Monday, April 15, 2024

हेल्पर के तौर पर लिए गए भारतीयों को रूस के पक्ष में लड़ने के लिए किया जा रहा है मजबूर

नई दिल्ली। कम से कम तीन भारतीय युवकों के रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की तरफ से लड़ने की सूचना मिली है। और यह सब कुछ उनकी इच्छा के विरुद्ध किया गया है। दरअसल बाहर ले जाने वाले एक एजेंट ने उन्हें रूसी सेना को यह कहकर सौंप दिया कि वो उनके लिए हेल्पर काम करेंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि तीनों युवक युद्ध के मोर्चे पर तैनात कर दिए गए हैं और उन्हें अब हथियार भी उठाना पड़ रहा है।

हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर, 2023 से तकरीबन 18 भारतीय रूस यूक्रेन सीमा पर स्थित मारीपोल, खारकिव, डोनट्स्क, रोस्तोव आन डान में फंसे हुए हैं। बताया जा रहा है कि रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में इसमें एक की मौत हो गयी है।

मामला तब सामने आया जब एआईएमआईएम सांसद ओवैसी ने इस मामले पर विदेश मंत्रालय को पत्र लिखा। दरअसल एक पीड़ित के परिजनों ने हैदराबाद में आवैसी से संपर्क किया। उसके बाद 25 जनवरी को ओवैसी ने विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस में भारतीय दूतावास को पत्र लिखा और इस मामले में सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की।

ये सारे पीड़ित यूपी, गुजरात, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के हैं।

इनमें से एक पीड़ित जो 20 साल का है और यूपी का रहने वाला है, ने अपना नाम छुपाने की शर्त पर बताया कि उसके समेत तीन लोगों को रूसी सेना द्वारा हथियार और साजो सामान को संभालने की बुनियादी ट्रेनिंग दी गयी। और उसके बाद रूस-यूक्रेन सीमा पर स्थित रोस्तोव-ऑन-डॉन पर जनवरी में भेज दिया गया। जहां उन्हें गोलियों का सामना करना पड़ा और इस तरह से गनप्वाइंट पर उन्हें लड़ने के लिए मजबूर किया गया।

उसने बताया कि “हम यहां नवंबर, 2023 में आए थे और हमें समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया जिसमें लिखा गया है कि हम सेना की सुरक्षा के हेल्पर के तौर पर रखे गए हैं। हमें साफ-साफ बताया गया था कि हम युद्ध के मैदान में नहीं भेजे जाएंगे और हमें सैलरी के तौर पर 1.95 लाख रुपये देने का वादा भी किया गया था।इसके साथ ही अलग से 50 हजार बोनस भी देने की बात कही गयी थी।”

उसने बताया कि वे रूस एक एजेंट फैसल खान के जरिये आए थे। यह शख्स एक यूट्यूब चैनल बाबा व्लॉग्स चलाता है। 12 नवंबर को यूपी के इस पीड़ित को दो दूसरे भारतीय एजेंटों ने रूस में रिसीव किया जो खान के सहयोगी हैं।

उसने आगे बताया कि 13 नवंबर को हमें एक कैंप में भर्ती कर दिया गया। और फिर मास्को से बहुत दूर एक सुनसान इलाके में जो तकरीबन 2.30 घंटे की यात्रा थी, ले जाया गया। हमने जब भारतीय एजेंटों से संपर्क किया तो उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि हेल्पर के तौर पर हमारी तैनाती की जाएगी। हम टेंट में रहते थे। और हमें हथियारों को संभालने की ट्रेनिंग दी गयी। उसके बाद 4 जनवरी को हमें डोनेट्स्क लड़ाई के लिए भेज दिया गया।

उसने बताया कि जब उन्हें लड़ाई के लिए मजबूर किया गया तो फिर उसको एक बार भागने का मौका मिला और वह अपना हथियार फेंक कर भाग निकला। लेकिन मुझे पकड़ लिया गया और बंदूक की नोक पर धमकी दी गयी। वो हमसे सामानों को एक इमारत से दूसरी इमारत में जाने के लिए कहे। कमांडर ने हमें बताया कि हम चलते समय कम से कम पांच मीटर का फासला बनाकर चलें इससे हमें निशाना नहीं बनाया जाएगा। छोटी सी ही दूरी में हमें 7-8 बार बुलेट का सामना करना पड़ा। 22 जनवरी को हम भागने में कामयाब रहे और फिर घायल होने की बात कहकर एक अस्पताल में भर्ती हो गए।

उसने बताया कि युद्ध क्षेत्र से भागने के बाद बहुत दिनों तक उसे फोन नहीं मिला और वह अपने परिजनों से संपर्क भी नहीं कर सका। उसने बार-बार बताया कि रूस में स्थित भारतीय दूतावास ने उसकी कोई खबर नहीं ली। हमें कई बार वहां से भगा दिया गया। हमारे पास उचित दस्तावेज भी नहीं हैं। पैसा भी नहीं है। सरकार हमारी कोई मदद नहीं कर रही है।

एजेंट ने बताया कि उनको सेना के सहायक की भूमिका का प्रस्ताव दिया गया था। डील यह थी कि उन्हें तीन महीनों तक बेसिक ट्रेनिंग दी जाएगी और उसके बाद उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण होगा और फिर दूसरे परीक्षणों के बाद अगर वह किचेन हेल्पर या फिर इसी तरह के और जॉब के लिए तैयार होते हैं तो उन्हें रख लिया जाएगा। लेकिन एक महीने के बाद उनका पासपोर्ट छीन लिया गया और फिर उन्हें रूस की तरफ से लड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया। दूसरे देशों के लोग भी यहां फंसे हुए हैं।

विदेश मंत्रालय ने रूस में किसी विशेष मामले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। सूत्रों के अनुसार भारतीय दूतावास इस तरह के मिले आवेदनों पर नजर रख रहा है। लेकिन बहुत सारे ऐसे लोग जो कह रहे हैं कि उन्हें जबरन सीमाओं पर मजदूर बनाया गया वो देश छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं हैं। इनमें से बहुत सारों ने यहां पहुंचने के लिए अपने एजेंटों को बहुत ज्यादा पैसे दिए हैं। और बगैर कुछ पैसा कमाए वो अपने देश नहीं जाना चाहते हैं। अधिकारियों का कहना है कि उनके हाथ बंधे हुए हैं।  

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