Friday, December 3, 2021

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झारखंड: मोतीलाल बास्के फर्जी मुठभेड़ के 4 साल, न्याय का अब भी इंतजार

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‘‘एक आदिवासी मजदूर सुबह-सुबह जंगल में लकड़ी काटने जाता है। कोबरा फोर्स की नजर उस आदिवासी मजदूर पर पड़ती है और 11 गोली उसके शरीर में दाग देती है। बाद में उस मजदूर आदिवासी मोतीलाल बास्के को ईनामी माओवादी घोषित कर दिया जाता है।’’ यह बात मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह बात आदिवासी मोतीलाल बास्के के परिजनों व ग्रामीणों के साथ-साथ झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व वर्तमान विपक्षी पार्टी भाजपा के द्वारा घोषित विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने भी कही थी।

हां, यह बात जरूर है कि वह साल 2021 नहीं बल्कि 2017 था और उस समय हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री नहीं बल्कि विपक्ष के नेता थे व बाबूलाल मरांडी उस समय भाजपा के नहीं बल्कि झारखंड विकास मोर्चा के सुप्रीमो थे।

9 जून 2017 को जब पूरा झारखंड महान छापामार योद्धा अमर शहीद बिरसा मुंडा का शहादत दिवस मना रहा था, उसी दिन झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत मधुबन थाना के चिरूवाबेड़ा गांव के निवासी आदिवासी मोतीलाल बास्के लकड़ी काटने एक कुल्हाड़ी लेकर पारसनाथ पहाड़ पर गया हुआ था। वैसे तो मोतीलाल बास्के जैन धर्मावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सम्मेद शिखर (पारसानाथ पर्वत) पर एक छोटा सा दुकान चलाता था और साथ ही तीर्थयात्रियों को बतौर डोली मजदूर डोली पर ढोकर पर्वत की परिक्रमा भी कराता था। लेकिन उस समय यात्रियों के कम रहने के कारण घर बनाने के लिए लकड़ी काटना ही उन्हें उचित लगा। मोतीलाल बास्के लकड़ी काटने तो गया, लेकिन लौट कर नहीं आ पाया।

मोतीलाल बास्के के गांव चिरूवाबेड़ा से कुछ ही दूरी पर उनका ससुराल ढोलकट्टा था और ये सपरिवार कुछ दिनों से यहीं रहते थे। पारसनाथ पर्वत पर गोलियां चलने की आवाज ढोलकट्टा व चिरूवाबेड़ा दोनों गांवों में स्पष्ट सुनायी पड़ रही थी, लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि यह गोलियां मोतीलाल बास्के पर बरसायी जा रही है।

एक आदिवासी मजदूर मोतीलाल बास्के की मौत पर प्रशासन की खुशी का यह आलम था कि उस समय झारखंड के तत्कालीन डीजीपी व वर्तमान में भाजपा नेता डीके पांडेय ने मोतीलाल बास्के के हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा को पार्टी देने के लिए तत्कालीन गिरिडीह एसपी अखिलेश बी। वारियार को एक लाख रूपये नगद 10 जून, 2017 को मधुबन के कल्याण निकेतन में स्थित सीआरपीएफ कैम्प में प्रेस के सामने दिया था और 15 लाख रूपये देने की घोषणा भी किया था। जबकि मोतीलाल पारसनाथ पर्वत पर स्थित चन्द्र प्रभु टोंक के पास भात-दाल और सत्तू की दूकान 2003 से ही चलाता था, साथ ही डोली मजदूर का काम भी करता था। वह उस वक्त अपने परिवार के साथ अपने ससुराल पीरटांड़ थानान्तर्गत ढोलकट्टा में ही रहता था। वे डोली मजदूरों के संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, जिसमें उसकी सदस्यता संख्या ‘डोली कार्ड संख्या 2065’ थी, साथ ही आदिवासियों के संगठन ‘मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी’ का भी सदस्य था। उसका बैंक ऑफ इंडिया की मधुबन शाखा में 24 सितंबर 2009 से ही अकाउंट था, जिसमें सरकार के द्वारा इंदिरा आवास के तहत 2600 रूपये की पहली किस्त भी आयी हुई थी और आवास का निर्माण भी चालू हो गया था। 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित ‘मरांग बुरु बाहा पोरोब’ में वह विधि व्यवस्था को संभालने के लिए वोलंटियर के रूप में भी तैनात था, जिसमें मुख्य अतिथि झारखंड की राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू थी।

मोतीलाल बास्के के माओवादी न होने का इतना सबूत होने के बाद स्वाभाविक रूप से मधुबन के आसपास की जनता सरकारी झूठ का पर्दाफाश करने के लिए गोलबंद हो गये। 11 जून को मधुबन में मजदूर संगठन समिति ने बैठक कर 14 जून को महापंचायत की घोषणा कर दी। 14 जून के महापंचायत में ही ‘दमन विरोधी मोर्चा’ का गठन किया गया, जिसमें मजदूर संगठन समिति के अलावा मरांग बुरू सांवता सुसार बैसी, विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन, भाकपा (माले) लिबरेशन, झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड विकास मोर्चा के साथ-साथ उस समय सरकार में भागीदार आजसू भी शामिल थे। इस महापंचायत में इलाके के कई जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। उसी दिन मोतीलाल की पत्नी पार्वती मुर्मू के द्वारा हत्यारे सीआरपीएफ कोबरा पर मुकदमा करने से संबंधित एक आवेदन भी पीरटांड़ थाना में दिया गया था। आंदोलन बढ़ता देख झारखंड पुलिस मुख्यालय से 16 जून को सीआइडी जांच की घोषणा भी की गई, लेकिन उसने पुलिस के कुकृत्य को ढंकने का ही काम किया। बाद में दमन विरोधी मोर्चा के द्वारा ही 17 जून का मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में डीसी कार्यालय के समक्ष धरना, 02 जुलाई को गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस, 03 जुलाई को गिरिडीह बंद, 10 अगस्त को विधानसभा मार्च, 13 सितम्बर को पीरटांड़ में एक विशाल सभा व 04 दिसंबर को राजभवन के समक्ष महाधरना जैसे विरोध-प्रदर्शन ने सरकार की नींद उड़ा दी थी, लेकिन 22 दिसंबर 2017 को इस विरोध-प्रदर्शन का में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे मोतीलाल बास्के के संगठन ‘मजदूर संगठन समिति’ को माओवादियों का मुखौटा संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया, उसके बाद विरोध-प्रदर्शन भी शांत हो गया।

4 दिसंबर, 2017 को राजभवन के समक्ष हेमंत व बाबूलाल

एक तरफ दमन विरोधी मोर्चा के प्रदर्शनों में उनकी मुख्य मांगों- 1. शहीद मोतीलाल बास्के की हत्या की न्यायिक जांच करायी जाये, 2. हत्यारा सीआरपीएफ, कोबरा एवं पुलिस पदाधिकारियों पर मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया जाये, 3. गरीब आदिवासी की हत्या का जश्न मनाने के लिए एक लाख रूपये बांटनेवाले डीजीपी एवं गिरिडीह एसपी को बर्खास्त कर उसपर मुकदमा दर्ज किया जाये, 4. पीरटांड़ प्रखंड एवं झारखंड राज्य की जनता से शहीद मोतीलाल बास्के की हत्या पर डीजीपी रेडियो व टीवी प्रसारण द्वारा माफी मांगे, 5. माओवादी के नाम पर गरीबो का दमन करना बंद करो एवं 6. शहीद मोतीलाल बास्के के आश्रितों को उचित मुआवजा तय करो से सहमति जताते हुए झारखंड के विपक्षी दलों के नेता जोर-शोर से शामिल हो रहे थे, तो दूसरी तरफ उनके गांव में भी विपक्षी नेताओं का आना-जाना लगा रहा। इस कड़ी में 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन के पोलित ब्यूरो सदस्य सह गिरिडीह जिला सचिव मनोज भक्त के नेतृत्व में एक टीम, 13 जून को झामुमो नेता वर्तमान में गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार सोनु के नेतृत्व में एक टीम, 20 जून को पूर्व मंत्री व झामुमो नेता वर्तमान में टुंडी विधायक मथुरा महतो, 21 जून को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन व वर्तमान में झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो, 01 जुलाई को मानवाधिकार संगठन सीडीआरओ की टीम, 12 जुलाई को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, 20 जुलाई को तत्कालीन झारखंड सरकार में भागीदार आजसू के जुगलसलाई विधायक रामचन्द्र सहिस के नेतृत्व में एक टीम, 25 जुलाई को तत्कालीन विधानसभा के विपक्षी नेता व वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आदि मोतीलाल बास्के के गांव पहुंचे थे और उनकी पत्नी व बच्चों से मिलकर उनकी मांगों को पूरा कराने का आश्वासन दिये थे।

शिबू सोरेन व जगरनाथ महतो के साथ पार्वती मुर्मू

उधर 15 जून, 2017 को ही हेमंत सोरेन ने रांची में पार्वती मुर्मू और उनके बच्चों के साथ एक संवाददाता सम्मेलन में मोतीलाल के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन में साथ देने का वादा किया था। 27 जुलाई, 2017 को राज्यसभा में भी झामुमो सांसद संजीव कुमार ने मोतीलाल बास्के की फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्या का मामला उठाया था और न्यायिक जांच की मांग की थी।

दिसंबर 2019 में झारखंड में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा-आजसू के कुशासन के खिलाफ झामुमो, राजद व कांग्रेस के महागठबंधन को सत्ता मिली। झामुमो के नेता हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में मोतीलाल बास्के के क्षेत्र (गिरिडीह विधानसभा) समेत आस-पास के तमाम विधानसभा क्षेत्रों में महागठबंधन को जीत मिली थी, लेकिन मोतीलाल बास्के भूला दिये गये थे।

फरवरी 2020 के प्रथम सप्ताह में इस पंक्ति के लेखक ने मोतीलाल बास्के की पत्नी पार्वती मुर्मू, पुत्र निर्मल बास्के व मोतीलाल बास्के के साले दीनू मुर्मू से मिलकर एक रिपोर्ट लिखी, जिसका प्रभाव पड़ा कि फरवरी 2020 के दूसरे सप्ताह में ही गिरिडीह विधायक ने पार्वती मुर्मू की मुलाकात मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कार्यवाही और न्याय का भरोसा दिलाया, लेकिन जमीनी कार्रवाई शून्य ही रही।

पार्वती मुर्मू ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरन से मुलाकात

09 जून, 2020 को मोतीलाल बास्के के तीसरे शहादत दिवस के मौके पर ग्रामीणों ने ऐलान किया कि 15 दिनों के अंदर अगर झारखंड सरकार मोतीलाल बास्के के फर्जी मुठभेड़ की जांच का आदेश नहीं देती हैं, तो सड़क पर उतरा जाएगा। इस एलान का असर यह रहा कि ठीक 15वें दिन 24 जून, 2020 को रांची के प्रोजेक्ट भवन स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय में गिरिडीह विधायक की उपस्थिति में तत्कालीन डीजीपी एमवी राव को जांच का आदेश दिया गया। 27 जून को डीजीपी के आदेश पर उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के डीआईजी अमोल वेणुकांत होलकर ने मधुबन थाना में पार्वती मुर्मू से मुलाकात किया। फिर कुछ दिनों के बाद सीआईडी डीएसपी तौकीर आलम ने भी मधुबन थाना में आकर पार्वती मुर्मू व ग्रामीणों का बयान लिया। इस पूरी प्रक्रिया में गिरिडीह विधायक भी मौजूद रहे।

जून 2020 के बाद फिर से झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शहीद मोतीलाल बास्के को फिर भूल गये हैं। (मैं शहीद इसलिए लिख रहा हूं कि मोतीलाल बास्के को ग्रामीण शहीद ही मानते हैं और गिरिडीह विधायक भी शहीद मोतीलाल बास्के ही लिखते हैं)। मुख्यमंत्री, विधायक, डीजीपी, डीआईजी, सीआईडी  डीएसपी की सक्रियता को देखकर लगा था कि जल्द ही मामले में सरकार का निर्णय आएगा, इसलिए सभी चुप ही रहे। लेकिन इस चुप्पी की आड़ में सरकार दूसरी ही खिचड़ी पका रही थी, इसका अंदाजा नवंबर, 2020 में तब लगा, जब ढोलकट्टा में सीआरपीएफ कैंप के निर्माण के लिए जमीन की मापी होने लगी। ग्रामीणों ने तुरंत 05 दिसंबर 2020 को गिरिडीह विधायक के साथ रांची जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात की, जिसमें पार्वती मुर्मू भी शामिल थी। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से मोतीलाल बास्के की फर्जी मुठभेड़ में की गई हत्या की जांच की याद तो दिलायी ही, साथ ही साथ अविलंब कैंप निर्माण पर रोक लगाने की भी मांग की। मुख्यमंत्री ने फिर आश्वासन दिया कि आपलोग जो चाहेंगे वही होगा। लेकिन उसके बाद फरवरी-मार्च 2021 में ढोलकट्टा स्कूल में सीआरपीएफ का अस्थायी कैंप स्थापित कर दिया गया। हालांकि 20 दिनों के बाद वहां से अस्थायी कैंप को हटा लिया गया है, लेकिन स्थायी कैंप के लिए जमीन मापी के लिए कई बार सीओ वहां आए हुए हैं।

फर्जी मुठभेड़ में मोतीलाल बास्केक की हत्या के 4 साल पूरे होने के मौके पर झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व भाजपा द्वारा घोषित विधयक दल के नेता बाबूलाल मरांडी से यह सवाल तो बनता ही है कि आखिर मोतीलाल बास्के के परिजनों को न्याय दिलाने के वादे का क्या हुआ?

(झारखण्ड से स्वत्रंत पत्रकार रुपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट )

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