ओर लपकती है और अपनी ऐसी पहचान में फंस जाती हैं, जिसके सख्त ढांचे में ही उनके आगे की यात्रा को पूरा होना होता है।

भजन का लुगाईपन का अवबोध और पारिवारिक मामलों में उत्कट कर्त्तव्यपरायणता, ललिता की परोपकारिता और गुलाब की सती माता की पातड़ी की डोर से बंधी अस्मिता का खेल क्या उसी दबाव की पैदाइश नहीं हो सकते थे ! इस प्रकार, उनमें वाह्य जगत के वृत्त में अंतर के बिखराव के डर से अहम् की कभी न पूरी होने वाली प्राप्ति की छटपटाहट का एक नया तर्क बन सकता था । भजन पर जब सास और पति का दबाव खत्म होता है, तभी तो वह अपनी वांछित समग्रता को पाती है, और भैरो, उसकी पत्नी और लेखिका राधे बाई को भैरो की पैदाइश की रहस्यमय कहानी सुनाती है । कहते हैं कि आदमी के अहम् का सत्य खास तौर पर तभी सामने आता है जब उसके लिये बाकी दुनिया खत्म सी हो जाती है और इस पागलपन की दशा में वह स्वयं और अन्य के बीच के फर्क पर बिल्कुल मूलगामी सवाल उठाने लगता है । भजन के एक खास चरण पर इस प्रकार फट पड़ने को कुछ इस प्रकार भी समझा जा सकता था ।

इसीलिये सौभाग्य को इन सबकी श्रेणी में भगतण बताये जाने पर भी वास्तव में वह एक व्यतिक्रम है । वह जितनी हवेली की थी उतनी ही स्वयं की भी थी । शहर में मेडिकल की शिक्षा में उसने अपना अलग विवेक हासिल कर लिया था, जिसने उसे हवेली से स्वतंत्र होने का एक वैकल्पिक आधार मुहैया कराया था । इसके बावजूद, जब लेखिका ने उसे बाकी भगतणों की श्रेणी में रखा तो यह लेखिका का अपना मामला ही कहलायेगा, जिसके लिये उनका तर्क है कि इस श्रृंखला में सौभाग्य की कड़ी ही बाकी भगतणों की मुक्ति का, उनके उत्तरण का पहलू पेश करती है । लेखक को संतोष होता है कि “…मेरे हिस्से की भगतण तनिक मुक्त हुई।”

दरअसल, विश्लेषक लेखक के पास बाकी भगतणों की मुक्ति का दूसरा कोई और पथ नहीं था, क्योंकि उनका सच उसके वास्तविक विश्लेषण का विषय ही नहीं बना था । मर्यादित संस्कार की एक लक्ष्मण रेखा में रहते हुए उसे तीनों भगतणों की कहानियों पर जितनी सहजता से विश्वास हुआ था, सौभाग्य के डा. अफजल खान के फैसले से वह उतना नहीं, फिर भी असहज तो जरूर हुआ था । प्रेम के स्वायत्त संसार के सामान्य मानवीय तर्क को सहजता से स्वीकारने में उसे भी किंचित कष्ट हो रहा था ।

बहरहाल, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, अहम् के क्षेत्र से सामने आने वाली हर सामग्री को भरोसे की नहीं, बल्कि भरमाने वाली सामग्री के तौर पर ही देखा जाना चाहिए । जब भी विश्लेषक चरित्र के अहम् के साथ अपने को जोड़ता या समझौता करता है, वह विश्लेषण के स्वाभाविक काम से समझौता करता है । तब चरित्र और लेखक के बीच के संबंध में कोरे छल के अलावा कुछ नहीं रह जाता है ।

इस प्रकार, हर कृति पाठक के लिये न सिर्फ अपने चरित्रों को पेश करती है, बल्कि लेखक को भी जैसे तेज रोशनी के फव्वारे के नीचे लाकर खड़ा कर देती है । उसकी भाषा, शैली, उसके आकर्षण-विकर्षण के केंद्र, उसकी मान्यताएं लेखक के आत्म का भी चित्र उकेरती चलती हैं । बातें तो भाषा की ही देन होती है, और भाषा सचमुच अपदार्थ नहीं होती, वह जितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, होती एक वस्तु ही है । जिन शब्दों के प्रयोग से बिंब तैयार किये जाते हैं, वे वस्तुओं के ही विस्थापित रूप होते है और वे ही पाठक को खींचते हैं । ‘सिधपुर की भगतणें’ में हवेली का, ठेठ राजस्थानी कहावतों और मुहावरों की ठाठ का और तंत्र-मंत्र के अंधेरे में लिपटी स्वच्छंद जीवन शैली की मरीचिका का सम्मोहन इस अर्थ में भी पूरे उपन्यास की बुनावट में खास मायने रखता है ।

अन्यथा यह पूरा कथानक हवेली की हिस्टेरिक औरतों की विखंडित फैंटेसी का एक दूसरा रूप भी ले सकता था । डरी हुई औरतों के मानस के अक्स में ठहरे हुए पानी के गदलेपन से दिखाई देने वाली छवि की संरचना में सत्य के अनेक छिपे हुए रूपों को साफ देखा जा सकता था । अनुभूति की इस गोधुली या ऊषा काल के अंधेरे-उजाले से भी आगे के उतरते हुए अंधेरे अथवा प्रकाश के और भी ठोस संकेत मिल सकते थे । वह ‘लेखक के हिस्से की भगतण की तनिक मुक्ति’ का कहीं ज्यादा प्रामाणिक वृत्तांत बन सकता था ।

(अरुण माहेश्वरी लेखक, चिंतक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

This post was last modified on May 30, 2020 9:45 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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