एक्टिविस्टों की जमानत पर नहीं लगाई सुप्रीम कोर्ट ने रोक, लेकिन हाईकोर्ट की यूएपीए की व्याख्या की होगी समीक्षा

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दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पिजरा तोड़ ग्रुप के कार्यकर्त्ता देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को दिया गया जमानत आदेश ऐतिहासिक हो गया है। दरअसल यदि उच्चतम न्यायालय इस फैसले में हस्तक्षेप करता है तो उसे दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में दिए गए यूएपीए कानून की सिलसिलेवार व्याख्या को नये सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा। पहली बार किसी हाईकोर्ट ने यूएपीए कानून की इतनी बारीक़ व्याख्या की है और भारत के खिलाफ आतंकी कारवाई और सामान्य अपराध में फटक की लक्ष्मण रेखा खींची है। उच्चतम न्यायालय ने जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के कानूनी पहलुओं का आकलन किया जायेगा।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम की अवकाश पीठ ने शुक्रवार को दिल्ली दंगों की साजिश मामले में तीन छात्र कार्यकर्ताओं की जमानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा दायर अपील पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस की अपील पर उच्चतम न्यायालय का फैसला होने तक हाईकोर्ट के फैसले को मिसाल नहीं माना जायेगा। पीठ ने कहा कि वह इस स्तर पर कार्यकर्ता देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को दी गई जमानत में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अवकाश पीठ ने दिल्ली पुलिस द्वारा दायर अपील पर नोटिस जारी किया, लेकिन जमानत के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

पीठ ने कहा कि जवाबी हलफनामा 4 सप्ताह के भीतर दायर किया जाए। 19 जुलाई से शुरू होने वाले सप्ताह में गैर-विविध दिन पर सूचित करें। इस बीच इस निर्णय को किसी भी न्यायालय के समक्ष किसी भी पक्ष द्वारा एक मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा। यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रतिवादियों को दी गई राहत इस स्तर पर प्रभावित नहीं होगी।

सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने आज की सुनवाई में शीर्ष न्यायालय से हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि वकील इस पर भरोसा करते हुए जमानत के लिए आगे बढ़ रहे हैं। ट्रायल कोर्ट को डिस्चार्ज अर्जी पर विचार करना होगा और इसे इस फैसले से बदलना होगा। एसजी मेहता ने कहा कि, कथित घटना इसलिए हुई क्योंकि जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत दौरे पर आए थे तब तीनों आरोपियों ने साजिश रची थी। इस प्रक्रिया में 53 लोगों की मौत हुई, जिनमें से कई पुलिस अधिकारी थे। इसके अलावा, 700 लोग घायल हुए। लेकिन समय रहते स्थिति को नियंत्रित किया गया था। यह भी कहा गया कि उच्च न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड पर मौजूद ठोस सबूतों का विश्लेषण नहीं किया और आरोपी को जमानत देते समय अप्रासंगिक विचारों को लागू किया। हाईकोर्ट ने व्यापक टिप्पणियां कीं और फिर कहा कि अपराध नहीं बनता है।

अवकाश पीठ ने कहा कि वह निर्देश दे सकती है कि अपील पर फैसला होने तक हाईकोर्ट के फैसले को मिसाल के तौर पर न लिया जाए। मेहता ने इस पर जवाब दिया कि, “विरोध करने का अधिकार में लोगों को मारने का अधिकार कैसे शामिल हो गया है? मैं हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने के लिए वापस अनुरोध कर रहा हूं। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अमन लेखी ने भी आदेश पर रोक लगाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह यूएपीए की धारा 15 में अस्पष्टता का आयात करता है, जो आतंकवाद को परिभाषित करता है”।

जस्टिस गुप्ता ने कहा कि चूंकि यह मुद्दा महत्वपूर्ण है और इसका अखिल भारतीय प्रभाव हो सकता है, हम नोटिस जारी करेंगे और पक्षों को सुनेंगे। जस्टिस गुप्ता ने सहमति व्यक्त की कि जिस तरह से उच्च न्यायालय द्वारा यूएपीए की व्याख्या की गई है, उसकी शीर्ष अदालत द्वारा जांच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जमानत आवेदन में, सभी कानूनों पर चर्चा करते हुए 100-पृष्ठ का फैसला बहुत आश्चर्यजनक है। हम क्या कह सकते हैं कि जमानत दे दी गई है और वे प्रभावित नहीं होंगे, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के प्रभाव पर रोक लगा देंगे।

आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोर देकर कहा कि जरूरत पड़ने पर मामले की जल्द से जल्द सुनवाई की जा सकती है, लेकिन स्टे नहीं लगाया जा सकता है। सिब्बल ने कहा कि रोक रहने का मतलब होगा कि आदेश पर प्रथम दृष्ट्या रोक लगा दी गई है। हमारे पास भी कहने के लिए बहुत कुछ है। हम ऐसा नहीं करते हैं, इस बीच हम उच्च न्यायालय के आदेश को एक मिसाल के रूप में नहीं मानते हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा को 15 जून को जमानत दी थी। यह देखते हुए कि दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया नहीं बनते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस एजे भंभानी की खंडपीठ ने आदेश में कहा था कि ऐसा लगता है कि सरकार के मन में असहमति की आवाज़ को दबाने को लेकर बेचैनी है। संविधान की ओर से दिए गए विरोध के अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच का अंतर हल्का या धुंधला हो गया है। अगर इस तरह की मानसिकता बढ़ती है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला देते हुए और इन्हें देवांगना, नताशा और आसिफ़ से जोड़ते हुए कहा था कि इस मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार ने प्रदर्शनों को रोक दिया हो लेकिन ऐसा नहीं दिखाई देता कि याचिकाकर्ता किसी तरह के अपराधी या षड्यंत्रकारी थे या वे किसी तरह के ग़ैर क़ानूनी विरोध-प्रदर्शन में शामिल थे।

खंडपीठ ने कहा था कि चार्जशीट को पढ़ने के बाद ऐसा कोई आरोप नहीं दिखाई देता जिससे यह कहा जा सके कि कोई आतंकी कृत्य हुआ हो और यूएपीए क़ानून की धारा 15 को लगाया जा सके या फिर धारा 17 और या 18 को। खंडपीठ ने कहा कि किसी विशिष्ट आरोप के माध्यम से चार्जशीट में बिल्कुल कुछ भी नहीं है, जो धारा 15, यूएपीए के अर्थ में आतंकवादी कृत्य को दिखाता हो; या धारा 17 के तहत एक आतंकवादी कृत्य के लिए ‘धन जुटाने’ का कार्य किया हो; या धारा 18 के अर्थों में आतंकवादी कार्य करने के लिए ‘साजिश’ या करने के लिए एक ‘तैयारी का कार्य’ किया हो। तदनुसार, प्रथम दृष्ट्या हम चार्ज-शीट में उन मौलिक तथ्यात्मक अवयवों को समझने में असमर्थ हैं, जो धारा 15, 17 या 18 यूएपीए के तहत परिभाषित किसी भी अपराध को खोजने के लिए जरूरी है।

दरअसल यूएपीए के तहत जमानत पाना बहुत ही मुश्किल होता है इसलिए इस कानून का इस्तेमाल पुलिस और जाँच एजेंसियां धड़ल्ले से करती हैं। जांच एजेंसी के पास चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिन का समय होता है, जिससे जेल में बंद व्यक्ति के मामले की सुनवाई मुश्किल होती है। यूएपीए की धारा 43-डी (5) में यह कहा गया है कि एक अभियुक्त को जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, यदि न्यायालय केस डायरी के अवलोकन या सीआरपीसी की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट पर विचार व्यक्त करता है कि यह मानने के लिए उचित आधार है कि इस तरह के व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाना प्रथम दृष्ट्या सही है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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