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माले टीम का दौरा: कदम-कदम पर दिखे मौत और तबाहियों के निशान

( भाकपा (माले) की एक टीम ने 4 मार्च को दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया। इसमें पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रभात कुमार और कविता कृष्णन, पार्टी की केंद्रीय कमेटी सदस्य सुचेता डे, अखिल भारतीय किसान महासभा के उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलावत, एआईपीएफ़ के संयोजक गिरिजा पाठक, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महासचिव सतीश चंद्र यादव और आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कार्यकर्ता डोलन सामंत, कौशिक राज, जुनैद और मणिकांत शामिल थे। दौरे के बाद लौटी टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है।पेश है पूरी रिपोर्ट: संपादक)

मौजपुर

मौजपुर में मुख्य सड़क की जिस जगह पर कपिल मिश्रा ने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा का आह्वान किया था, देखा गया कि वहां मुसलमानों की दुकानों को विशेष रूप से बर्बरता, आगजनी और लूट का निशाना बनाया गया। माले टीम की मुलाकात एक मुस्लिम दुकानदार से हुई जिसके जूते की दुकान पर हमला हुआ था। दुकान को देखकर यह महसूस किया जा सकता था कि हमलावरों ने बर्बरता की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। इलाके में यह कोई अकेली दुकान नहीं थी। ढेर सारी ऐसी दुकानें थीं जिन्हें तहस-नहस कर दिया गया। हालांकि तस्वीर का एक दूसरा और बेहद मानवीय पहलू भी दिखा।

बताया गया कि कुछ दुकानें जो आगे से बच गयीं उनको बचाने का काम हिंदुओं ने किया था। हालांकि इसके पीछे एक और वजह बतायी गयी। जिसके मुताबिक मुसलमानों की दुकानों से सटी हिंदुओं की दुकानें थीं आग लगने पर उनकी भी उनके भी जलकर खा हो जाने का खतरा था। हिंदू दुकानदारों ने इसकी अपने तरीके से पुष्टि भी की। एक दुकानदार ने बताया कि  “एक दुकान में आग लगने से दूसरी दुकानों में भी उसके बढ़ने का खतरा था; एक पड़ोसी की दुकान में आग लगने से किसी की भी जान को खतरा होगा। उसका कहना था कि इस तरह की हिंसा के साथ हम कभी नहीं होंगे। हमलावर हेल्मेट और मास्क पहनकर आए थे। और सारे हमलावर क्षेत्र के बाहर के दिखाई दे रहे थे।” बताया जा रहा है कि दुकानों के जलने से लाखों की संपत्ति खाक हो गयी। जली दुकानों और नष्ट हुई संपत्तियों के मालिकों की दो चिंताएं थीं।

जिसे बातचीत में फुटवियर दुकानदार ने हम लोगों के साथ साझा किया। उसने बताया कि वह इस बात को लेकर आशंकित है कि मुआवजे के दावे के लिए उसे दुकान में मौजूद हर जोड़ी जूते की रसीदें दिखाने के लिए कहा जाएगा। लेकिन यह बिल्कुल असंभव है। क्योंकि वे सभी दुकानों में जलकर खाक हो गयी हैं। इसके अलावा उसने एक और परेशानी जाहिर की। उसका कहना था कि उसने जूते को उस कीमत से थोड़ा अधिक कीमत पर बेचा है। जिस पर उसने उन्हें थोक विक्रेताओं से खरीदा था।

अब जबकि जूते बिक्री योग्य नहीं थे, तो निश्चित रूप से उसे बिक्री मूल्य पर मुआवजा दिया जाना चाहिए। हालांकि इसके लिए वह कोई रसीद नहीं दिखा सकता है। इसके अलावा टीम जिन कई दुकानदारों से मिली सभी ने कहा, “हमारे कागजात दुकान के अंदर जला दिए गए, या दुकान के बाहर ले जाकर नष्ट कर दिये गए। हम इन दिनों कमा नहीं पा रहे हैं”। साथ ही सवाल किया कि, “क्या हमें इस अवधि में आजीविका के नुकसान की भरपाई नहीं की जानी चाहिए?”

दूसरी समस्या उससे भी ज्यादा गंभीर दिखी। जली या फिर धराशयी कर दी गयीं कई मुसलमानों की दुकानें किराए पर हैं। और उनके मकान का मालिक हिंदू है। कुछ दुकानदारों ने बताया कि इसके लिए अब हिंदू मकान मालिकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें दुकान मुसलमानों को किराए पर न देने की चेतावनी दी गयी थी। इसको एक दूसरे हिंदू मालिक ने और स्पष्ट किया। जब उसने बताया कि, “यह मुसीबत को आमंत्रित करने जैसा है।

एक मुस्लिम किरायेदार रखने का मतलब है अपनी संपत्ति को आग लगवाना।” कुछ मुस्लिम किरायेदारों ने हमें बताया, “मौजूदा समय में हमने अपनी सारी संपत्ति खो दी है। ऐसी स्थिति में अगर हमें अपने व्यवसाय को फिर से चलाने और आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं मिली तो हम भला कैसे बचेंगे? इस लिहाज से हमारे नुकसान का मुआवजा बहुत जरूरी हो जाता है। बगैर उसे हासिल किए हम अपनी जिंदगी भी नहीं शुरू कर पाएंगे”।

भजनपुरा

भजनपुरा की तस्वीर भी दूसरे तबाह होने वाले मोहल्लों से अलग नहीं है। यहां मुसलमानों से संबंधित ऑटो स्पेयर पार्ट्स हो या कि पर्यटन और यात्रा से जुड़ी दुकानें सब को आग के हवाले कर दिया गया। इस बात में कोई शक नहीं कि हमलावरों ने चुन-चुन कर मुसलमानों की दुकानों को निशाना बनाया। अपवाद स्वरूप हिंदुओं की भी कुछ दुकानों को क्षति पहुंचायी गयी है। हालांकि इसके पीछे भी लगता है कि कोई टैक्टिकल बात थी।

इनमें “ज़ोहन ऑटोमोबाइल” के बगल में एक मारुति शोरूम और मुसलमानों के मालिकाना हक वाली दुकानों की एक श्रृंखला के ठीक बगल में एक पेट्रोल पंप शामिल है। पेट्रोल पंप मालिक ने कहा कि भीड़ ने किसी की भी कोई बात नहीं सुनी। यहां तो कुछ अजीब ही हुआ जिसमें बताया जा रहा है कि पुलिस वालों तक को हमलवार नहीं बख्शे। और उनके साथ जमकर मारपीट की। पास में मौजूद पेट्रोल पंप को तो जलाकर बिल्कुल तहस-नहस ही कर दिया गया।

हमलावर किस कदर बेखौफ थे और पुलिस भी उनके सामने लाचार उसकी नजीर खजूरी खास में पुलिस सहायता केंद्र के सामने स्थित सूफी संत की मजार है। दंगाइयों ने उसे भी आग के हवाले कर दिया। देश में आमतौर पर माना जाता है कि हिंदू भी मजारों के सामने अपना सिर झुकाते हैं। लेकिन यहां जो नजारा देखने को मिला उससे यह बात बिल्कुल दावे के साथ कही जा सकती है कि हमलावरों के ऊपर हैवानियत सवार थी। उनका हिंदू धर्म से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। और वो महज नाम के हिंदू थे।

दिलचस्प बात यह है कि इस मौके पर हमें कई ऐसे वीडियो मुहैया कराए गए जो इलाके में हुए हैवानी हमले की खुली बयानी कर रहे थे। एक युवक ने बाकायदा सेल्फी वीडियो के जरिये पूरे वाकये को अपने मोबाइल में कैद किया था। जिसमें भीड़ द्वारा लगाए जा रहे जय श्रीराम के नारे को बिल्कुल स्पष्ट तौर पर सुना जा सकता है। साथ ही उसमें गर्व से की गयी यह घोषणा भी शामिल थी कि “पुलिस हमारे साथ है।”

अब जबकि दंगे की पूरी कहानी सामने आ रही है तो यह बात 100 फीसद सच दिख रही है। चांद बाग के पास स्थिति मोहन नर्सिंग होम दंगों की नई किंवदंति बन गया है। दंगाइयों ने इसे अपने पूरे कब्जे में ले लिया था।” इसकी छत से बंदूक के जरिेये फायरिंग करने के कई वीडियो हैं। इसमें उनको बार-बार मुसलमानों से यह कहते सुना जा सकता है कि, “बाहर आओ और अपनी अजादी ले लो”। कहा जा रहा है कि हमलावरों ने मुस्लिम महिलाओं के साथ बदसलूकी भी की। लेकिन इस आरोप की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हो पायी है।

भजनपुरा में हमारी मुलाकात इस्लाम भाई से हुई। उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से अपने बच्चों को कार में बैठा लिया था। बवाल के समय एक पुलिस वाले ने उनकी कार रास्ते में रोक ली। उन्होंने बताया कि उसने गोलियों से घायल अपने उच्च अफसरों (वरिष्ठ पुलिस अधिकारी) की मदद की गुहार लगायी। और उन सभी को अस्पताल ले जाने में सहयोग करने के लिए कहा। इस्लाम ने एक पल की भी देरी नहीं की और तैयार हो गए। और घायल एसीपी, डीसीपी और कांस्टेबल रतन लाल समेत सभी को अस्पताल पहुंच दिया।

इस बीच अपनी नौ साल की बेटी समेत अपने मासूम बच्चों को वह सड़क पर ही इंतजार करने के लिए छोड़ दिए थे। हालांकि कॉन्स्टेबल रतन लाल को बचाया नहीं जा सका। इस्लाम ने बताया, “मेरे बच्चे सड़क पर तनहा खड़े होने से बहुत डर रहे थे, लेकिन कार में पर्याप्त जगह नहीं थी, और मुझे लगा कि यह जीवन और मौत का मामला है, इसलिए पुलिसकर्मियों को अस्पताल ले जाने के लिए हमें प्राथमिकता देनी चाहिए।”

शिव विहार

शिव विहार हिंसा के सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। मुसलमानों के नमाज पढ़ने के लिए नाला रोड के पास स्थित अकेली औलिया मस्जिद की दंगाइयों ने ऐसी सूरत कर दी जिसे किसी के लिए पहचान पाना भी मुश्किल है। हमलावरों ने पहले उसे जलाया और फिर तहस-नहस कर दिया। बताया जा रहा है कि सूफी-संतों को समर्पित इस मस्जिद को उड़ाने के लिए बाकयदा गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल किया गया।

मुख्य सड़क पर और मस्जिद से सटी गलियों में भयावह तबाही का आलम है। गली नंबर 12 में एक महिला थी जिसके आंसू थमने के नाम ही नहीं ले रहे थे। उसका पूरा घर और उसके सारे सामान जल गए थे। रोते-रोते उसने अपनी पूरी कहानी बयां की। अनपढ़ होते हुए भी वह किस तरह से अपने बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रही थी और साथ ही अपनी छोटी-मोटी गृहस्थी को आगे बढ़ा रही थी। इसके लिए तमाम जरूरी सामान वह टीवी हो या कि फ्रिज कितनी मेहनत से जुटायी थी। उसकी कहानी में शामिल थे। “यह सब अब चला गया है, मैं क्या कर सकती हूं, हमारे बच्चों का क्या होगा” यह सब कहते वह रोए जा रही थी।

उसने बताया कि मुआवजे के एवज में उसे दिल्ली सरकार से 25000 रुपये मिले हैं। कुछ अन्य पीड़ितों ने भी एसडीएम के दौरे और 25000 रुपये नकद हासिल करने की बात बतायी। यह छोटी राशि उन्हें अगले महीने या उससे अधिक समय तक तो रोक सकती है लेकिन यह उनके नुकसान की भरपाई कतई नहीं हो सकती है। महिला ने बताया कि वह और उसके बच्चे ईदगाह में अपने रिश्तेदारों के साथ रह रहे थे। और अब पिछली रात राहत शिविर में चले गए। शिविरों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। इस महिला की बात सुनकर कुछ इसी तरह का एहसास हुआ। उसने बताया कि भोजन की व्यवस्था अच्छी है। लेकिन कपड़े और अन्य चीजों के वितरण में अनियमितता और अराजकता है। उसने कहा कि ‘मेरे तन पर महज एक कपड़ा है। क्या इन लोगों को नहीं दिख रहा है’।

एक महिला ने बताया कि वह एक बेहद गरीब हिन्दू परिवार (एक बुजुर्ग महिला और उसकी पुत्रवधू और पोते) के साथ एक ढहे घर में रहती थी। हिंदू होने के बाद भी वे बेहद उदार थे। और हर तरह की मदद के लिए तैयार रहते थे। हिंदू परिवार के एक सदस्य ने बताया कि कैसे उन लोगों ने मुस्लिम पड़ोसियों पर जब हमला हुआ तो उन्हें बचाने के लिए आगे आए। उन लोगों ने न केवल जान बचायी बल्कि मुसलमानों को वहां से सुरक्षित निकालने में हर तरह का जरूरी सहयोग किया।

उनके घर के ठीक सामने भैंसों की एक डेरी थी- जहां मुस्लिम मालिक अपनी भैंसों को छोड़कर भाग गए। “हमने भैंसों को चारा खिलाया, कुछ पड़ोसियों ने ताने भरे अंदाज में कहा भी कि ये मुसलमानों की भैंसें हैं आपको चारा अपने मवेशियों को खिलाना चाहिए। लेकिन उसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा। कुछ दिनों के बाद हमने मुस्लिम मालिकों को वापस बुलाया और उनसे अपनी भैंसों को कहीं और ले जाने की गुजारिश की। क्योंकि और चारा खिला पाना हम लोगों के लिए संभव नहीं हो पा रहा था।”

अलीगढ़ और पश्चिमी यूपी की बोली बोलते हुए कुछ महिलाएं अपने “मुस्लिम” (मोहम्मडन) पड़ोसियों की मदद के एक वाकये को सुनाकर गर्व महसूस कर रही थीं। उन्होंने बताया, “एक युवा मुस्लिम महिला बच्चे को जन्म देने के दौरान बेहोश हो गई। हम अपने घर में ले गए और उसे अपने बिस्तर पर लिटा दिया। पानी पिलाया। फिर उसे शांत कराने की कोशिश की। हम भी महिलाएं हैं, हम जानते हैं कि प्रसव के बाद कैसा महसूस होता है।”

इसके साथ ही उन लोगों ने उस राजनीति को भी कोसा, जिसमें हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगे और घृणा से लाभ होता है। महिलाओं में से एक ने कहा, “मेरे पति, अपने परिवार के कमाऊ सदस्य हैं, और एक मुस्लिम की साइकिल की दुकान पर मरम्मत का काम करते हैं। जब से मुसलमानों को दुकान बंद करने और भागने के लिए मजबूर किया गया है, मेरे पति का भी काम पर जाना छूट गया। अगर वे कमाएंगे नहीं तो हम खाएंगे क्या? हमें भी लगता है कि जिनकी दुकानें और घर नष्ट हो गए हैं उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए। और यह उनका अधिकार है”। लेकिन इसके साथ ही उन लोगों ने एक दूसरा मामला भी उठाया जो किसी भी रूप में गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता है। उनका कहना था कि दुकानों पर काम करने वाले भी अपनी आजीविका खो चुके हैं। लिहाजा उनका भी मुआवजा हासिल करने का अधिकार बन जाता है। उन्होंने सवालिया अंदाज में हम लोगों से पूछा कि क्या इस मसले को हम आगे बढ़ाएंगे।

शिव विहार तिराहे के पास हमारी मुलाकात महेंद्र कुमार से हुई। उनका घर पूरी तरह से जल कर खाक हो गया है।वह हमें अपनी गली में ले गए, यहां कई घर और दुकानें हिंदुओं की थीं उन्हें भी जला दिया गया था। गली के अंत में चारपाई पर बैठे कुछ मुस्लिम परिवार दिखे। उनके साथ उनके पड़ोसी सुंदर और उनके पिता एवं भाई भी मौजूद थे। इन हिंदू-मुसलमान परिवारों के बीच रहन-सहन के साथ खान-पान का भी रिश्ता था। सुंदर ने बताया कि गुलफाम और उनके परिजनों ने मुस्लिम लोगों से बचाने के लिए उनकी दुकान पर नजर बनाए रखी थी। जब उनको पता चला कि एक हिंदू भीड़ आ रही है, तो सुंदर ने गुलफाम के परिवार को अपने घर के भीतर छुपा लिया। लेकिन उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि गुलफाम और उनके परिवार को भीड़ से ज्यादा समय तक बचा पाना मुश्किल है। लिहाजा उन लोगों ने परिवार समेत गुलफाम को सुरक्षित दूसरे स्थान पर भेज दिया।

हालांकि बाद में एक मुस्लिम भीड़ ने सुंदर की दुकान को नष्ट कर दिया। लेकिन दोनों परिवार इस बात से सहमत हैं कि इसके पीछे उनके एक नये मुस्लिम पड़ोसी का हाथ था जिसने भेदिए का काम किया। ( इस क्षेत्र के लिए नया होने के चलते उसका नाम भी इन लोगों का नहीं पता था।) सुंदर के पिता ने बताया कि, ‘देखिए, मैं एक विशेष व्यक्ति को दोषी मानता हूं, मुस्लिम समुदाय को नहीं। गुलफाम और उनका परिवार हमारे दोस्त हैं, और उनको मैं दोष नहीं देता हूं। मेरा मानना है कि किसी एक व्यक्ति के अपराध के लिए उसके पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।’

दोनों परिवारों का कहना था कि इस मामले में पूरी जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की बनती है। बाकी दोष राजनेताओं का है जिन्होंने वोट के लिए घृणा और हिंसा का दामन थाम लिया है। वहां से निकलते समय एक मुस्लिम परिवार के सदस्य ने हम लोगों को एक कोने में ले जाकर कहा कि “अपनी दुकान खो चुके हिंदुओं में से एक शख्स बेहद गरीब है। वह बहुत अच्छा इंसान है। अगर संभव हो तो इस बात को सुनिश्चित करें कि उसको उचित मुआवजा मिल सके”। सांप्रदायिक विभाजन और अविश्वास की खाईं अभी भी गहरी है। मुसलमान हिंदू पड़ोसियों से डर रहे हैं। लेकिन फिर भी, हमने पाया कि कुछ मानवता और विश्वास इस प्रकरण में बच गए थे। गुलफाम और सुंदर के परिवार के सदस्यों का कहना था कि, “इन्सानियत और मानवता यहां अभी भी जीवित हैं”

हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक स्थायी दरार पैदा करने के लिहाज से बीजेपी ने हिंसा को बढ़ाने का काम किया। इसके तहत मुसलमानों के जीवन और उनकी संपत्ति के नुकसान को सुनिश्चित करने के लिए इसे आयोजित किया गया था। जबकि सच्चाई यह है कि मुस्लिम और हिंदू दोनों पीड़ित हैं। इस मामले में पुलिस का रवैया बेहद आपराधिक रहा। पुलिस न केवल मूकदर्शक बनी रही बल्कि दंगाई तत्वों का वह कई जगहों पर खुला समर्थन करते पायी गयी।

इस बात में कोई शक नहीं कि इन क्षेत्रों में भाजपा द्वारा किए गए नुकसान (आपसी भाई-चारा) को कम करने के लिए अमनपसंद ताकतों को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसा लगता है कि दिल्ली सरकार को शांति, न्याय, राहत और पुनर्वास के प्रयासों को सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

1) सुनिश्चित करे कि मुस्लिम किरायेदारों को हिंदुओं के मकानों में किराए पर रखा जाए।

2) पर्याप्त मुआवजे के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई एक शर्त नहीं होनी चाहिए।

3) आजीविका के नुकसान के साथ-साथ संपत्ति और जीवन की हानि के लिए मुआवजे का भुगतान किया जाना चाहिए।

4) कहीं अधिक प्रभावी राहत और पुनर्वास के प्रयास होने चाहिए।

हमें यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करना होगा कि जो लोग दंगों में बच गए हैं उन्हें उचित मुआवजा मिले जिससे उनके जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर आ सके। साथ ही इस बात के प्रयास करने होंगे कि सभी को न्याय मिले। बचे लोगों को आर्थिक नुकसान की विधिवत भरपाई हो सके। हमें पीड़ितों के हर नुकसान की भरपाई करवाने में मदद करनी चाहिए। यदि सरकार जीवन का पुनर्निमाण करने में विफल रहती है, तो हम लोगों को उसके लिए सरकार पर दबाव डालना चाहिए।

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This post was last modified on March 7, 2020 11:00 pm

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