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उत्तर प्रदेश: राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का ऐसा दुरुपयोग कभी नहीं हुआ!

उत्तर प्रदेश में तमाम तरह के संगीन अपराधों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी के बावजूद सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर दावा करते रहते हैं कि उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त कर दिया है और अब अपराधियों की जगह या तो जेल में है या फिर वे उत्तर प्रदेश छोड़ कर जा चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी ऐसा ही मानना है और वे इसके लिए अक्सर योगी आदित्यनाथ की पीठ ठोंकते हुए उन्हें यशस्वी मुख्यमंत्री का संबोधन देते हैं। योगी आदित्यनाथ यही दावा इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए भी कर रहे हैं और कह रहे हैं कि अगर भाजपा यहां सत्ता में आई तो पश्चिम बंगाल को भी उत्तर प्रदेश जैसा बना दिया जाएगा।

लेकिन अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजपूर्ण रिपोर्ट न सिर्फ योगी आदित्यनाथ के दावे की पोल खोलती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि उनकी सरकार और सूबे की पुलिस अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर आम लोगों के साथ खुद अपराधियों जैसा बर्ताव कर रही है। सूबे में एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का बेतहाशा दुरुपयोग कर बेकसूर लोगों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाला जा रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह बात भी निकलकर सामने आई है कि पिछले तीन साल के दौरान योगी आदित्यनाथ की सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ बड़ी संख्या में एनएसए का इस्तेमाल किया, जिनमें से अधिकतर मामलों में हाई कोर्ट ने मामले खारिज करते हुए आरोपी बनाए गए लोगों को रिहा किया है और सरकार तथा पुलिस के रवैये को फटकार के लायक पाया है।

एनएसए एक ऐसा सख्त कानून है जो सरकार को बिना किसी आरोप या मुकदमे के लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डालने का अधिकार देता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में इसका इस्तेमाल विवादास्पद नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, गौ हत्या के कथित आरोपियों और सामान्य कानून-व्यवस्था के मामलों से जुड़े लोगों के खिलाफ किया गया है और अभी भी किया जा रहा है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में अदालत ने कहा कि सरकार ने ‘बिना सोचे-समझे’ एनएसए लगाया है। यही नहीं, कई अलग-अलग मामलों में एफआईआर की भाषा भी ऐसी पाई गई है, जैसे कॉपी-पेस्ट की गई हो।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एनएसए के ऐसे 120 मामलों में दायर हैबियस कार्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर 94 मामलों को खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इन खारिज मामलों के आरोपियों को रिहा करने का आदेश देते हुए ऐसे मामले तैयार करने वाली पुलिस और उन जिला मजिस्ट्रेटों को भी खूब सुनाई है जिन्होंने ऐसे मामलों को मंजूरी दी। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि जिला मजिस्ट्रेटों ने ऐसे मामलों को मंजूरी देने में अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया है। अदालत ने यह खुले तौर पर पाया और कहा है कि सरकार ने आरोपियों के मामलों की सुनवाई में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ताकि वे जेलों में सड़ते रहें, जबकि इनके खिलाफ कार्रवाई करने में अफसरों ने असामान्य जल्दबाजी दिखाई थी। एनएसए के मामलों की समीक्षा के लिए बने सलाहकार बोर्ड के सामने भी इन मामलों को नहीं रखा गया।

चौंकाने वाले तथ्य इतने ही नहीं हैं। जितने भी मामले आए उनमें से सबसे ज्यादा 41 लोगों पर एनएसए गौ हत्या से जुड़े मामलों में लगाया गया। सभी आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। अखबार की रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 30 मामलों में अदालत ने एनएसए लगाए जाने की आलोचना की और आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। बाकी के 11 मामलों में से एक को छोड़कर अन्य सभी मामलों में अदालत ने यह कहते हुए उन्हें जमानत दे दी कि न्यायिक हिरासत की जरूरत ही नहीं है।

अखबार ने अदालत के दिए गए फैसलों का विश्लेषण कर निष्कर्ष निकाला है। इसके अनुसार 11 से अधिक गिरफ्तारियों में अदालत ने आदेश पारित करते समय कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने ‘बिना सोचे-समझे’ कार्रवाई की। हिरासत के 13 मामलों में अदालत ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को एनएसए को चुनौती देने और प्रभावी ढंग से ख़ुद का प्रतिनिधित्व करने के अवसर से वंचित किया गया था। इसके अलावा हिरासत के सात मामलों में अदालत ने कहा कि ये मामले ‘क़ानून और व्यवस्था’ के दायरे में आते हैं और इनमें एनएसए लागू करने की कोई जरूरत नहीं थी।

तीन साल के दौरान बनाए गए ऐसे सभी मामलों की अलग-अलग चर्चा तो यहां करना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस पूरे दौर में उत्तरप्रदेश से आने वाली खबरों से यह साफ दिखता ही था कि वहां सरकार, प्रशासनिक अफसरों और पुलिस का रवैया किस कदर सांप्रदायिक हो चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसा कि इसके नाम से ही जाहिर है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा होने पर इस्तेमाल के लिए यह कानून बनाया गया है। लेकिन देश भर में कई राज्य सरकारों और पुलिस ने इस कानून का मनमाना बेजा इस्तेमाल किया है।

जब सत्ता और पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी में साम्प्रदायिकता और जुड़ जाती है तो वह अल्पसंख्यकों को इस देश का नागरिक भी महसूस नहीं होने देती। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें दस-बीस सालों से जेलों में बंद बेकसूर मुस्लिमों को अदालत ने बाइज्जत बरी किया है। यह एक अलग बात है कि इस दौरान इनके परिवार तबाह हो चुके होते हैं और एक पूरी पीढ़ी उनके बिना या तो जवान हो चुकी होती है या मर चुकी रहती है। देश में सरकार के साम्प्रदायिक रूख के मामले में उत्तर प्रदेश पिछले चार वर्षों से अव्वल बना हुआ है। वहां जानवरों की तस्करी करने, गौवंश को मारने, गोमांस खाने जैसे आरोप लगाकर किसी की भी मॉब लिंचिंग की जा सकती है और कानूनी कार्रवाई तो की ही जा सकती है, फिर चाहे उस कार्रवाई का हश्र वही हो जो कि अभी करीब 94 मामलों का हाई कोर्ट पहुंचने पर हुआ है।

उत्तर प्रदेश में एनएसए के दुरुपयोग पर अदालत के फैसले देश में व्यापक स्तर पर पुलिस सुधार की दरकार को रेखांकित करते हैं। देश के विभिन्न राज्यों की पुलिस और दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य में केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली पुलिस को जब तक उसकी ऐसी आपराधिक साजिशों के लिए के लिए सजा देना शुरू नहीं होगा, तब तक हालात सुधरने वाले नहीं हैं। राज्यों की सरकारों ओर वहां की पुलिस बीच आपराधिक गिरोह से भी अधिक मजबूत भागीदारी बन जाती है और दोनों ही पक्ष सत्ता और कानून का बेजा इस्तेमाल करते हुए कमाई करने में जाते हैं।

पुलिस और राजनीति की यह माफिया भागीदारी किसी भी लोकतांत्रिक मान्यता या सिद्धांत से अछूती रहती है। यह हैरानी की बात है कि राजनीति और पुलिस की इस आपराधिक साझेदारी का देश के विभिन्न हाई कोर्ट तो आमतौर पर संज्ञान लेते रहते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से सुप्रीम कोर्ट इस मामले में उदासीन बना हुआ है।

उत्तरप्रदेश में एनएसए के दुरुपयोग की यह मिसाल तो वहां की सरकार और पुलिस के सांप्रदायिक और आपराधिक चरित्र को उजागर करती ही है, लेकिन देश के बाकी प्रदेशों को भी यह सोचना चाहिए कि पुलिस का बेजा इस्तेमाल सत्ता के लिए सहूलियत का तो हो सकता है, लेकिन वह अपने प्रदेश के भीतर ही कई किस्म की नाइंसाफी की खाइयां भी खोद देता है। केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने पिछले कुछ सालों के दौरान जेएनयू और जामिया से लेकर शाहीन बाग तक और दूसरे कई आंदोलनों में तथा कोरोना काल में तब्लीगी जमात के लोगों को कोरोना फैलाने का जिम्मेदार ठहराने के मामले में भी केंद्र सरकार की कठपुतली बनकर कार्रवाई की है।

यही नहीं इन सारे मौकों पर पुलिस की सांप्रदायिक और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान की एक सभा में सार्वजनिक तौर पर बचाव किया और पुलिस को शाबासी दी। यह और बात है कि बाद में दिल्ली पुलिस को इन मामलों में अदालतों की फटकार सुननी पड़ी और नीचा देखना पड़ा। इसके बावजूद न तो दिल्ली पुलिस के और न ही देश के किसी अन्य राज्य की पुलिस के रवैये में कोई सुधार हुआ। यह सिलसिला लोकतंत्र के भीतर पुलिस को वर्दीधारी गुंडा बनाने वाला है।

आज से करीब छह दशक पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के ही न्यायाधीश आनंद नारायण ने अपने एक फैसले में लिखा था कि भारतीय पुलिस अपराधियों का एक संगठित गिरोह है। तब से अब तक कई दलों और गठबंधनों की सरकारें उत्तरप्रदेश में आती-जाती रही हैं, लेकिन एक बार मुजरिम बन चुकी पुलिस वक्त के साथ-साथ और खूंखार मुजरिम ही बनती चली जा रही है, चाहे वह उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक पुलिस हो, चाहे वह छत्तीसगढ़ के बस्तर की मानवाधिकार कुचलने वाली पुलिस हो या किसी और राज्य में फर्जी मुठभेड़ में किसी को भी मार देने वाली पुलिस।

अगर इस देश में पुलिस के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने का संवैधानिक समाधान नहीं निकाला जाएगा, तो देश को पूरी तरह पुलिस स्टेट में तब्दील होने से नहीं रोका जा सकेगा और इंसाफ के सिलसिले की इस पहली कड़ी पर लोगों का जरा भी भरोसा नहीं रह जाएगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 9, 2021 6:14 pm

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