Sunday, November 28, 2021

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कोई छोटी भूल भी पूरे किसान आंदोलन पर पड़ सकती है भारी

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किसान आन्दोलन जो पिछले 80 दिनों से दिल्ली के चारों तरफ सीमाओं पर चल रहा है। सभी सीमाओं पर लाखों किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉली के साथ अस्थाई रहने का ठिकाना बना कर सत्ता के जनविरोधी काले कानूनों के खिलाफ आन्दोलन चलाये हुए हैं। इस आन्दोलन में मुल्क के प्रत्येक राज्य से कम या ज्यादा किसान पहुंचे हुए हैं। लेकिन बहुमत किसान पंजाब से आये हुए हैं। इसके बाद हरियाणा, उतर प्रदेश व राजस्थान से किसान आन्दोलन में शामिल हैं। किसानों के साथ ही मजदूर भी आन्दोलन का हिस्सा बने हुए हैं। महिला किसानों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। 

ये किसान आन्दोलन शांतिपूर्ण तरीके से निरंतर जारी है। किसान नेताओं और तानाशाही सत्ता के बीच 11 दौर की वार्ता अब तक हो चुकी है। जिसका फाइनल रिजल्ट ये निकल कर आया कि सरकार किसानों का जान बूझ कर समय बर्बाद कर रही थी ताकि किसान थक कर वापस चले जाएं। लेकिन किसानों ने अपना धैर्य नहीं खोया। इन 80 दिनों में किसानों ने पूरे मुल्क में इस आन्दोलन को फैलाने का काम किया। हरियाणा और पंजाब में तो गांव-गांव में आन्दोलन अपने पांव पसार चुका है। हरियाणा के लगभग सभी गांव से किसानों ने अपनी मजबूत भागीदारी इस आन्दोलन में सुनिश्चित की है। मुख्यमंत्री का कार्यक्रम उसके जिले में न होने देना किसानों की एकता और उनके गुस्से को दिखाता है। घमंड से भरे गृह मंत्री अमित शाह को किसानों के इसी गुस्से को देखते हुए अपने विधायकों, सांसदों को हिदायत देनी पड़ी कि कोई भी अपने हल्के के सार्वजनिक कार्यक्रम में न जाये। 

ये किसान आन्दोलन जिसमें छोटे-बड़े 400 किसान-मजदूर संगठन एकजुट हैं। उनकी 40 सदस्यीय कमेटी का मजबूत तालमेल के कारण ही आन्दोलन अब तक सही तरीके से जारी है। 

किसान मोर्चे की तरफ से 26 जनवरी गणतन्त्र दिवस पर दिल्ली में किसान परेड के एलान के बाद से तो हरियाणा के प्रत्येक गांव में किसानों व मजदूरों ने परेड की तैयारी युद्ध स्तर पर की, गांव-गांव में किसान संगठनों व खाप पंचायतों द्वारा प्रचार अभियान चलाया गया। 

इन्हीं तैयारियों के चलते दिल्ली आने वाले सभी रास्तों पर 20 तारीख से 26 तारीख तक किसान झंडा व राष्ट्रीय झंडा लगे वाहनों की कतारें देखी जा सकती थीं। जगह-जगह सभी रास्तों पर आंदोलनकारी किसानों के सड़क के आस-पास गांव के किसानों ने लंगर व ठहरने का प्रबन्ध रखा था। 

26 तारीख को दिल्ली में किसान आन्दोलन ने अपनी ऐतिहासिक परेड की शुरुआत अलग-अलग सीमाओं से शुरू की, इस किसान परेड में 20 लाख के आस-पास किसान शामिल होने का अनुमान है। 

भारतीय सत्ता का दमनकारी चरित्र

भारतीय सत्ता भी किसान आन्दोलन को कुचलने के लिए पूरी तैयारी कर चुकी थी। सत्ता ने पूरी योजना के तहत जो वो पहले के आन्दोलनों में भी करती आई है। सत्ता समर्थक कुछ छद्म किसान दीप सिद्धू जैसे शुरू से ही इस आन्दोलन में शामिल हैं। सत्ता ने ऐसे किसानों द्वारा लाल किले वाला पूरा खेल रचा। उसके बाद से पूरे मुल्क में सत्ता के साथी गोदी मीडिया ने किसान आन्दोलन व किसान नेताओं को बदनाम किया गया। 

फ़ासीवादी सत्ता एक बार फिर से आन्दोलन को कुचलने के पुराने हथकंडे अपनाने के लिए तैयार थी। 28 तारीख की शाम को गाजीपुर बॉर्डर की लाइट, पानी सप्लाई बंद कर दी गयी। पुलिस किसान नेता राकेश टिकैत को गिरफ्तार करने पहुंच गई पुलिस के साथ में भाजपा के 2 विधायक अपने सैकड़ों गुंडों के साथ किसानों पर हमला करने पहुंच गए। 

राकेश टिकैत कभी जो भाजपा के ही नजदीक रहे हैं। आज वही भाजपा राकेश टिकैत को मारने पर उतारू थी। सत्ता की इस गुंडागर्दी को देख किसान नेता राकेश का दिल भर आया। आंखों से आंसू निकल गए। सत्ता की इस गुंडागर्दी को सोशल मीडिया के माध्यम से मुल्क का आवाम लाइव देख रहा था। इस दमन के खिलाफ हरियाणा के अनेकों गांव से नौजवान रात को ही गाजीपुर बॉर्डर की तरफ कूच कर गए। अगले दिन जैसे-जैसे सूरज आसमान की तरफ बढ़ा वैसे-वैसे गाजीपुर बॉर्डर पर भीड़ बढ़ती चली गयी। उसी दिन सत्ता के गुंडों ने सिंधु बॉर्डर पर भी उत्पात मचाया। 

उसके बाद से आन्दोलन ने संख्या बल में गुणात्मक परिवर्तन आया। हरियाणा, उतर प्रदेश और राजस्थान में अलग-अलग जगह पर रैलियां हुई जिनमें किसानों-मजदूरों की तादाद लाखों में थी। 6 तारीख का पूरे मुल्क में 12 से 3 चक्का जाम सफल रहा है। ऐतिहासिक किसान आन्दोलन मजबूती से अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहा है। 

लेकिन क्या फासीवादी सत्ता व उसकी पीठ के पीछे मजबूती से खड़ा कार्पोरेट चुप-चाप तमाशा देख रहा है? 

राकेश टिकैत जो किसान नेता कम जाट नेता ज्यादा व भाजपा के करीबी रहे हैं। क्या वो ईमानदारी से किसान आन्दोलन को मंजिल तक ले जाएंगे? 

हरियाणा व उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन में बहुमत जाट जाति के किसानों का है। उन सभी ने टिकैत को अपना नेता मान लिया है इसलिए अब टिकैत के लिए भी ये आन्दोलन एक तरह की अग्नि परीक्षा है। टिकैत किसानों की जन भावना पर मजबूती से रहते हुए आन्दोलन को मंजिल तक ले जाते हैं या नाव को किनारे पर ले जाकर डुबो देते हैं। 

हमारा दुश्मन भी आन्दोलन को तोड़ने के लिए नित नई-नई चालें चल रहा है। 

आन्दोलन के पक्ष में अंतर्राष्ट्रीय सेलिब्रिटीज ने अपनी आवाज बुलन्द की तो इसके विपरीत सत्ता ने सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर, अजय देवगन, अक्षय कुमार जैसे सेलिब्रिटी जो कार्पोरेट के गुलाम ही हैं, को मैदान में किसानों के खिलाफ उतार दिया। 

संसद में प्रधान मंत्री का भाषण जिसमें किसान आंदोलन को बड़े किसान बनाम छोटे किसान में बांटने की कोशिश की गई। 

आन्दोलन को वैचारिक तौर पर मजबूती देने व सही दिशा में ले जाने वाले तबके को हुक्मरान द्वारा आन्दोलनजीवी कहना आन्दोलन को सत्ता द्वारा तोड़ने की कोशिश का ही हिस्सा है। 

हुक्मरान द्वारा संसद में आन्दोलन के अगुआ दस्ते को खालिस्तानी, माओवादी, पाकिस्तानी समर्थक कहना, बॉर्डर पर कीले लगवाना, गोदी मीडिया का आन्दोलन के खिलाफ दिन-रात झूठा प्रचार ये सब सत्ता की सोची समझी साजिश ही है। 

किसान आन्दोलन जितना मजबूत हो रहा है उतना ही किसानों को होशियार होते जाना होगा। हरियाणा में बड़ी-बड़ी रैलियां किसानों की हो रही हैं। 

लेकिन इन सभी रैलियों में पंजाब के किसान नेताओं को न बुलाना या गैर जाट नेताओं को न बुलाना बड़ी भूल की तरफ बढ़ना है। पंजाब का किसान आन्दोलन जो संगठित आन्दोलन है। 

इसके विपरीत हरियाणा का आन्दोलन संगठित होने की तरफ बढ़ रहा है। पंजाब के किसान आन्दोलन को जातियों में बांटना बहुत मुश्किल है। लेकिन हरियाणा के आन्दोलन को सत्ता जाट व गैर जाट में बांटने की शुरू दिन से कोशिशें कर रही है। शुरू में ये बंटवारा साफ दिख भी रहा था लेकिन हरियाणा के किसानों की मेहनत से इस जातीय बंटवारे की खाई को कम किया गया है। 28 तारीख के बाद हरियाणा में आन्दोलन ने गुणात्मक बढ़ोत्तरी ज़रूर की है। उसके बाद भी ये जातीय बंटवारे वाला खतरा बना हुआ है। 

इसलिए हरियाणा के किसान व किसान नेताओं व खापों द्वारा जहां भी बड़ी रैली जन सभा की जाए वहाँ गैर जाट किसान नेताओं, पंजाब के किसान नेताओं को जरूर शामिल किया जाए। दूसरा सबसे जरूरी काम जो करना चाहिए वो किसान आन्दोलन को व्यक्ति पूजा से दूर रखा जाना चाहिए। 

(उदय चे स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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