Saturday, March 2, 2024
प्रदीप सिंह
प्रदीप सिंहhttps://www.janchowk.com
दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

गांधी पीस फाउंडेशन पर मोदी सरकार का पहरा, पुलिस अनुमति के बिना नहीं होगा कोई कार्यक्रम

नई दिल्ली। केंद्र सरकार संसद से लेकर सड़क तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की न सिर्फ तैयारी कर ली है बल्कि अब वह तेजी से उसके क्रियान्वयन की तरफ बढ़ रही है। तभी तो दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशन में 15 मार्च को कश्मीर से संबंधित एक कार्यक्रम को पुलिस ने रोक दिया।

देश के नागरिकों को संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार मिला है। इस अधिकार के तहत देश का कोई भी नागरिक अपने विचारों को लिख और बोलकर प्रकट कर सकता है और सेमिनार-रैलियों में भाषण कर सकता है। लेकिन अब मोदी राज में ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। जनता की मांग और आवाज को दबाने के लिए केंद्र सरकार हर कोशिश कर रही है। वह विपक्ष की हर आवाज को दबाने के लिए रोज नए-नए हथकंडे अपना रही है।

संसद में इस समय बजट सत्र का दूसरा चरण चल रहा है। कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दलों के सांसद रोज संसद परिसर में विरोध-प्रदर्शन करते हैं। सांसदों का आरोप है कि सत्तापक्ष के सांसद और मोदी के मंत्री विपक्षी सांसदों को बोलने नहीं देते हैं। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति सत्ता के इशारे पर विपक्षी सांसदों की आवाज को दबा रहे हैं। बात सिर्फ विपक्षी सांसदों तक ही सीमित नहीं है, अब सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों या जन-मुद्दों पर होने वाले सभा-सेमिनार को भी ‘कानून और व्यवस्था’ बनाए रखने के नाम पर रद्द किया जाने लगा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 15 मार्च को दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशन में कश्मीर से संबंधित एक कार्यक्रम को दिल्ली पुलिस ने “कानून और व्यवस्था” की चिंताओं का हवाला देते हुए करने से मना कर दिया। और गांधी पीस फाउंडेशन को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। पुलिस यहीं तक नहीं रुकी, उसने फाउंडेशन से भविष्य में होने वाले सभी कार्यक्रमों के लिए उससे अनुमति लेने के लिए कहा है।

“राज्य दमन के खिलाफ अभियान” के बैनर तले कई संगठनों द्वारा आयोजित “मीडिया ब्लैकआउट और कश्मीर में राज्य दमन” शीर्षक से बुधवार को एक सेमिनार गांधी पीस फाउंडेशन में रखा गया था।

इस कार्यक्रम के वक्ताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण, जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हुसैन मसूदी, माकपा नेता एमवाई तारिगामी, फिल्म निर्माता संजय काक, यूनाइटेड पीस एलायंस के अध्यक्ष मीर शाहिद सलीम और वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया शामिल थे।

सूत्रों के अनुसार पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गांधी पीस फाउंडेशन को ट्रैफिक पुलिस से भी अनुमति लेने का निर्देश दिया। अधिकारी ने कहा कि “अगर मेहमानों की सूची बड़ी है, तो क्षेत्र में ट्रैफ़िक को डायवर्ट करना पड़ सकता है। इसके अलावा, यह स्थल मध्य दिल्ली में है, जहां बहुत सारी वीवीआईपी गतिविधियां होती हैं। ”

फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने कहा कि उन्हें अब तक कार्यक्रमों की मेजबानी के लिए कभी भी पुलिस की अनुमति नहीं लेनी पड़ी।

नंदिता नारायण ने कार्यक्रम को रद्द करने को “अपमानजनक” करार देते हुए कहा कि “यदि लोगों के पास निजी स्थान नहीं है तो उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने के लिए कहां जाना होगा?”   

“हमें घटना के दिन (15 मार्च) सूचित किया गया था कि इसे रद्द करना होगा,” आयोजकों ने 28 फरवरी को ही कार्यक्रम का विषय फाउंडेशन को बता दिया था।

नारायण ने कहा कि यह कार्यक्रम कोई छुपे तौर पर नहीं किया जा रहा था। वक्ताओं के बारे में पोस्टर लगाए गए थे और अधिकांश वक्ताओं की एक सार्वजनिक पहचान हैं। पुलिस से कुछ भी छुपाया नहीं गया है।

गांधी पीस फाउंडेशन के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने कहा कि “सारे देश में यही हो रहा है। अभी गांधी पीस फाउंडेशन इससे अछूता था, अब यहां भी वही कोशिश शुरू हो गई है। कार्यक्रम को रोकने के लिए पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया था और बैरिकेड्स लगाए गए थे।”

इस महीने की शुरुआत में, “वर्तमान भारत के संदर्भ में फासीवाद को समझना” नामक एक कार्यक्रम के आयोजकों को पुलिस द्वारा “कानून और व्यवस्था” की चिंताओं का हवाला देते हुए अनुमति देने से इनकार करने के बाद उच्च न्यायालय से अनुमोदन प्राप्त करना पड़ा। यह कार्यक्रम गांधी पीस फाउंडेशन से चंद कदम दूर सुरजीत भवन में किया गया था।

सुरजीत भवन, जहां फासीवाद पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था, के एक कार्यकर्ता ने कहा कि इमारत व्यावसायिक नहीं है, कार्यक्रमों की मेजबानी के लिए पुलिस की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

हालांकि, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एक वरिष्ठ प्रबंधक ने कहा कि वे हर कार्यक्रम से पहले पुलिस की अनुमति लेते हैं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सूत्रों ने कहा कि घटना के प्रकार के आधार पर पुलिस की अनुमति मांगी जाती है। “अगर यह एक निजी कार्यक्रम है, तो हम पुलिस की अनुमति नहीं लेते हैं। लेकिन अगर यह किसी ऐसे विषय पर चर्चा है जो कानून और व्यवस्था की चिंता पैदा कर सकता है, तो हम पुलिस को सतर्क करते हैं।”

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि निजी सभागारों में होने वाले कार्यक्रमों के लिए अनुमति लेनी होती है। उन्होंने कहा, “हमारे पास मुखबिरों और अन्य स्रोतों का एक नेटवर्क है, जिसके आधार पर हम तय करते हैं कि क्या कोई घटना कानून और व्यवस्था की चिंताओं को जन्म दे सकती है।”

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