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झारखंडः मनरेगाकर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी, ‘काम मांगों, काम पाओ’ योजना से बने मुश्किल हालात

झारखंड में मनरेगा कर्मचारियों की हड़ताल अभी भी जारी है। राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ के अह्वान पर पांच सूत्रीय मांगों को लेकर 27 जुलाई से यह हड़ताल है। इसका सीधा असर मनरेगा मजदूरों पर पड़ रहा है।

झारखंड में 52,96,000 ग्रामीण परिवार मनरेगा जॉब कार्डधारक हैं। इनमें 91,48,000 मनरेगा मजदूर रोजगार में शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सभी 24 जिलों में कार्यरत मनरेगा कार्यालयों की सूची में 51,2668 ऐसे मजदूर हैं, जो रजिस्टर्ड तो हैं, लेकिन उन्हें जॉब कार्ड नहीं मिला है।

जहां कोविड 19 से उत्पन्न संकट से पिछले चार महीनों से आर्थिक गतिविधि लगभग ठहर से गई है, वहीं खेतिहर मजदूर और छोटे किसान अब धान रोपनी के कार्यों से मुक्त हो चुके हैं। पूर्व में जो मजदूर धान रोपनी से मुक्त होकर एक बड़ी संख्या में अन्य राज्यों में पलायन करते थे, वैसे मजदूर भी अब अपने-अपने गांवों में मौजूद हैं। वैसे में इन मजदूरों और छोटे किसानों की आर्थिक चिंता बढ़ गई है। दूसरी तरफ राज्य के ग्रामीण इलाकों में प्रवासी मजदूर भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।

अनिश्चित कालीन राज्यव्यापी हड़ताल कर रहे मनरेगाकर्मियों की मांगों पर ग्रामीण विकास विभाग विचार न करके 16 अगस्त से राज्यव्यापी ‘काम मांगो, काम पाओ’ अभियान शुरू कर चुका है। इसके तहत विभाग ने सोशल ऑडिट यूनिट को मनरेगा मजदूरों से काम मंगवाने की जिम्मेदारी सौंपी है। वहीं काम मांगने की प्रक्रिया को बेहद सरल कर दिया गया है।

इस हालिया निर्देश के तहत अब मजदूरों के कार्य आवेदन ई-मेल और वाट्सएप के जरिए भी स्वीकार किए जा रहे हैं। इसकी पूरी कानूनी मान्यता होगी। अतः गांवों के मजदूर समूहों में कार्य आवेदन तैयार कर, उसके फोटो लेकर स्वयं अथवा गांव में उपलब्ध किसी के स्मार्टफोन के जरिये भी अपना आवेदन स्थानीय प्रशासन को भेज रहे हैं।

मजदूरों के काम की मांग किए जाने पर योजना के संचालन की अनियमितता में कमी आ सकती है। वहीं मनरेगा योजना को ठेकेदारों और बिचौलियों से मुक्त किया जा सकता है। मनरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज बताते हैं, ”इस प्रक्रिया की मांग राज्य के सामाजिक संगठन लंबे समय से लगातार करते रहे थे। अभी जिस रफ्तार से मजदूर काम के आवेदन दे रहे हैं और दूसरी तरफ मनरेगाकर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, ऐसे में सभी काम मांग करने वाले मजदूरों का रिकार्ड संधारित करते हुए काम उपलब्ध कराना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।”

उन्होंने कहा कि एक तो सरकार के पास मनरेगा के प्रारंभ से अब तक ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं हुआ है, जिसमें ग्रामवार और पंचायतवार वास्तविक मनरेगा श्रमिकों की संख्या का सही आंकड़ा रिकार्ड हो। मनरेगा मार्गदर्शिका अध्याय छह के अनुसार प्रत्येक वर्ष 31 मार्च तक वास्तविक मांग के अनुसार प्रत्येक गांव की योजनाओं के लिए ‘सेल्फ ऑफ वर्क्स’ तैयार रहना चाहिए था। जब भी मजदूर काम मांगें तो मौसम के अनुसार मजदूरों को तुरन्त काम उपलब्ध कराया जा सकता था। अभी प्रशासन, जब मजदूर काम की मांग कर रहे हैं, तो योजना स्वीकृति के लिए रिकार्ड तैयार करने के काम में लग रहा है। इन परिस्थितियों में ऐसा ‘घर में आग लगने पर कुआं खोदने’ के समान है।

उन्होंने कहा कि योजना स्वीकृति के लिए फाईलों का संधारण और सात रजिस्टर्स का संधारण आज की तारीख में सिर्फ रोजगार सेवक और बीपीओ को ही है। इस दफा सरकार को चाहिए कि जिन भी कर्मियों को मनरेगा कार्यों के संचालन में लगाया गया है, उनको सरकार द्वारा समय-समय पर दिए गए दिशा-निर्देशों, कानूनी प्रावधानों और मनरेगा वेबसाइट में संधारित की जाने वाली जारकारियों के बारे में अपने मशीनरी के लोगों को नियमित तौर पर प्रशिक्षित करें।

16 अगस्त से शुरू हुए राज्य व्यापी ‘काम मांगों, काम पाओ’ अभियान के तहत 23 अगस्त 2020 तक पूरे राज्य में कुल 2,62,121 मजदूरों ने काम की मांग की है, जिसमें सबसे ज्यादा गिरिडीह जिला में 29,558 मजदूरों ने काम की मांग की है, जबकि सबसे कम खूंटी जिले से मात्र 2448 लोगों ने काम की मांग की है। इस काम की मांग में दूसरे नंबर पर पलामू जिला है, जहां 20,779 लोगों ने काम की मांग की है, जबकि सबसे कम काम की मांग करने वाला खूंटी जिला के बाद सिमडेगा है जहां मात्र 3761 मजदूरों नें काम की मांग की है।

मनरेगा के काम को काफी सरलता और पारदर्शिता से चलाने के लिए झारखंड मनरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज ने 19 अगस्त 2020 को ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव को एक पत्र भेजकर झारखण्ड राज्य में मनरेगा अधिनियम 2005 की धारा 12 (1), 16 (1) एवं अनुसूची 1 और अनुसूची 2 संशोधन आदेश 2013 धारा 29 (क) से (ठ), धारा 30 एवं 31 के तहत संविधानिक ढांचों के गठन एवं क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में चार बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि झारखण्ड राज्य गारंटी परिषद की अंतिम बैठक चार साल पूर्व 27 जुलाई 2016 को की गई थी। इस संवैधानिक ढांचे के नहीं होने के कारण आज मनरेगा योजनाओं के नीतिगत निर्णय और अनुश्रवण जैसे महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हुए हैं।

राज्य में मनरेगा योजनाओं के चयन एवं क्रियान्वयन में ग्राम सभाओं की भूमिका को लगातार कमजोर किया जा रहा है। मनरेगा मार्गदर्शिका 2013, अध्याय छह का आखरी बार अनुपालन 2015 में योजना बनाओ अभियान के रूप में किया गया था। 2020-21 में जो भी योजनाएं ली गई हैं, उनमें ग्राम सभाओं की कोई भी भूमिका नहीं है। पेसा अधिनियम के तहत गठित ग्राम निगरानी समितियों को भी दरकिनार किया गया है।

”मनरेगा अधिनियम 2005, अनुसूची 2 संशोधन आदेश 2013 धारा 29 (क) से (ठ) में वर्णित प्रावधानों का ग्राम पंचायतों एवं प्रखंडों के स्तर पर अनुपालन नगण्य है। जिला एवं राज्य स्तर पर सिर्फ उन्हीं मामलों पर आंशिक कार्रवाई की जा रही है, जिनमें वित्तीय गड़बड़ियां शामिल हैं। जबकि प्रखंड स्तर पर मनरेगा श्रमिकों तथा आम नागरिकों की दूसरी तरह की भी समस्याएं हैं।

मनरेगा अधिनियम 2005, अनुसूची 2 संशोधन आदेश 2013 धारा 30 में प्रत्येक जिले स्तर पर मनरेगा से सम्बंधित शिकायतों को प्राप्त करने, जांच करने और आदेश पारित करने के लिए मनरेगा लोकपालों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है, लेकिन झारखण्ड राज्य में जुलाई 2020 से मनरेगा लोकपालों की भूमिका को निष्प्रभावी कर दिया गया है।

उन्होंने पत्र में मांग करते हुए लिखा है, “अत: आप से मांग करते हैं कि उपरोक्त क़ानूनी प्रावधानों को राज्य में सख्ती से लागू कराया जाए, जिससे कि मनरेगा योजनाओं और गतिविधियों को सुचारु रूप से चलाया जा सके। राज्य हित में मनरेगा श्रमिकों तथा कमजोर वर्गों के हित में नीतिगत निर्णय लिए जा सकें तथा अनियमितताओं पर नियमित निगरानी रखी जा सके।”

ऐसे में जब मनरेगा कर्मी हड़ताल पर हैं, तो मजदूरों का रिकार्ड बनाने में विभाग को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। नियम के अनुसार अगर तय समय पर मजदूरों को काम नहीं दिया जाता है, तो ऐसी स्थिति में मजदूर बेरोजगारी भत्ते के हकदार होते हैं। अभी जिस रफ्तार से मजदूर काम के लिए आवेदन दे रहे हैं, और मनरेगा कर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, ऐसे में सभी काम मांग करने वाले मजदूरों का रिकार्ड बनाते हुए काम उपलब्ध कराना विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, जिसमें विभाग के फेल होने की पूरी की पूरी संभावना है। तब जाहिर है मजदूरों में अफरातफरी का माहौल बन सकता है।

सूत्र बताते हैं कि मनरेगा कर्मियों का हड़ताल और उनकी मांगों पर विभाग द्वारा संज्ञान में न लेना हेमंत सरकार के खिलाफ एक गहरी साजिश है। सूत्र बताते हैं कि हेमंत सरकार में कई विभाग के अधिकारी भाजपा के काफी करीबी हैं, जो परोक्ष रूप से हेमंत सरकार को भ्रमित कर रहे हैं।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 25, 2020 9:44 pm

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