Wednesday, January 19, 2022

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मोदी जी कानून वापसी तो ठीक है, 654 किसानों की मौत की कौन करेगा भरपायी?

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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भाजपा की प्रदेश सरकारें विशेषकर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार और मध्य प्रदेश की शिवराज चौहान सरकार ने एक नया चलन शुरू किया है। ये लोग आंदोलन में होने वाले नुकसान की आंदोलनकारियों से वसूली करने लगे हैं। 

सीएए विरोधी आंदोलन में योगी सरकार ने वसूली के लिये बाकायदा गलियों चौक चौबारों में पोस्टर लगवाये थे। 

वहीं आज प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी द्वारा तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा के बाद किसान आंदोलन में 700 किसानों की असमय मौत की भरपाई की मांग सरकार से उठ रही है। उनकी इस घोषणा के बाद एक साल के किसान आंदोलन में शहीद हुये किसानों को न्याय दिलाने की मांग उठ रही है। 

इलाहाबाद जिले के किसान गयादीन पटेल कहते हैं सरकार शहीद किसानों को मुआवजा दे। 50 लाख नगद और हर परिवार को एक नौकरी दे सरकार। यदि सरकार लोगों से मुआवजा वसूल सकती है तो जब सरकार की गलती के चलते 700 किसानों की जान गई है तो सरकार मुआवज़ा दे। 

संयुक्त किसान मोर्चा ने शहीद किसानों का मुद्दा उठाते हुये कहा है कि ” इस संघर्ष में क़रीब 700 किसान शहीद हुए हैं। लखीमपुर खीरी हत्याकांड समेत इन टाली जा सकने वाली मौतों के लिए केंद्र सरकार की जिद जिम्मेदार है”। 

मजदूर संगठन ‘ऐक्टू’ ने कहा है कि 800 किसानों का बलिदान, देश नहीं भूलेगा। इसके लिये सरकार जिम्मेदार है। 

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने शहीद किसानों का मुद्दा उठाते हुये कहा है कि 700 से ज़्यादा किसानों की मौत के बाद अगर ये सरकार कृषि क़ानून वापस लेती है तो इससे पता चलता है कि यह सरकार किसानों के बारे में कितना सोचती है। साल भर से जो किसान और आम जनता का नुकसान हुआ है इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शहीद किसानों को न्याय का मुद्दा उठाते हुये कहा है कि – “भाजपा बताए सैंकड़ों किसानों की मौत के दोषियों को सज़ा कब मिलेगी।”

वहीं बसपा अध्यक्ष मायावती ने केंद्र सरकार से किसान आंदोलन में शहीद हुए किसानों के परिवार को नौकरी की मांग की है। 

आम आदमी पार्टी अध्यक्ष व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नए कहा है कि 700 से ज़्यादा किसान शहीद हो गए। उनकी शहादत अमर रहेगी। आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी कि किस तरह इस देश के किसानों ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर किसानी और किसानों को बचाया था। 

बता दें कि किसान आंदोलन में अब तक कुल 654 लोगों की मौत हुयी है। यानि रोज़ाना लगभग दो मौत। आज़ादी के बाद किसी अहिंसक और लोकतांत्रिक आंदोलन में संभवतः सबसे ज़्यादा लोगों की जान गई है। इनमें सबसे ज़्यादा मौत प्रतिकूल मौसम के चलते हुयी है। अधिकांश मरने वाले किसान सीमांत किसान या खेतिहर मजदूर थे। और उन पर कर्ज़ भी था। मरने वालों में अधिकांश की उम्र 50 वर्ष के ऊपर थी लेकिन कई युवा किसान 17 से लेकर 40 वर्ष की भी मौत हुयी है। जबकि 37 लोगों ने सुसाइड किया है। कुछ किसानों की मौत एक्सीडेंट के चलते भी हुई है।   

5 अप्रैल को किसान आंदोलन में शहीद होने वाले 350 किसानों की स्मृति में संयुक्त किसान मोर्चा ने 23 राज्यों के 2000 गांवों की मिट्टी मंगवाकर शहीद स्मारक बनाया। ये दिल्ली जयपुर हाईवे के खेड़ा-शाहजहांपुर बॉर्डर पर बनाया गया। माटी सत्याग्रह यात्रा 12 मार्च को गुजरात से शुरू हुयी थी। इस स्मारक का डिजाइन अहमदाबाद के लालोंन द्वारा किया गया था।

जाहिर है देश के पांच प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र केंद्र सरकार ने कृषि क़ानून रद्द करने की घोषणा की है। लेकिन एक सवाल अब भी अनुत्तरित है कि किसान आंदोलन के एक साल में जिन 654 किसान परिवारों ने अपने परिजनों को खोया है उनकी भरपाई कौन करेगा?    

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