जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी: ज्ञान अर्जन का पुंज या ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’, अब क्या नाम देंगे वो लोग? 

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देश के आम चुनाव के समर में जेएनयू ने विश्व के अकादमिक या ज्ञान के आकाश में एक बार फिर से अपनी सकारात्मक भूमिका का परचम लहराया है। लंदन स्थित उच्च शिक्षा विश्लेषण फर्म ‘क्वैकारेल्ली सिमोंड्स (QS) के विश्व विश्वविद्यालय श्रेणी सर्वेक्षण ने दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी को दुनिया के विश्वविद्यालयों में विकास अध्ययन के अंतर्गत 20वें स्थान पर रखा है। भारत के लिए यह गर्व का विषय है। इतना ही नहीं, इस यूनिवर्सिटी को भूगोल, आधुनिक भाषा, राजनीति व अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध, मानव विज्ञान, इंग्लिश भाषा व साहित्य जैसे विषयों के अध्ययन-अध्यापन में भी शिखर स्थान पर माना जाता है। 

भारत सहित विश्व भर के विद्यार्थी इसमें प्रवेश के लिए लालायित रहते हैं। जेएनयू के विद्यार्थी भारत समेत विश्व के विभिन्न देशों में उच्च पदों पर रह चुके हैं। इसमें शिक्षित-दीक्षित विद्यार्थी अपने देशों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे पदों पर पहुंच चुके हैं। भारत में ही केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं। निवर्तमान विदेश मंत्री और वित्तमंत्री भी इसी यूनिवर्सिटी के पूर्व विद्यार्थी हैं। 

वास्तव में जेएनयू ने अपनी छवि के मुताबिक़ दो सप्ताह के भीतर अपना लोहा मनवाया है। जहां वह अकादमिक क्षेत्र में 20वें स्थान से गौरवान्वित हुआ है, वहीं इसने अपनी पहचान-अस्मिता को पुनर्स्थापित भी किया है अर्थात इसके विद्यार्थियों ने विवेक, विमर्श, विश्लेषण, संवाद और समतावादी चेतना की विरासत को ज़िंदा कर दिया है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की यही देन थी। सारांश में, इस विश्वविद्यालय को वैज्ञानिक मानस व आदर्श का सृजन केंद्र माना जाता है। अंधविश्वास, कूपमंडूकता, कट्टरवाद, अन्धभक्तिवाद, साम्प्रदायिकता जैसी ताक़तों के खिलाफ विद्यार्थियों में क्रिटिकल चेतना को अंकुरित किया जाता है। 

तभी, अप्रैल 1969 में स्थापित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक दफा फिर से लाल परचम लहराया है। छात्रसंघ के चारों शिखर पदों पर वाम विद्यार्थी मोर्चा और उसके सहयोगी संगठन की अभूतपूर्व विजय ने केंद्र की केसरिया सत्ता समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की महत्वाकांक्षाओं को एक बार फिर शून्य में बदल दिया है। तमाम अलोकतांत्रिक कोशिशों के बावज़ूद, विद्यार्थी परिषद का जेएनयू पर ‘केसरिया ध्वजारोहण’ का स्वप्न अधूरा ही रह गया। जहां यह वाम-विजय निश्चित ही चरम दक्षिण पंथियों के लिए चिंताजनक और निराशाजनक होगी, वहीं प्रगतिशील क्षेत्रों के लिए यह अप्रत्याशित घटना ‘आत्ममंथन व भावी रणनीति’ तय करने के लिए उपयुक्त अवसर भी है। 

चार साल के लम्बे इंतज़ार के बाद इस बार परिसर में फाल्गुन की होली का रंग खूब खिला। इस अवसर पर मिलीजुली भारतीय संस्कृति के अनोखे कवि नज़ीर अक़बराबादी की होली पर कविता याद आ गई : जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की, और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की”……। चार साल से भुतहा ख़ामोशी में जकड़ा  परिसर फिर से छात्र-छात्राओं के नारों -खुशियों से गुलज़ार हो उठा। इस त्वरित टिप्पणी में चुनाव परिणाम से प्रतिध्वनित संकेतों पर चर्चा है, मीडिया में प्रकाशित इसके विवरण से सभी परिचित हैं ही। 

बेशक़, जेएनयू की अकादमिक उपलब्धि और विद्यार्थी संगठनों की हार-जीत से देश की राजनीति की दिशा प्रभावित होगी, ऐसा निष्कर्ष निकालना बेतुकी क़वायद रहेगी। लेकिन, इस हार-जीत को सामान्य घटना भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, चार साल बाद जिस पृष्ठभूमि में चुनाव हुए और वाम विद्यार्थी शक्ति ने जिस शानदार परिणामों का प्रदर्शन किया है, वह निश्चित ही ऐतिहासिक है। इसके ठोस कारण हैं। 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा, दोनों की आँखों में यह विश्वविद्यालय आरम्भ से ही मोतियाबिंद बन कर खटकता रहा है; इसे अर्बन नक्सल गैंग; टुकड़े टुकड़े गैंग; राष्ट्रविरोधी; विलासिता का अड्डा जैसे तमगों से नवाज़ा जाता रहा है। 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से जेएनयू-विरोधी अभियान को सुनियोजित ढंग से चलाया गया। प्रगतिशील छात्र-छात्राओं को आतंकित किया गया। लगातार अशांति बनी रही। हिंसक घटनाएं भी हुईं। पुलिस ने परिसर को घेरे रखा। शिक्षक वर्ग भी भय के वातावरण में जीता रहा। 

प्रशासन ने कतिपय हास्यास्पद निर्णय लिए; परिसर में युद्ध और शौर्य के प्रतीकों के प्रदर्शन के सम्बन्ध में सोचा गया; देशभक्ति और राष्ट्रवाद के अध्ययन के उपदेश दिए गए; विद्यार्थी परिषद विरोधी विद्यार्थियों को राष्ट्रविरोधी के रूप चित्रित करने की कोशिशें हुईं। सारांश में, गैर-अकादमिक और प्रतिगामी मुद्दों पर ज़्यादा फोकस डाला गया। 

ग़ौरतलब बात यह भी है कि एक दशक के दौर में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की छवि को विकृत करने का अभियान भी राष्ट्रीय स्तर पर चला। मोदी-शाह सत्ता ने नेहरू को बौना बनाने की हर मुमकिन कोशिश की; संसद के भीतर और बाहर नेहरू-छवि पर हमले होते रहे। सुखद पक्ष यह है कि सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा किये गए कुप्रचार के बावज़ूद नेहरू की लोकप्रियता कम नहीं हुई। युवा वर्ग में भी नेहरू को नए सिरे से जानने की जिज्ञासा पैदा हुई है। अब भी नेहरू -साहित्य पढ़ा जा रहा है। 

चूंकि, विश्वविद्यालय नेहरू के नाम पर है, इसलिए  भाजपा सत्ता ने एक तीर से दो शिकार करने की कोशिशें की; नेहरू-छवि का विकृतिकरण और जेएनयू का बौनाकरण; टुकड़े-टुकड़े गैंग से बदनाम करना।  विश्वविद्यालय में व्याप्त इन तमाम आतंकी दुश्वारियों के परिवेश में वाम शक्तियों ने स्वयं को जीवित ही नहीं रखा है, बल्कि जीवंत बनाये रखने में सफल भी हुईं हैं। 

वाम-जिजीविषा का परिणाम है परिसर में वाम मोर्चे की विजय और लाल परचम का सैलाब। पाठकों को याद होगा कि पिछले तीन वर्षों से भारतीय विश्वविद्यालय स्थान तालिका में जेएनयू का स्थान ’दो’ बना हुआ है। इसकी गरिमा को धूल धूसरित करने के तमाम हथकंडों के बावजूद विश्व में इसकी बौद्धिक प्रतिष्ठा अभी तक अक्षुण्ण है और विदेशों में इसे सामाजिक शिक्षण व अध्ययन के लिए प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के रूप में देखा जाता है। वास्तव में, वाम विजय का अर्थ है तर्कशील व विमर्श शील भारत की वापसी। 

भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान विवेक, तर्क और विमर्श के स्थान पर विवेक और विमर्श मुक्त भारत का पक्षधर है। इसी पक्षधरता की कोख में अंधभक्ति पलती रहती है। आस्था और तर्क हीनता को प्रोत्साहित किया जाता है। आरंभ से ही जेएनयू अंध आस्था का विरोधी रहा है। इसने अपने विद्यार्थियों में विवेक,विमर्श और तार्किक प्रतिरोध की चेतना पैदा की है। वाम विजय से पुनः यह स्थापित हो गया है कि युवा भारत को कैसा ज्ञान और शिक्षण चाहिए। 

इस लेखक की दृष्टि में, वाम को संकीर्ण दायरे से मुक्त कर इसे विस्तार देने की महती आवश्यकता है; स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन और आइसा से सदस्य ही वामपंथी विद्यार्थी नहीं हैं; वाम परिभाषा में उन विद्यार्थियों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो बहुलतावाद, लोकतंत्र और संविधान के समर्थक हैं। मौज़ूद दौर में मार्क्सवादी चेतना से लैस और वाम दलों के सदस्य ही खांटी वामपंथी हो सकते हैं, ऐसी धारणा वाम दुनिया को सिकोड़ेगी। आज़ की महती ज़रुरत नए ढंग से वाम मोर्चे को विस्तार देने की है।

इसकी एक वज़ह भी है। ग्रामीण व देहाती पृष्ठभूमि से संबंधित विद्यार्थी वर्ग में वाम चेतना अंकुरित हुई है, यह ज़रूरी नहीं है। औसतन सामान्य भारतीय परिवार लोकतंत्र और संविधान के प्रति जागरूक रहते हैं। यह वर्ग देश में शांति और विकास का समर्थक है। ऐसे युवा वर्ग के सक्रिय सहयोग के लिए नई दृष्टि-नई रणनीति की ज़रूरत है। यूनिवर्सिटी में ग्रामीण भारत के विद्यार्थी बड़ी संख्या में आते हैं। विख्यात युवा नेता कन्हैया कुमार बिहार के ग्रामीण परिवेश से आये थे। 

अल्पसंख्यक समुदाय से भी युवा वर्ग आता है। इस अवसर पर पूर्व छात्र एक्टिविस्ट छत्तीस वर्षीय उमर खालिद को कैसे भुलाया जा सकता है। वे आज भी जेल में हैं। इस समुदाय के युवा वर्ग के मनोबल को फिर से उठाना चाहिए, जिससे कि वे परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रियता से हिस्सा लें। संक्षेप में, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वाम विजय को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। 

वाम मोर्चे की विजय ने यह भी साबित कर दिया है कि मोदी-शाह नेतृत्व में भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के रहते हुए भी ‘सब कुछ हाथ से फिसला नहीं है – मुठ्ठी में बहुत कुछ शेष ‘ है। लोकसभा के चुनाव होने ही जा रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में स्वतः वाम विजय का अभूतपूर्व महत्व हो गया है। विजयी युवा वर्ग समाज का ही शिक्षित हिस्सा है। इसका अर्थ यह है कि समाज के बड़े व्यापक वर्ग में सोचने-समझने -प्रतिक्रिया की चेतना सुप्त नहीं हुई है।

उसे जाग्रत किया जा सकता है। अतः विजय में निहित संदेशों को परिसर से बाहर ले जाया जाना चाहिए। युवा समाज के ‘ताज़ा अंडर करंट’ को समझना होगा। इसे आम जनता के साथ जोड़ना चाहिए। इस विजय का  संकेत यह भी है कि नवोदित युवा वर्ग को शांतिपूर्ण विश्वविद्यालय और समरसी विकासशील भारत चाहिए। उसे धर्म की अंधभक्ति, अखण्ड भारत, हिन्दू राष्ट्र, हिंदुत्व और जय श्रीराम जैसे भावनाप्रधान नारों के स्थान पर तर्कशील परिवेश चाहिए तथा देश में निर्वाचित अधिनायकवादी सत्ता नहीं, उदारवादी व संविधानवादी लोकतंत्र चाहिए। 

और अंत में, 

छात्र संघ के दो बार रह चुके पूर्व अध्यक्ष और जुझारू पत्रकार अमित सेनगुप्ता की इस गूंज से “मेरा नाम लाल है और मैं नगण्य नहीं हूं।“ किसे असहमति हो सकती है?

(राम शरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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