मी लॉर्ड! जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे किसी शख्स को आप कैसे दे सकते हैं ‘मौत की सजा’?

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क्या ब्लैक फंगस की दवा ‘लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी’ के वितरण पर दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश और टिप्पणी मोदी सरकार को ये सहूलियत देती है कि वो चुनें कि अब इस देश में किसे जीने का अधिकार है और किसे नहीं? या क्या दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश मौजूदा पूंजीवादी ढांचे को तोड़ने की कोशिश करता है कि आप एक गरीब युवा की ज़िंदग़ी के बरअक्श पैसे के दम पर किसी बूढ़े के लिये वो दवा नहीं खरीद सकते। क्या मौजूदा पूंजीवादी तंत्र में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश और टिप्पणी के बाद एक धनाड्य बूढ़े को सॉरी कह दिया जायेगा और एक खाली जेब गरीब युवक को ब्लैक फंगस दवा दे दी जायेगी।

आखिर ‘लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी’ दवाई के वितरण में बाइनरी कोर्ट ने किसके बीच बनायी है। क्या ये बाइनरी अमीर बूढ़े और अमीर युवा के बीच बनायी गयी है। क्या इसमें कास्ट और रिलिजन भी मैटर करेगा। दरअसल चुनाव तो केंद्र सरकार को ही करना है जो गैर हिंदुओं और गैर-सवर्णों के प्रति शत्रुता के भाव से भरी हुयी है। इस पूरी रिपोर्ट मे हम आगे देखेंगे कि कैसे केंद्र सरकार ने लगातार आम जनता की सस्ती दवाइयों तक पहुंच को कैसे दूर कर दिया है। ये कमी सरकार की खुद पैदा की हुयी है।   

आइये पहले यह जान लेते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट ने कल अपने आदेश में कहा क्या है। दरअसल कल मंगलवार को एक याचिका पर सुनवायी करते हुये न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने ब्लैक फंगस की दवा की कमी को लेकर कहा कि वे भारी दिल से केंद्र को ब्लैक फंगस के इलाज के लिए लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी दवा के वितरण पर एक नीति बनाने का निर्देश देते हैं। इस नीति में युवा पीढ़ी के रोगियों को प्राथमिकता दी जाए, जो देश का निर्माण और उसे आगे ले जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने कल कहा कि दवा जीवित रहने की बेहतर संभावना वाले लोगों के साथ-साथ युवा पीढ़ी को भी प्राथमिकता के आधार पर दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा ऐसा कर हम सभी का नहीं तो कुछ लोगों के जीवन को तो बचा सकते हैं।

अदालत ने लगे हाथ सफाई भी दे दिया कि वे ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहे कि बुजुर्गों का जीवन महत्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि, बुजुर्ग व्यक्तियों द्वारा एक परिवार को प्रदान किए जाने वाले भावनात्मक स्पोर्ट को नहीं आंका जा सकता। लेकिन यह भी सत्य है कि बुजुर्ग अपना जीवन जी चुके हैं जबकि युवाओं के सामने पूरा जीवन पड़ा हुआ है। 
अपने तर्क को पुख्ता करने के लिये दिल्ली हाईकोर्ट ने इटली का उदाहरण दिया जहां बेड कम पड़ने पर युवाओं को प्राथमिकता देने के लिए बुजुर्गों से माफी मांगी लिया गया था। एक उदाहरण के बाद दूसरे उदाहरण में प्रधान एसपीजी सुरक्षा का उदाहरण देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आप देश के प्रधानमंत्री को एसपीजी सुरक्षा क्यों प्रदान करते हैं न कि दूसरों को? क्योंकि, उनके कार्यालय को इसकी ज़रूरत है। इसी तरह आप दवा पहले उन लोगों को उपलब्ध कराएं, जो समाज की सेवा कर रहे हैं। हमें अपने भविष्य की यानी अपनी युवा पीढ़ी की रक्षा करने की ज़रूरत है।

दवाइयों के वितरण के फॉर्मूले की बात करते हुये आम जन की तुलना में प्रधानमंत्री को एसपीजी सुरक्षा का उदाहरण देकर काफी हद तक दवा वितरण में वर्ग चुनाव के संकट को भी हल कर दिया गया है।  

बता दें कि पिछले दो सप्ताह से दिल्ली सहित पूरे देश में ब्लैक फंगस की दवा लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी और वैकल्पिक दवा की भारी कमी है। जिसके कारण बड़ी संख्या में मौत हो रही है।

लेकिन कोर्ट ने सरकार से ये नहीं पूछा कि देश में दवाइयां कम क्यों है। क्यों पहले रेमडेसविर, फेबिफ्लू जैसी एंटीवायरल दवाइयों की भारी कमी हुयी। और अब ‘लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी’ जैसी एंटीफंगल दवाई की कमी क्यों है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से ये पूछने की जहमत क्यों नहीं उठायी कि कोरोना काल में जब लोग मर रहे हैं, उन्हें इलाज नहीं मिल रहा है, दवाइयां नहीं मिल रही है, आपने 2 सरकारी फ़ॉर्मा कपंनियों को बंद करने और 3 सरकारी फॉर्मा कंपनियों को बंद करने की जुर्रत कैसे की।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से ये क्यों नहीं पूछा कि कोरोनाकाल में रेमडेसवविर और फेबिफ्लू की कालाबाज़ारी क्यों हुयी। और ये दवाइयां आवश्यक दवाइयों की सूची से बाहर क्यों थीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने ये एक भी बार क्यों नहीं कहा कि निजी फ़ॉर्मा कंपनियां सिर्फ़ उन्हीं दवाइयों का उत्पादन करेंगी जिनकी बाज़ार में मांग होगी, जिनमें उन्हें मोटा मुनाफा मिलेगा। ऐसे में सरकारी फ़ॉर्मा कंपनियों को बंद करके या उन्हें बेंचकर क्या गरीब जनों को मौत के मुंह में धकेलना नहीं है। 

 
विभिन्न बीमारियों से पीड़ित रोगियों के उपचार के लिये दिशा निर्देश बनाने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुये कहा है कि अब समय आ गया है कि विभिन्न बीमारियों से पीड़ित रोगियों के चिकित्सा उपचार के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करने के लिए इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) को एक सांविधिक बॉडी का गठन करना चाहिए और एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। यह ब्लैक फंगस के उपचार के लिए लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी, प्लेन एम्फोटेरिसिन-बी और पोसाकोनाजोल के उपयोग के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करें। अदालत ने कहा यह भी पता किया जाए कि मरीज को कितनी दवा की ज़रूरत है।

जबकि दो दिन पहले 28 मई को इसी मामले यानि ब्लैक फंगस की दवा की किल्लत और मरीजों को हो रही दिक्कतों पर हाईकोर्ट ने कहा था कि हम इस नरक में जी रहे हैं। हर कोई इस नरक में जी रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहां हम मदद करना चाहते हैं, लेकिन हम असहाय हैं।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने हाईकोर्ट को बताया था कि 28 मई को सुबह नौ बजे तक म्यूकरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) के 14,872 उपचाराधीन मरीज हैं और इसमें 423 मरीज दिल्ली में हैं। उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया, रूस, जर्मनी, अर्जेन्टीना, बेल्जियम और चीन से लिपोसोमल एंफोटेरिसिन-बी की 2,30,000 शीशियों को खरीदने को लेकर कदम उठाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विदेश मंत्रालय से कहा है।

दो सरकारी फार्मा कंपनियां बंद होंगी, 3 में विनिवेश होगा

केंद्र की मोदी सरकार ने कोरोना महामारी के बीच फरवरी 2021 में इंडियन ड्रग्स एंड फार्मा लिमिटेड और राजस्थान ड्रग्स एंड फार्मा लिमिटेड को बंद करने और हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड, बंगाल केमिकल एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड और कर्नाटका एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्यूटिकल लिमिटेड को निजी हाथों में बेंचने का फैसला लिया।

उपरोक्त दो सरकारी दवा कंपनियां बंद करने और तीन सरकारी दवा कंपनियों को निजी हाथों में बेंचने का फैसला केंद्र सरकार ने लिया। 10 फरवरी 2021 को देश की संसद में केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में ये जानकारी दी थी। बता दें कि फार्मा विभाग में इस समय 5 सरकारी कंपनियां हैं या थीं। इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने आईडीपीएल और आईपीएल के सभी एंप्लॉई को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लाभ देने की घोषणा किया था। गौरतलब है कि 9 सितंबर 2019 को बनी मंत्रियों की एक समिति ने सरकारी दवा कंपनियों की स्थिति पर चर्चा की थी।

बता दें कि अगले वित्त वर्ष में सरकारी कंपनियों के विनिवेश से 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव रखते हुये वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण में कहा था कि केंद्र सरकार ने सरकारी कंपनियों में रणनीतिक विनिवेश की मंजूरी दी है। सिर्फ चार ऐसे सेक्टर चुने गए हैं, जिनमें सरकार का दखल रहेगा, वह भी कम से कम।”

मोदी राज में रेट कंट्रोल लिस्ट से ग़ायब होती गयी आवश्यक दवाइयां

मोदी राज में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग के ‘ज़रूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची’ (NLEM)  से साल दर साल ज़रूरी दवाइयाँ ग़ायब होती गयी हैं। साल 2016 में अल्जाइमर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसे ख़तरनाक बीमारियों की दवाओं समेत केंद्र सरकार ने करीब 100 दवाओं को ज़रूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची से हटा दिया था।  

साल 2017 में जीएसटी ने संकट को और बढ़ा दिया। जीएसटी लागू होने से दवाओं की कीमतों में 12 से 18 फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई जबकि स्वास्थ्य बजट जहां का तहां रहा।

नवंबर 2019 में मोदी सरकार द्वारा NLEM  में बदलाव करते हुये कथित ‘गैर ज़रूरी दवाओं’ को सूची से बाहर कर दिया गया। हालाकि WHO की सूची में सामिल एंटीबॉयोटिक को सूची में शामिल करके विरोधियों को खुश होने वाला झुनझुना दे दिया गया था। जबकि ज़रूरी दवा की लिस्ट में शामिल पांच रुपये प्रति डोज तक की दवा को इससे हटा दिया गया था।

अक्टूबर 2017 में दवाओं के मूल्य निर्धारण के तरीके में किया गया बदलाव

साल 2017 में केंद्र सरकार ने – “वर्तमान मूल्य निर्धारण के तरीके की वजह से नई दवा को बाजार में उतारने में काफी देरी होती है” और “केंद्र सरकार गरीबों और जरूरतमंद लोगों तक आवश्यक दवाइयों की पहुंच और उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ दवा उद्योग के विकास के लिए नवाचार और स्पर्धा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से दवा मूल्य नियंत्रण आदेश-2013 (डीपीसीओ) में संशोधन किया था। और इसकी सफाई में मंत्रालय ने कहा था कि मूल्य नियंत्रण को कठोर बनाने संबंधी धारणा भ्रामक और अनुचित है। डीपीसीओ के प्रावधानों के तहत केवल उन दवाओं की कीमतें तय हैं, जो आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल हैं। इन दवाओं की संख्या बाजार में उपलब्ध छह हजार दवाओं में से लगभग 850 है। मूल्य आधार पर इनकी संख्या कुल दवा बाजार का लगभग 17 प्रतिशत है।

इससे पहले 27 दिसंबर 2015 देश भर के सरकारी अस्पतालों में पुरानी दवाओं को हटाकर नई दवाओं से मरीजों का इलाज़ करने की अधिसूचना जारी की गयी थी।

दिसंबर 2019 में आर.सी. लिस्ट में शामिल 12 आवश्यक दवाओं के रेट में 50 प्रतिशत बढ़ोत्तरी

दिसंबर 2019 में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा 12 आवश्यक दवाओं की कीमतों में 50 प्रतिशत की वृद्धि किया गया था। ऐसा पहली बार हुआ था कि दवाओं की कीमतों में नियंत्रण के लिये जानी जाने वाली NPPA द्वारा पहली बार आवश्यक दवाओं की कीमतों में वृद्धि किया गया था।

बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आवश्यक दवा उन दवाओं को कहा जाता है जो लोगों की प्राथमिक स्वास्थ्य आवश्यकतों की पूर्ति करती हैं तथा लोगों के स्वास्थ्य के लिये इन दवाओं का पर्याप्त मात्रा में मौजूद होना आवश्यक है। गौरतलब है कि ये दवाएँ पहली पंक्ति के उपचार के तौर पर प्रयोग की जाती हैं तथा देश के स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिये अतिमहत्त्वपूर्ण हैं। कीमतों में वृद्धि के निर्णय के बाद टी.बी. के इलाज के लिये बी.सी.जी. वैक्सीन, विटामिन C, एंटीबायोटिक दवा मेट्रोनिडाज़ोल तथा बेंजाइलपेनिसिलिन, मलेरिया के उपचार की दवा क्लोरोक्वीन और लेप्रोसी की दवा डेस्पोन आदि के दाम बढ़ गये थे।

दरअसल उस समय इन दवाओं की सही कीमत न मिल पाने की वजह से निर्माता कंपनियों ने इनका उत्पादन करने से मना कर दिया था। NPPA के अनुसार, ड्रग्स मूल्य नियंत्रण आदेश के पैरा-19 के तहत पिछले दो वर्षों से कंपनियों की तरफ से दवाओं के मूल्य में वृद्धि हेतु प्रार्थना-पत्र भेजे जा रहे थे। इन दवाओं की निर्माता कंपनियों ने कहा था कि दवा बाज़ार में सक्रिय दवा सामग्री (Active Pharmaceutical Ingredient) की बढ़ती कीमतों, लागत मूल्य तथा विनिमय दर में वृद्धि की वजह से इनके उत्पादन को जारी रखना नामुमकिन है।

गौरतलब है कि भारतीय दवा कंपनियाँ दवाओं के निर्माण के लिये आवश्यक 60 प्रतिशत API के लिये चीन पर निर्भर हैं। कंपनियों के प्रार्थना पत्र मिलने के बाद NPPA ने इस मामले की पूरी जाँच के लिये एक समिति का गठन किया जिसने इन दवाओं की आवश्यकता, प्रार्थी कंपनियों का मार्केट शेयर तथा इन दवाओं के अन्य विकल्पों का अध्ययन किया। और फिर समिति की रिपोर्ट और पुनर्वीक्षण हेतु नीति आयोग की वहनीय दवाओं तथा स्वास्थ्य उत्पादों पर स्थायी समिति द्वारा 12 दवाओं की कीमतों में 50 प्रतिशत की वृद्धि के सुझाव के बाद इनकी कीमतों में 50 प्रतिशत बढ़ोत्तरी कर दी गयी थी। मूल्य वृद्धि की घोषणा करते हुये NPPA ने कहा था इन आवश्यक दवाओं की वहनीयता (Affordability) सुनिश्चित करने के लिये इनकी उपलब्धता (Access) से समझौता नहीं किया जा सकता तथा लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इनकी कीमतों में वृद्धि करना ज़रूरी है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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