विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस बनाम नफरत की निर्मिति

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14 अगस्त की सुबह 10 बजे के लगभग हमारे अति संवेदनशील प्रधानमंत्री जी को अचानक इलहाम हुआ कि वे अनायास 1947 में हुए विस्थापन की विभीषिका में डूबने उतराने लगे और इसी वक्त उन्होंने ट्वीट कर इसे विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की अपील देशवासियों से कर डाली। उन्होंने लिखा कि देश के बंटवारे के इस दर्द को भुलाया नहीं सकता। नफरत और हिंसा के कारण लाखों भाई बहनों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान भी गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने का निर्णय लिया है।

पिछले सात साल से साहिब केंद्रीय सत्ता पर काबिज हैं लेकिन आज उनकी स्मृति में यह बात क्यों आई यह खोज का विषय हो सकता है उनके राज में कोरोना की वजह से लोगों ने आज़ाद भारत में अपनी, अच्छे दिन वाली सरकार के काल में जो विस्थापन की गहन विभीषिका झेली, साथ ही साथ दूसरी लहर में लाखों की मौत का जो तांडव देखा। वह विभाजन के दौरान हुई त्रासदी से कई गुना ज्यादा था। तब सिंधु, झेलम, सतलज, चिनाब नदियों ने लाशें नहीं उगलीं जैसा गंगा जैसी पूजनीय नदी का हाल रहा कि उसे शव वाहिनी गंगा का खिताब मिला। उन अपने नागरिकों के लिए संवेदनशीलता आज तक नहीं दिखाई दी ना ही उन्हें श्रद्धांजलि स्वरुप मुखारबिंद से दो शब्द निकले। गड़े मुर्दे उखाड़ कर दुखती रग पर हाथ रखना उन्हें अच्छा लगा जब लोग आज़ादी के जश्न की तैयारी में मशगूल थे।

इसीलिए एक बात तो ज़ाहिर है कि यह हिंदुओं और मुस्लिम समाज में सिर्फ और सिर्फ नफरत बांटने का उपक्रम है जिसका उपयोग वे उस महान अवसर पर कर रहे हैं जब देश आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह संघ का ही गुप्त एजेंडा है जो उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए ही है गुजरात नरसंहार की तरह यहां कुछ हो जाए तो बात बन जाए। दिल्ली के बाद, कानपुर और अब आगरा में करीना को जिस तरह धमकी दी जा रही है उसमें जो लोग हैं वे संघ के थैले के चट्टे बट्टे हैं। साहिब की यह सोच भी उस तरह की घटनाओं को बढ़ावा देने वाली है। विभाजन के वक्त की नफरत और हिंसा का बदला लेने की 75साल बाद ये निंदनीय कोशिश है। इसका पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।

अफ़सोसनाक तो ये है कि संघ और भाजपा जो कहती हैं ठीक उसके उलट काम करती हैं। आपको शायद याद हो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अभी कुछ दिनों पहले ही कहा था कि मुस्लिमों और हिंदुओं का डीएनए एक है तब लगा था शायद अब सब ठीक हो जाएगा पर अब जो सामने है वही सच है। क्योंकि कानपुर के बजरंगियों को जिस तरह जमानत मिल जाती है और आगरा में खुले आम धमकी देने वाले को पुलिस पकड़ती नहीं तो क्या समझा जाए। वैसे साहिब ने भी जब जब जो कहा है उसके विपरीत ही हुआ है। 15 लाख मिलेंगे लोग नोटबंदी में लुट गए, दो करोड़ रोजगार की जगह सरकारी संस्थान बिक गए, बुलेट ट्रेन की जगह टे्नें ही कम हो गईं वगैरह वगैरह।

कुल मिलाकर यह देश को गृह युद्ध में झोंकने की तैयारी ही लगती है, क्योंकि वे विभाजन की विभीषिका की स्मृति में नफरत और हिंसा की याद कर लोगों को उत्तेजित करने का अवसर देने की सरेआम कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, दूसरा पक्ष सजग है वह इन साजिशों को बखूबी समझ रहा है। उम्मीद है आज़ादी का यह पर्व भारत की जनता को हमेशा की एकता-अखंडता के पावन सूत्र में बांधे रखेगा नफरतियों को मुंह की खानी पड़ेगी। जयहिंद।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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