Saturday, October 23, 2021

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जज उत्तम आनंद हत्याकांड: सीबीआई की सीलबंद रिपोर्ट में कुछ भी नहीं

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झारखंड के न्यायाधीश उत्तम आनंद हत्याकांड में सीबीआई की तफ्तीश शुरू हो गयी है पर सीबीआई के हाथ अभी तक खाली हैं। चीफ जस्टिस को यहाँ तक कहना पड़ा कि सीबीआई के सीलबंद लिफाफे में कुछ भी नहीं है। दरअसल उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि झारखंड के न्यायाधीश उत्तम आनंद की संदिग्ध हत्या पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में अपराध के पीछे मकसद या कारण के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है।

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि सीलबंद लिफाफे में कुछ भी नहीं है। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि सीबीआई में आने के बाद जो भी विकास हुआ है, वह सीलबंद लिफाफे में दिया गया है।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि मेहता, यह वह मुद्दा नहीं है जो हम चाहते हैं। हम कुछ ठोस चाहते हैं। आपके लोगों ने मकसद या कारण के बारे में कुछ भी संकेत नहीं दिया है। इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जज उत्तम आनंद को टक्कर मारने वाले वाहन में सवार लोग हिरासत में हैं और वह और खुलासा नहीं कर सकते क्योंकि आरोपी से पूछताछ जारी है।

पीठ, जिसमें जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल थे, ने सीबीआई को झारखंड उच्च न्यायालय को जांच की प्रगति पर साप्ताहिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा था कि धनबाद जज उत्तम आनंद की कथित हत्या के मामले की सीबीआई जाँच झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की निगरानी में होगी। इस मामले में सीबीआई जाँच की प्रगति की साप्ताहिक निगरानी करेंगे।

पीठ ने यह निर्देश 28 जुलाई को धनबाद में सुबह की सैर के दौरान न्यायाधीश उत्तम आनंद की हत्या के संबंध में स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई के दौरान जारी किए। पीठ ने स्वत: संज्ञान मामले को एक अन्य रिट याचिका के साथ टैग करने का निर्देश दिया है जो 2019 में शीर्ष अदालत के समक्ष न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से संबंधित दायर की गई थी, जहां पहले ही राज्यों और भारत संघ को नोटिस जारी किया जा चुका है। पीठ ने कहा कि इस अदालत ने देश में खतरनाक स्थिति को हल करने का प्रयास करने के लिए इस मामले को उठाया है जहां वकीलों और न्यायिक अधिकारियों को आतंकित किया जा रहा है। पीठ ने केंद्र और राज्यों से कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि आप सभी इसमें भी जवाबी हलफनामा दाखिल करें।न्यायाधीश उत्तम आनंद के मामले में झारखंड राज्य की लापरवाही को चिह्नित करते हुए, न्यायालय ने सभी राज्यों को जवाब देने और न्यायिक अधिकारियों को किस तरह की सुरक्षा प्रदान की है, इस संबंध में पीठ ने एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था।

उच्चतम न्यायालय ने 30 जुलाई को मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए झारखंड के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को जांच की स्थिति पर एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था।

उत्तम आनंद की कथित हत्या की ख़बर आने पर 30 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया था और झारखंड के मुख्य सचिव और डीजीपी से जाँच पर एक हफ़्ते में रिपोर्ट मांगी थी। तब राज्य सरकार ने विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित की थी। एसआईटी की जाँच की प्रक्रिया को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने सवाल उठाए थे। हालाँकि बाद में राज्य सरकार ने इस मामले की सीबीआई जाँच की सिफारिश की थी।

सीबीआई ने आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत मामला दर्ज किया। एजेंसी की प्राथमिकी में कहा गया है कि सीबीआई के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विजय कुमार शुक्ला मामले के जाँच अधिकारी हैं।

धनबाद ज़िले की यह घटना 28 जुलाई को हुई थी। शुरुआती रिपोर्ट आई थी कि जज की मौत ऑटो की टक्कर से हुई। लेकिन इसके साथ ही हत्या की आशंका जताई जा रही थी। बाद में इस घटना का वीडियो आने पर वह आशंका और पुष्ट हुई कि यह टक्कर जानबूझकर मारी गई है। घटना 28 जुलाई सुबह उस वक़्त हुई थी जब एडिशनल जज उत्तम आनंद मॉर्निंग वॉक पर थे। वीडियो क्लिप में दिख रहा था कि जज उत्तम आनंद सड़क किनारे मॉर्निंग वॉक पर थे और पूरी सड़क खाली थी। लेकिन ऑटो ड्राइवर ऑटो को बीच सड़क से किनारे ले आया और जज को टक्कर मारकर फरार हो गया।

इस घटना की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो उच्चतम न्यायालय  ने इसका संज्ञान लिया। चीफ जस्टिस रमना ने झारखंड हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से इस मामले में बात की। इसकी जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया और एडीजी ऑपरेशन एसआईटी टीम के इंचार्ज बनाए गए।पाँच दिन पहले एसआईटी की झारखंड हाई कोर्ट ने ज़बरदस्त फटकार लगाई थी। अदालत ने कहा था कि झारखंड पुलिस ‘एक ख़ास जवाब’ पाने के लिए ख़ास ‘सवाल पूछ रही है’।हाईकोर्ट ने कहा था कि यह सही नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि ऑटोप्सी रिपोर्ट में कहा गया है कि मौत ‘सिर पर कठोर और कुंद पदार्थ से चोट लगने के कारण’ हुई थी। इसी का हवाला देते हुए कोर्ट ने पूछा कि ऐसे में पुलिस क्यों पूछ रही थी कि क्या गिरने के कारण ऐसी चोटें संभव हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि साज़िश का पता लगाना और मास्टरमाइंड को पकड़ना आवश्यक है और सिर्फ़ मोहरे को पकड़ना किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा। कोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज करने में हो रही देरी पर भी सवाल उठाया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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