Sunday, December 5, 2021

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गौरव जायसवाल: परम्परागत काम छोड़कर बदलाव की राह थामी

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मप्र और महाराष्ट्र की सीमा पर बसा गाँव कुरई को अंग्रेजों ने बसाया था पूरा गाँव आदिवासी था और मात्र 11 परिवार गैर आदिवासी थे, इनमें ज्यादातर कलार समाज के थे जो शराब बनाने का पुश्तैनी काम करते थे। ये लोग उत्तर प्रदेश से यहाँ लाये गये थे और इन्हें अंग्रेज सरकार ने शराब बनाने का लाइसेंस दिया। “मेरे दादाजी अलग निकले उन्होंने थोड़ा बड़ा होने पर पुश्तैनी काम करने से मना कर दिया और गाँव में ही मेडिकल की दुकान खोली और दवा बेचने लगे, वो दुकान आज भी गाँव में है, मेरे पिताजी ने पढ़ाई करके सरकारी नौकरी करने का तय किया और इस तरह से हम गाँव से सिवनी शहर में आये और तब से यहीं रहने लगे।” गौरव कहते हैं। घर में चाचा अदि लोग जंगल के ठेकेदारी में लगे हैं पर हमारा परिवार अलग निकला और सिवनी आ गया, पिताजी महिला बाल विकास में हैं और माताजी सरकारी शिक्षिका हैं।

सिवनी मप्र का आखिरी जिला है और फिर महाराष्ट्र के विदर्भ यानी नागपुर की सीमा शुरू हो जाती है, गौरव ने बचपन से शिक्षा और महिला बाल विकास विभाग का काम देखा खास करके आंगनवाड़ी आदि पिताजी के साथ तो उन्हें यह एहसास है कि भोजन गरीबी और आजीविका का क्या अर्थ है। सिवानी से बारहवीं करने के बाद वे भोपाल आये और इंजीनियरिंग पूर्ण किया, पढ़ाई के दौरान वे भोपाल की बस्तियों में बच्चों को निशुल्क पढ़ाया करते थे। उस समय उड़ीसा में तूफ़ान आया था और भोपाल में कुछ लोग और संस्थाएं उड़ीसा के पीड़ितों के लिए कपड़े राशन इकट्ठा कर रहे थे उनसे प्रेरणा पाकर गौरव ने यही काम अपने दोस्तों के साथ सिवनी में किया और काफी सामान इकट्ठा किया।

पढ़ाई के बाद उन्हें एक नौकरी मिल गई। नौकरी के लिए उन्हें पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में जाना पड़ा जहां वे एक नेटवर्क कम्पनी के साथ दूरदराज के गाँवों में मोबाइल टावर्स लगाने के काम को देखा करते थे। पहली बार गौरव ने गाँवों में गरीबी भुखमरी देखी, संघर्ष देखा और साथ ही साथ सामाजिक राजनैतिक स्थितियों को भी समझा, पुरुलिया चूँकि नक्सलवादियों का बड़ा गढ़ है तो वहां नक्सलवादियों से भी गाहे बगाहे मिलना हुआ और उनके बदलाव के तरीके देखे पर इससे गौरव बहुत सहमत नहीं थे। साथ काम करने वाले एक इन्जीनियर को नक्सलवादियों ने पकड़ लिया था, जब गौरव ने यह बात अपने माता पिता को बताई तो उन लोगों ने गौरव को वापस बुला लिया।

सिवनी वापस आने पर अगला सवाल था कि क्या किया जाए। इंदौर, उज्जैन, भोपाल और सतना में पुनः नौकरी की, बदली बार बार और फिर लगा कि यह सब लम्बे समय तक नहीं चलेगा इसलिए एक जगह टिकना ही होगा और कुछ सार्थक करना होगा। परिवार की आर्थिक अपेक्षाएं उस तरह से नहीं थीं सो गौरव ने सामाजिक क्षेत्र में काम आरम्भ किया और शुरुआत अपने ही गाँव में एक अग्रणी संस्था बनाकर स्कूल शुरू किया जहाँ वे गरीब आदिवासी बच्चों को पढ़ाने लगे इसी के साथ गाँव में तथा आसपास के गाँवों में पंचायती राज को पुख्ता करने के लिए काम आरम्भ किया, उन्हें हर स्तर पर भ्रष्टाचार नजर आया तो सोशल आडिट का काम आरम्भ किया। इस काम में उन्होंने स्थानीय युवाओं और किशोरों को जोड़ा और आंगनवाड़ी, मध्यान्ह भोजन तथा मनरेगा  के कामों पर फोकस करना आरम्भ किया।

सन 2014 में गाँव में एक अग्रणी पब्लिक स्कूल खोला और विधिवत मान्यता लेकर शिक्षण का काम आरम्भ किया। शिक्षा में छुटपुट नवाचार करके वे जल्दी ही समझे कि उन्हें भी अध्ययन करने की जरूरत है और शिक्षा में भी बदलाव की जरुरत है, वे कई लोगों के सम्पर्क में आये। पिछले तीन वर्षों में उन्हें दो प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय फेलोशिप मिली है [Swedish Institute of Young Connectors of Future, Sweden & South Asian Young Leaders] जिसके तहत वे युवेसकला और नार्थ फिनलैंड में रहे और वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को देखा समझा। लौटकर आने के बाद उन्होंने अपने यहाँ समुदाय को शिक्षा से जोड़कर कुछ बदलाव करने की कोशिश की। तीसरी बार वे संयुक्त राष्ट्र संघ के SDG उद्देश्यों के तहत सिंगापुर का भी शैक्षिक भ्रमण कर लौटे।

सिवनी जिला चूँकि दो राज्यों का सीमावर्ती जिला है इसलिए कोविड के समय दक्षिण भारत से उत्तर भारत की और जाने वाले मजदूरों के पलायन के भयावह दृश्य थे, लोग परिवार सहित सर पर सामान उठाये चले आ रहे थे, भूखे प्यासे, बीमार और सबसे ज्यदा दिक्कतें महिलाओं और बच्चों को हो रही थी, जब गौरव ने यह देखा तो उन्होंने अपनी टीम से बातें की और स्थानीय स्तर पर मदद लेकर लोगों को सिवनी–नागपुर सीमा पर विश्राम करने के लिए स्थान उपलब्ध करवाया और भोजन की व्यवस्था की। फिर लगा कि लोगों के पास पहनने को जूते चप्पल भी नहीं हैं तो सिवनी के व्यापारियों से मदद मांगी और फिर तो लोगों का हुजूम ऐसा उमड़ा कि पूरी टीम को समय नहीं था, चौबीसों घंटें भोजन उपलब्ध करा रहे थे वे।

एक दिन में दो दो लाख लोगों ने भोजन किया। गौरव कहते है – “शुरू में दिक्कत आई पर फिर जब लोगों ने देखा कि प्रवासी मजदूरों की भीड़ बढ़ रही है तो वे स्वप्रेरणा से आगे आये और रास्ते भर भोजन पानी, पेट्रोल और जूते चप्पलों की व्यवस्था उपलब्ध करवाई पर हम सो नही पा रहे थे, हमारे आराम से ज्यादा हमें महिलाओं बच्चों की चिंता थी। हमने गाड़ी के मैकनिक तक की व्यवस्था की क्योंकि बिहार उत्तर प्रदेश जाने वाले मजदूर अपने साथ ऑटो लेकर आये थे किराए के, उनमें डीजल डलवाना भी हमारे काम का हिस्सा हो गया था। बाद में अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन ने हमें इस काम को जारी रखने के लिए मदद की जिससे हम लगभग एक डेढ़ माह तक प्रवासी मजदूरों को कोरोना के उस मुश्किल काम में भोजन आदि की व्यवस्था कर पाये”।

गौरव के लिए यह बड़ी चुनौती थी पर सब ठीक हुआ, इस वर्ष पुराना अनुभव साथ था तो पहले से ही तैयारी थी, गाँव के लोगों के साथ सिवनी शहर में उन्होंने पूरी तैयारी कर रखी थी। समस्याएं सामान ही थीं लोगों की भीड़ अबकी बार मार्च से ही शुरू हुई थी जो अभी तक जारी है बस इतना था कि लोग बहुत पैनिक नहीं थे। इसलिए काम करने में पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी आसानी हुई। इस बार चौबीसों घंटे भंडारे चले और लाख लाख लोगों ने प्रतिदिन भोजन किया साथ ही स्वास्थ्य आदि की समस्याएं थी हीं।

अबकी बार परिवार ने भी स्टाल लगाया, गायत्री मन्दिर से लेकर शहर की धर्मशालाओं में भंडारे चले। खूब चप्पल जूते बांटे  गए और गाड़ियां भी सुधारी गईं, पेट्रोल डीजल के लिए नगदी रुपया दिया। “लोग जब घर पहुंचकर फोन करते हैं तो अच्छा लगता है” गौरव कहते हैं। अबकी बार हमें आक्सीजन की व्यवस्था ज्यादा करनी पड़ी जिसका जिम्मा मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट ने लिया था। जिसमें सिवनी के युवा मुस्लिम जुड़े हुए हैं, एक सौहार्द भरे वातावरण में हम सबने मिलकर काम किया है। 150 आक्सीजन के सिलेंडर खरीद कर रख लिए जिसमें 17 लाख लगे थे गौरव ने खुद एक लाख पच्चीस हजार रूपये दिए इस काम के लिए।

गौरव कहते हैं “अब सिवनी को छोड़ना नहीं है हमारा काम स्थानीय युवाओं को नेतृत्व देने वाली भूमिका में लाना है और हम अबकी बार होने वाले नगर पालिका के चुनाव में उतरेंगे और सभी सीट्स पर लड़ेंगे, मैं खुद नगर पालिका अध्यक्ष के पद पर लडूंगा।” परम्परागत काम में रुपया बहुत था पर संतोष नहीं था, समाज में काम करके जो संतुष्टि मिलती है वही असली शान्ति और ध्येय होना चाहिए जीवन का। गौरव के साथ साथ स्थानीय युवाओं की बड़ी टीम है जो हर तरह के काम करने और जोखिम उठाने को तैयार है। “संस्थाओं का काम संघर्ष और निर्माण के बीच का है और हम यही उद्देश्य लेकर चल रहे हैं शिक्षा और बाकी दीगर काम इसके माध्यम हैं। गौरव की आँखों में चमकीले स्वप्न हैं जो कभी निश्चित ही पूरे होंगे” उनके स्कूल में आज 182 बच्चे पढ़ते हैं और यहाँ युवाओं की प्रतिभा को नया आकार दिया जाता है। इस काम में गूंज और क्राउड फंडिंग से मदद मिलती है।

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।)

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