Tuesday, January 18, 2022

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अमिताभ ठाकुर नहीं, लोकतंत्र को कर लिया है योगी ने कैद

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एक जबरिया रिटायर्ड आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर जो एक्टिविस्ट भी हैं जिसकी पत्नी डॉ. नूतन ठाकुर मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। वह मुख्यमंत्री से चुनाव लड़ने की जुर्रत करें भला यह बात कैसे आज के समय में बर्दाश्त की जा सकती है? जहां रामराज्य हो  गोरखनाथ पीठ के मठाधीश योगी सत्तारूढ़ हों। वहां अफसर को तो सिर्फ़ आज्ञापालन की इज़ाजत होती है। अब सरकार ने जब जबरिया रिटायर किया था तो समझ लेना चाहिए था कि आगे सब गड़बड़ ही गड़बड़ है। पर लोकतंत्र की दुहाई देकर चुनाव लड़ने की ताल ठोक दी। यह तो सांप के बिल में हाथ डालना ही हुआ। अब वह सिर्फ फुफकारेगा ही नहीं बल्कि रास्ते से हटाने की कोशिश भी करेगा।

लोकतंत्र और संविधान को आज भूलने की ज़रूरत है जैसे बने काम निकालने का वक्त है। यहां सौ फीसदी अमिताभ की गलती है। अब पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पत्नी डॉ. नूतन जो योगी जी से सवाल करती रहीं हैं वह भी तो काउंट होता है। आखिरकार अर्द्धांगिनी की भी जिम्मेदारी बनती है कि पति सरकारी नौकरी में है तो कुछ तो समझदारी रखी जाए। गलती पर गलती। नारी चेतना के विरोधियों को और क्या चाहिए? पहले नज़र बंद और अब पुलिस हिरासत में। आगे क्या क्या होता है उसकी अच्छी तैयारी कर लीजिए? बात बहुत बढ़ चुकी है। यह नेक सलाह आज के बड़े बुजुर्ग देने लगे हैं।

अमिताभ की गिरफ्तारी के दृश्य जिसने भी देखें दुखित हुआ। लाख गलती पुलिस की हो पर वे मायने नहीं रखतीं। उन्हें जो आदेश होता है  उसे पूरा करना होता ही है और वे करके ही दम लेते हैं। विकास दुबे की हत्या पुलिस ने कैसे कर डाली? जबकि पत्रकार लगभग साथ-साथ चल रहे थे। इसीलिए अब किस संगीन मामले में किसे कब फंसा दिया जाए कहा नहीं जा सकता। इंदौर में चूड़ी वाले का कोई गुनाह नहीं था अब वह बलात्कार का आरोपी है। संजीव भट्ट जैसे आज्ञापालक  अधिकारी का हाल सबके सामने है।

आज उत्तर प्रदेश ही नहीं संपूर्ण देश में बहुत सी स्वतंत्रताएं स्थगित हैं सवाल करना सबसे बड़ा गुनाह है विपक्ष और चौथा खंभा जो सरकार से सवाल करने के लिए  लोकतंत्र का आधार कहा जाता है कितना सिर धुन रहा है पर कोई सुनवाई नहीं। फिर अदना से अफसर की क्या बिसात कि वह लोकतांत्रिक अधिकारों के वास्ते मुख्यमंत्री को चुनौती दे। ऐसे पीड़ित भी बड़ी संख्या में हैं। किंतु मूक हैं इससे सरकार आततताई बनती जा रही है। क्या किया जाए शांति प्रिय देश की शांत जनता सब चुप चुप देख सुन रही है।

कहते हैं, जल में रहकर मगर से बैर अच्छी नहीं होती यदि गलत हो रहा है, मन क्लांत है तो नौकरी ख़ुद छोड़िए और निस्वार्थ होकर समाज सेवा कीजिए जैसे कई अधिकारी नौकरी छोड़ ये कार्य कर रहे हैं। लोभ के वशीभूत की गई सेवा के दुष्परिणाम ठीक नहीं होते। यदि नौकरी आज के माहौल में करनी है तो जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी का सिद्धांत अपनाना होगा ।

और अगर अमिताभ ठाकुर को नेता बनना है तो जेल जाना ज़रूरी है , जेल जाने से डर कैसा? अब अंग्रेज सरकार तो है नहीं कि पढ़े लिखों के साथ अच्छा सलूक करेगी अब तो हमारी लोकतंत्र का लबादा ओढ़े फासिस्ट सरकार है तो ये सब झेलना ही होगा। यह संघर्ष आगे सुफल देगा ये विश्वास रखना होगा। देश को इस वक्त जुझारू, निर्भीक लोगों की सख़्त जरुरत है जो नया इतिहास सृजित करने का माद्दा रखते हैं। वरना इतना सामंजस्य का सबक तो सीखना ही होगा।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका हैं।)

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