हमारे बाप दादा पुश्तैनी जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए लड़े थे! हम भी लड़ेंगे: बोध घाट परियोजना से प्रभावित एक आदिवासी

बस्तर। पिछले चार दशक से बंद पड़ी बोध घाट परियोजना का जिन्न फिर से बाहर निकल आया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के द्वारा विधानसभा में राज्य के सालाना बजट में बोधघाट परियोजना को शुरू किए जाने का प्रस्ताव पेश कर दिया गया है। सरकार इस बार बोधघाट परियोजना को पन बिजली उत्पादन के साथ ही सिंचाई सुविधा के नजरिए से भी काफी उपयोगी मान रही है। 

बोधघाट परियोजना के फिर से शुरू होने की खबरों के बीच प्रभावित गांवों में हलचल शुरू हो गयी है। जनचौक संवाददाता ने बोध घाट परियोजना के पूर्ण डुबान ग्राम एरपुंड का दौरा किया। वहां पहुंचने पर सरपंच पति केदारनाथ राणा ने बताया कि “हमें बोधघाट परियोजना के दोबारा शुरू होने की सूचना अखबारों के माध्यम से पता चली। मेरे बाप-दादा इस परियोजना के विरोध में लंबी लड़ाई लड़े हैं, भोपाल तक अपना विरोध जताए थे तब ये परियोजना बन्द हुई थी। अब फिर शुरू हो रही है। हमारे बाप दादा हमारे पुश्तैनी जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए लड़े थे। हम भी लड़ेंगे जब तक आखरी सांस है। एक इंच जमीन नही देंगे। न यहां से हटेंगे”। 

आदिवासी महिला आसमती राणा कहती हैं, “यहीं जंगल में पैदा हुए हैं यहीं से चार, तेंदू, महुआ, बास्ता लेकर आते हैं। कैसे हम अपनी जमीन और जंगल छोड़ेंगे और बात की बात जमीन ले भी लिए तो जंगल कहा से देंगे।” 

एरपुंड के ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव में हमारे पूर्वज देवी देवता हैं। हमको हटाएंगे, जमीन लेंगे दूसरी जगह देंगे। हमारे देवी-देवताओं को कहां से देंगे? जिस बोधघाट पनबिजली परियोजना से तीन लाख, 66 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का सपना देश को दिखाया जा रहा है उसमें से ज्यादातर भूभाग पर तो हरे-भरे जंगल, लहलहाते इमली, साल, सागौन, बीजा, साजा, आंवला, हरड़, बहेड़ा, सल्फी, महुआ, मैदा छाल आदि दुर्लभ प्रजातियों के बेशकीमती प्राकृतिक पेड़, लताएं, कंद-मूल, जड़ी-बूटियां और उनके बीच पीढ़ियों से बसे उनके रक्षक आदिवासियों के गांव हैं।

कोविड-19 के चलते नहीं हो पा रहा है बोधघाट परियोजना के विरोध में आंदोलन

सरपंच बसंती राणा ने बताया कि “17 पंचायतों के सरपंचों की एक बैठक हो चुकी है। इन पंचायतों के आश्रित गांवों में भी ग्रामीणों की अलग-अलग बैठक हो गयी है। लेकिन हम बाहर निकल कर विरोध नहीं जता पा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के चलते हम सब सावधानी बरत रहे हैं। इसीलिए अभी तक आंदोलन नहीं किए हैं”। बसंती आगे कहती हैं, “लाखों की संख्या में हम संभाग, जिला मुख्यालय पहुंच कर इसका विरोध करेंगे। क्षेत्र में काइयों को लालच दे कर सरकार उन्हें हम से बात करने के लिए भेज रही है।” 

ग्रामीणों का आरोप है कि चार दशक से बंद पड़ी परियोजना को अचानक क्यो कोरेना के समय बनाने की बात कही जा रही है? इससे किसी का फायदा नहीं है बस्तर का पूरा क्षेत्र विनष्ट हो जाएगा।

द वायर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बोध घाट के बनने से उन क्षेत्रों के न सिर्फ आदिवासी बल्कि उनके पेन गुड़ियों का भी विस्थापन होगा। पेन गुड़ी आदिवासी संस्कृति के केंद्र होते हैं। उनके पेन गुड़ी को विस्थापित कर आदिवासी संस्कृति को नष्ट करने की साजिश की जा रही है। बोध घाट के तहत लगभग 13000 हेक्टेयर की ज़मीन पानी में डूब जाएगी, 5010 हेक्टेयर भूमि ऐसी है जिस पर कृषि होती है। 30 गांव पूरी तरह से डूब जाएंगे और 2 लाख आदिवासी फिर से नई जगह जाने के लिए मजबूर हो जाएंगे। आदिवासियों के लिए ज़मीन बहुत अहम होती है। उनकी रीति नीति उसी ज़मीन से जुड़ी होती है ।

बता दें कि बोध घाट परियोजना दन्तेवाड़ा जिले के विकास खण्ड एवं तहसील गीदम के ग्राम बारसूर से लगभग 8 किलोमीटर तथा जगदलपुर शहर से लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर प्रस्तावित है। इस परियोजना के लिए 1979 में पर्यावरण स्वीकृति मिली थी। वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के उपरांत 1985 में फिर से पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त हुई। विभाग द्वारा प्रभावित वनभूमि के बदले 8419 हेक्टेयर भूमि में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण किया गया था, जिसके आधार पर वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के उपरांत पुनः वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 5704.332 हेक्टेयर भूमि के लिए 5 फरवरी 2004 को सैद्धांतिक सहमति प्रदान की गई।

योजना का सर्वेक्षण, अनुसंधान एवं विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार कर भारत शासन के विभिन्न मंत्रालयों से स्वीकृति प्राप्त किए जाने का कार्य भारत शासन के मिनीरत्न उपक्रम मेसर्स वाप्कोस लिमिटेड को सौंपा गया है। पोलावरम् परियोजना एवं बोधघाट परियोजना एक साथ प्रारंभ हुई थी परन्तु पोलावरम् परियोजना का निर्माण कार्य 70 प्रतिशत से अधिक संपन्न हो गया है जबकि बोधघाट परियोजना का अभी कार्य भी शुरू नहीं हो सका है।

बोधघाट परियोजना को लेकर सीएम भूपेश बघेल ने बस्तर के सांसद, विधायक सहित जन प्रतिनिधियों की एक बड़ी बैठक की थी। इसमें बस्तर के सभी नेताओं ने परियोजना के निर्माण पर अपनी सहमति दी है। 

लेकिन अब इस परियोजना को लेकर विरोध शुरू हो गया है। बस्तर संभाग सर्व आदिवासी समाज ने बस्तर के सारे नेताओं को सामाजिक बैठक में उपस्थित होकर जवाब देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन बैठक में कुछ नेताओं को छोड़ कर कोई उपस्थित नहीं हुआ।

बस्तर संभाग सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने बताया कि बोधघाट परियोजना के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा करने के लिए बस्तर संभाग के जन प्रतिनिधियों के साथ समाज की बैठक बुलायी गयी थी। बोधघाट परियोजना वास्तव में बस्तर के हित में है या नहीं इसकी जानकारी जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्राप्त करना था। लेकिन इस बैठक में विधायकों की अनुपस्थिति से यह जाहिर होता है कि इस परियोजना के नाम पर कुछ न कुछ अहित की भावना जरूर छुपी हुई है। इसीलिए जनप्रतिनिधि इस बैठक से दूरी बना रहे हैं।

जानकारी के अनुसार 42 ग्राम पंचायत व 14 हजार हेक्टेयर जमीन डुबान इलाके के अंतर्गत आ रही है। वहीं 5 हजार हेक्टयर वन भूमि है। जिसके चलते वन्य जीव व हजारों लोगों के समाने विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। वहीं पिछले केंद्रीय विभागों के शोध रिपोर्ट में वन्य जीव ,आदिवासी जीवन शैली व बांध से उत्पन्न बिजली की बड़ी लागत दर पर भी विभिन्न आपत्तियों व मत दर्ज किए गए थे।

(बोधघाट परियोजना के तहत पूर्ण डुबान प्रभावित गांव एरपुंड से लौटकर  जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा।)

This post was last modified on July 23, 2020 1:11 pm

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