Tuesday, October 19, 2021

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औरंगाबाद में दलितों पर सामंती हमले के खिलाफ माले ने किया राज्यव्यापी प्रतिवाद

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पटना। औरंगाबाद में दलित और गरीबों की बस्ती पर सामंती अपराधियों के जानलेवा हमले के खिलाफ भाकपा माले ने पूरे बिहार में विरोध-प्रदर्शन किया। इसी महीने 21 अगस्त को औरंगाबाद के दाउदनगर के अंछा में राजपूत जाति के सामंती अपराधियों ने हमला किया था। माले के पोलित ब्यूरो सदस्य और ओबरा के पूर्व विधायक राजाराम सिंह ने पटना में प्रोटेस्ट करते हुए कहा कि भाजपा-जदयू के दिन अब लद गए हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में राज्य के दलितों-गरीबों-अतिपिछिड़ों और व्यापक जनता ने इस जनविरोधी और सामंतपरस्त सरकार को सबक सिखाने का पूरी तरह से मन बना लिया है।

उन्होंने कहा कि अंछा में सामंती अपराधियों के भय से आतंक का माहौल था, लेकिन जब भाकपा-माले की टीम वहां पहुंची तब जाकर उन लोगों को हिम्मत आई। घटना की जानकारी मिलने के उपरांत भाकपा-माले की एक राज्यस्तरीय टीम गांव में पहुंची थी। टीम में उनके अलावा अरवल के पार्टी जिला सचिव महानंद, राज्य कमिटी के सदस्य जितेन्द्र यादव, रविन्द्र यादव और औरंगाबाद जिला सचिव मुनारिक शामिल थे।

आज के प्रतिवाद के तहत राज्य कार्यालय में ऐपवा की बिहार राज्य अध्यक्ष सरोज चौबे, राज्य कमेटी के सदस्य उमेश कुमार और अन्य नेताओं ने प्रतिवाद दर्ज किया। उन्होंने सभी घायलों के समुचित इलाज की मांग भी की।

पटना के आशियाना नगर, दीघा, कंकड़बाग, पटना सिटी आदि इलाकों में भी माले कार्यकर्ताओं ने अपने हाथों में तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। औरंगाबाद के दाउदनगर के कई गांवों में प्रतिरोध दर्ज किया गया और दलित-गरीबों पर लगातार किए जा रहे हमले का विरोध किया गया। विभिन्न गांवों के ग्रामीणों के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस राज्यव्यापी विरोध दिवस में भाग लिया। दाऊदनगर नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार दबगर, निलकोठी नगर सचिव बिरजू चैधरी, पचकठवा महेंद्र चैधरी, गुलजरपुर, रामनगर आदि स्थानों पर विरोध कार्यक्रम किया गया।

अनुमण्डल कार्यालय में प्रतिरोध सभा हुई। दाऊदनगर प्रखंड के विभिन्न पंचायत, गांव और प्रखंड कार्यालय में कार्यक्रम किया गया। इसमें अंछा गांव में हुए सामंती-जातीय हमले के खिलाफ आम गरीब जनता में आक्रोश देखा गया। तरार गांव में जनार्दन सिंह, मखरा में किसान नेता कामता यादव, रेपुरा में जिला कमेटी सदस्य नागेंद्र कुमार, मनार में मनोज मेहता, जिनोरिया में खेग्रामस नेता राजकुमार भगत, बेलड़ी में बामदेव सिंह, ठाकुर विगहा में दुधेवश्वर मेहता, बाबू अमौना में मदन प्रजापत, संसा में अलकारी देवी ने विरोध प्रदर्शन किया।

अंछा गांव में सोन कैनाल नहर रोड से अंछा की पइन मार्ग जो गरीब बस्ती से जोड़ती है, उसे अविलंब निर्माण कराने की भी मांग की गई। गरीब टोले के लिए 200 केवी का दो टांसफार्मर लगाने और गरीबों के ऊपर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग की गई। घायलों को सरकारी खर्च पर इलाज कराने और पीड़ित परिवार को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने की भी मांग उठाई गई। अरवल, जहानाबाद, गया आदि नजदीक के इलाकों में भी विरोध दिवस में जनता की जबरदस्त भागीदारी दिखी। भोजपुर के विभिन्न इलाकों में भी प्रतिवाद हुआ, इसमें मल्लाह जाति के गरीबों की गोलबंदी देखी गई।

पूर्वी चंपारण के मोतिहारी- छौड़ादानो रोड नारायण चौक पर मार्च निकालकर माले नेताओं ने लॉकडाउन के दौरान जदयू-भाजपा के संरक्षण में दलित गरीबों पर लगातार हो रहे हमले पर रोक लगाने की भी मांग की। सहरसा में माले और खेग्रामस नेताओं ने मार्च निकाला। पटना जिले के धनरूआ, फतुहा, विक्रम, पालीगंज आदि इलाकों में भी प्रतिवाद किया गया। मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सिवान, गोपालगंज, अररिया, भागलपुर, नवादा, वैशाली आदि तमाम जिलों में आज के कार्यक्रम को लागू किया गया।

उधर, कल 25 और 26 अगस्त को पूरे छत्तीसगढ़ में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी मोदी सरकार की जन विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेगी। माकपा 20 अगस्त से 16 सूत्रीय मांगपत्र पर देशव्यापी अभियान चला रही है।

इन मांगों में अंतर्राज्यीय प्रवासी मजदूर कानून 1979 को खत्म करने का प्रस्ताव वापस लेने और इसे और मजबूत बनाने, कोरोना आपदा से निपटने, प्रधानमंत्री केयर फंड नामक निजी ट्रस्ट में जमा धनराशि को राज्यों को वितरित करने, कोरोना महामारी में मरने वालों के परिवारों को राष्ट्रीय आपदा कोष के प्रावधानों के अनुसार एकमुश्त आर्थिक मदद देने, आरक्षण के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने और सारे बैकलॉग पदों को भरने, जेलों में बंद सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और पर्यावरण प्रभाव आंकलन के मसौदे को वापस लिए जाने जैसी बातें शामिल हैं।

माकपा राज्य सचिव मंडल संजय पराते ने कहा है कि कोरोना संकट की आड़ में जिन सत्यानाशी नीतियों को देश की जनता पर लादा जा रहा है, उसका नतीजा यही है कि आम जनता के सामने अपनी आजीविका और जिंदा रहने की समस्या है। वहीं इस कोरोना काल में अंबानी एशिया का सबसे धनी व्यक्ति बन गया है और उसकी संपत्ति में 20 अरब डॉलर की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद आर्थिक पैकेज का पूरा मुंह कॉर्पोरेट घरानों के लिए रियायतों की ओर मोड़ दिया गया है, जबकि आम जनता से कहा जा रहा है कि बैंकों से कर्ज लेकर जिंदा रहें।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा कि स्टैण्डर्ड एंड पुअर द्वारा देश की जीडीपी में 11% से ज्यादा की गिरावट होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि एक लंबे समय के लिए देश आर्थिक मंदी में फंस गया है। इस मंदी से निकलने का एकमात्र रास्ता यही है कि आम जनता की जेब में पैसे डालकर और मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध करवाकर उसकी क्रय शक्ति बढ़ाई जाए, ताकि बाजार में मांग पैदा हो और उद्योग-धंधों को गति मिले। इसके साथ ही सार्वजनिक कल्याण के कामों में सरकारी निवेश किया जाए और राष्ट्रीय संपदा को बेचने की नीति को पलटा जाए।

उन्होंने कहा कि यही कारण है कि इस देशव्यापी अभियान में आम जनता की रोजी-रोटी और उसकी आजीविका और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की हिफाजत की मांग उठाई जा रही है। माकपा की मांग है कि देश के हर जरूरतमंद व्यक्ति को आगामी छह माह तक 10 किलो चावल या गेंहूं और एक-एक किलो तेल, दाल और शक्कर मुफ्त दिया जाए।

उन्होंने कहा कि आयकर दायरे के बाहर के हर परिवार को हर माह 10000 रुपये नगद आर्थिक सहायता दी जाए। माकपा ने मनरेगा में 200 दिन काम और 600 रुपये रोजी की भी मांग की है। माकपा नेता ने आरोप लगाया कि लोगों के संगठित विरोध को तोड़ने के लिए अंग्रेजों के जमाने के काले कानूनों का उपयोग किया जा रहा है और आज आज़ादी के बाद सबसे ज्यादा राजनीतिक कैदी जेलों में है। श्रम, कृषि, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में मौजूदा कानूनों में जिस तरह कॉर्पोरेटपरस्त बदलाव किए जा रहे हैं और राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण किया जा रहा है, वह हमारे संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ हैं।

उन्होंने कहा कि देश में संविधान और जनतंत्र पर हो रहे इन हमलों के खिलाफ भी इन प्रदर्शनों का आयोजन किया जा रहा है। ये प्रदर्शन कोरोना प्रोटोकॉल और फिजिकल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखकर आयोजित किए जाएंगे।

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