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कोरोना की महामारी और लॉकडाउन के दौरान गिरफ़्तार होते विद्यार्थी : सोचने पर मजबूर करते सवाल

कोरोना की महामारी के चलते पूरे देश को लॉकडाउन में जाना पड़ा। लोगों को अपने घरों तक सिमट जाना पड़ा। लेकिन इस दौरान भी, कुछ महीने पहले केंद्रीय सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ दिल्ली में शांतिपूर्णविरोध में शामिल लोगों की गिरफ़्तारियों का सिलसिला जारी रहा। अहम बात यह भी है कि गिरफ़्तार होने वाले अधिकतर विद्यार्थी हैं। कई लड़कियाँ भी हैं। पिछले दिनों दो और लड़कियों के नाम इनमें जुड़ गए हैं। 23 मई को दिल्ली में नताशा नरवाल और देवांगना कलीता की गिरफ़्तारी हुई है। उनको गिरफ़्तार किए जाने को ले कर कुछ क़ानूनी दाँव-पेंच भी शामिल हैं। मगर फ़िलहाल कुछ बड़े परिप्रेक्ष्य की बात कर लें।

इस सन्दर्भ में कुछ बातें, कुछ सवाल, शिक्षा के हवाले से करना मुनासिब होगा। ‘विद्यार्थी’ होने के अर्थ को समझना भी मुनासिब होगा। यह हो जाने पर शायद हम समझ पाएँगे कि विद्यार्थी क्यों इस पूरे घटनाक्रम के केन्द्र में दिखाई देते हैं।

क्या शिक्षित होने का अर्थ केवल यह हो कि विद्यार्थी बस अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सोचें, सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के लिए सुखदायक जीवन की कल्पना करें और व्यापक समाज के बारे में कुछ भी न सोचें? क्या शिक्षित होने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने सह-नागरिकों के प्रति, उनकी ज़रूरतों और अधिकारों के प्रति भी संवेदनशील हों ताकि आपसी सामंजस्य और सौहार्द बढ़े? ऐसा न होने पर क्या यह कहना ग़लत होगा कि हमारे सीखने में, हमारी शिक्षा में, कुछ कमी रह गई होगी? और यह कमी रह जाने की सूरत में क्या समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी पर सवाल खड़ा नहीं हो जाता?

क्या सब के लिए समान संवैधानिक अधिकारों वाले लोकतांत्रिक देश में इन बातों का महत्व और भी ज़्यादा नहीं है?

शिक्षा के अर्थ के इस पसमंज़र में, आगे बढ़ने से पहले, गिरफ़्तार किए जा रहे इन विद्यार्थियों की शिक्षा-दीक्षा-पारिवारिक पृष्ठभूमि पर नज़र डालते हैं। मिसाल के लिए नताशा और देवांगना की बात करते हैं। 

हिसार से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ी नताशा पीएचडी कर रही हैं। उनका शोध दिल्ली में महिलाओं के आंदोलनों को लेकर है। बीए (ऑनर्स) और एमए इतिहास विषय से की हैं। एमफ़िल में उनका शोध-कार्य ओडिशा के आदिवासियों के भूमि-अधिकारों पर था। सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों से सम्बद्ध उन के लेख विभिन्न जगह छपते रहे हैं जो अधिकतर महिलाओं की स्थिति और उनसे जुड़े मुद्दों के बारे में हैं।

ग्रामीण भारत और उस की समस्याओं के प्रति जागरूक रहते हुए पीपल्ज़ आर्काइव ऑफ़ रूरल इण्डिया के साथ उन्होंने फ़ोटोग्राफ़ी का काम भी किया है। नताशा के पिता हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार से वरिष्ठ वैज्ञानिक के तौर पर सेवानिवृत्त हुए। सेना से स्वानिवृत्त उन के दादा लोगों को निरक्षरता तथा अन्य सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक करने में सक्रिय रहे जिन में अन्तर्जातीय विवाह जैसे मुद्दे शामिल हैं।

डिबरूगढ़ (आसाम) से स्कूली शिक्षा पूरी करने वाली देवांगना महिला-अध्ययन से सम्बद्ध एमफ़िल कर रही हैं। उनके पिता अपने इलाक़े के एक जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। माँ डिबरूगढ़ विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज के बीए (अंग्रेज़ी ऑनर्ज़) पाठ्यक्रम की टॉपर देवांगना डबल एमए हैं – वे इंग्लैण्ड में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ससेक्स से डेवलपमेंट स्टडीज़ में, और दिल्ली के एक अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास में एमए हैं।        

दोनों की शिक्षा और परिवारों से सम्बन्धित उपलब्ध जानकारी से साफ़ ज़ाहिर है कि उन्होंने शिक्षा के अर्थ को नागरिक अधिकारों और बराबरी पर आधारित समाज के परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ते हुए जाना-समझा है। बेशक, परिवार से भी सामाजिक मूल्यों की एक विरासत साथ ले कर चली होंगी। यही बात शायद गिरफ़्तार हुए कई अन्य विद्यार्थियों पर भी लागू होती होगी। यहीं से कुछ और सवाल पैदा होते हैं।

शिक्षा से हासिल ज्ञान, संवेदना और हुनर को अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक ख़ुशहाली के साथ-साथ समाज के लिए इस्तेमाल करने के बारे में सोचना सही है या ग़लत? सही है, तो सोचने भर से आगे बढ़ कर, व्यवहार में कुछ करना….?

कोई विद्यार्थी किसी ऐसे शांतिपूर्ण विरोध में शामिल होता है जो उसकी नज़र में साथी नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है, तो वह अपनी शिक्षा और ज्ञान के दम पर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य निभा रहा होगा या नहीं?

इसे संविधान द्वारा उपलब्ध करवाए गए अधिकार के तहत उठाया गया कदम कहा जा सकता है या नहीं? (फिर वह चाहे किसी भी तरह के सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने की बात हो, महिलाओं की सुरक्षा और बराबर अधिकार की बात हो या किन्हीं अन्य संवैधानिक अधिकारों पर ख़तरे की बात हो।) 

सोचें – एक आज़ाद लोकतांत्रिक देश में अगर सरकार के रवैये से ऐसा लगे कि वह सब नागरिकों को बराबर हक़ों का अधिकारी मानने में कोताही बरत रही है तो क्या उस का शांतिपूर्ण(चाहे पुरज़ोर) विरोध किया जाना ग़लत है? शिक्षित, पढ़े-लिखे युवा वर्ग का इस तरह के विरोध में शामिल होना एक जुर्म है या संविधान से प्राप्त एक अधिकार?

नताशा और देवांगना समेत जिन विद्यार्थियों की गिरफ़्तारियाँ कोरोना महामारी से उपजे लॉकडाउन के दौरान हुईं, वे नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के शांतिपूर्ण विरोध का हिस्सा थे। शिक्षा, सामाजिक मूल्यों, लोकतांत्रिक अधिकारों पर हुई उपरोक्त चर्चा के हवाले से सोचें तो हैरत की बात है क्या?

आख़िर में – गिरफ़्तारियों की पूरी प्रक्रिया भी सोचने पर मजबूर करती है।

जिन घटनाओं का हवाला दे कर ये गिरफ़्तारियाँ हुई हैं, वे फ़रवरी की हैं। गिरफ़्तारियाँ इतने महीनों बाद मई में – वह भी तीसरे हफ़्ते में – क्यों हुईं? 

यह भी देखा गया है कि सीएए के विरुद्ध प्रदर्शनों से सम्बद्ध केस में ज़मानत मिलने पर (जैसा कि नताशा और देवांगना के साथ हुआ) साम्प्रदायिक हिंसा से सम्बद्ध इल्ज़ाम पर गिरफ़्तार किया जा रहा है। ऐसा क्यों? [25 मई के ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ नताशा और देवांगना पर तीन जाँच चल रही थीं – स्पेशल सेल, जाफ़राबाद पुलिस स्टेशन और क्राइम ब्राँच एसआईटी की। एक मामले में ज़मानत मिलते ही पूछताछ के लिए एक और अर्ज़ी डाल दी गई और हत्या की कोशिश, षड्यंत्र, दंगा-फ़साद, लोकसेवक (पब्लिक सर्वेंट) के लिए बाधा डालने और आर्म्स एक्ट के तहत संगीन आरोप लगाते हुए साम्प्रदायिक हिंसा के जुर्म में पुन: गिरफ़्तार कर लिया गया।]  

इस पूरी प्रक्रिया का अंत यहाँ भी नहीं हुआ। नताशा समेत अन्य को भी यूएपीए (अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेन्शन एक्ट) के तहत गिरफ़्तार किया गया जिसमें ज़मानत मिलना समझें कि नामुमकिन है (इन ‘अन्य’ में सफ़ूरा ज़रगर भी शामिल हैं जिन के बारे में बहुत कुछ पढ़ने को मिलता रहा है हमें)। आतंकवादियों पर कार्रवाई के लिए लागू होने वाला कानून इन विद्यार्थियों पर लाया जा रहा है !

इस सब के बीच यह भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि जिन्होंने साम्प्रदायिक हिंसा करने के लिए जगज़ाहिर, खुले तौर पर लोगों को उकसाया, उनके ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाए गए हैं।

अगर हम लोकतंत्र के महत्व, भावना और मर्म को समझते हैं, देश में बराबरी और न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के ताने-बाने को बनाए रखना चाहते हैं, तो अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए उपरोक्त सब बातों पर विचार करना तो बनता है।

(अंग्रेजी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक रमणीक मोहन रोहतक में रहते हैं। उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी भाषाओं के साहित्य में दिलचस्पी रखने वाले रमणीक मोहन की सामाजिक-सांस्कृतिक अभियानों में सक्रिय भागीदारी रही है। वे इस दौरान पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे। उनके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।)

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This post was last modified on June 7, 2020 1:16 pm

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