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सरकारी खर्चे पूरा करने के लिए लगातार बढ़ाए जा रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम

कोई माने या न माने पर एक जागरूक नागरिक और पत्रकार होने के नाते मेरा मानना यही है कि मोदी सरकार गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है और सरकारी खर्चे का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाए गए टैक्स से मिलने वाली धनराशि पर निर्भर है। आज देश में पेट्रोल की जितनी कीमत है, उससे लगभग दो गुना ज़्यादा टैक्स यानि उससे 65 फीसद ज्यादा कीमत सरकार वसूल रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत गिर रही है, पर भारत में डीज़ल-पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इस पर टैक्स की लगातार बढ़ोत्तरी है और जिससे सरकारें अपने घाटे की भरपाई कर रही है। शनिवार को पेट्रोल की कीमत दिल्ली में 87.50 रुपये और मुंबई में 92.28 रुपये थी। इस दिन डीज़ल की कीमत दिल्ली में 75.88 रुपये और मुंबई में 82.66 रुपये है।

इसे क्या कहा जाएगा कि भारत में पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें ऐसे समय में रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं, जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें कम हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के एक साल पहले यानी 2012-13 में कच्चे तेल की कीमत जहां 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, वह उनके सत्ता में आने के बाद ही गिरने लगी और कोरोना काल में वह 25 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह सरासर सरकारी लूट है।

देश में पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिसका असर अन्य चीजों पर भी पड़ रहा है। अब हर दिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें जारी की जाती हैं और कुछ दिनों से बढ़ोतरी के ही अपडेट आ रहे हैं। देश में कई शहर ऐसे हैं, जहां पेट्रोल 95 रुपये के आस-पास बिक रहा है। वहीं भारत के एक शहर में तो ‘पेट्रोल’ की कीमत 100 के पार चली गई है। ये वो जगह है जहां भारत में सबसे महंगा पेट्रोल मिलता है। राज्यों और शहरों की अलग-अलग टैक्स व्यवस्था होने की वजह से हर शहर में पेट्रोल-डीजल के अलग-अलग रेट हैं, क्योंकि केंद्र के आलावा राज्य सरकारें भी पेट्रोल डीजल पर अलग से टैक्स वसूलती हैं।

मनमोहन सिंह सरकार ने 25 जून 2010 को पेट्रोल की कीमत से सरकारी नियंत्रण हटा लिया था, यानी उसकी कीमत सरकार तय नहीं करेगी, वह बाज़ार के मांग-खपत सिद्धांत से तय होगी। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के तुरंत बाद 19 अक्तूबर, 2014 को डीज़ल की कीमत को नियंत्रण-मुक्त कर दिया। दरअसल पेट्रोल पर से नियंत्रण हटाने और डीजल को सरकारी आउटलेट से बिकने पर सरकारी सब्सिडी मिलती थी, लेकिन एस्सार, रिलायंस आदि निजी क्षेत्र के प्लेयर्स को डीजल सब्सिडी न मिलने के कारण पूरे देश में एस्सार, रिलायंस आदि के पेट्रोल पंपस बंद हो गए। पर जैसे ही मोदी सरकार ने डीज़ल की कीमत को नियंत्रण-मुक्त कर दिया वैसे ही ये सारे पेट्रोल पंपस खुल गए।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में शनिवार को कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 52.48 डॉलर थी। एक बैरल तेल लगभग 42 गैलन या 159 लीटर होता है। शनिवार को डॉलर की कीमत 73 रुपये थी, यानी एक बैरल कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 3831.04 रुपये थी। इस हिसाब से एक लीटर कच्चे तेल की कीमत शनिवार को 24.094 रुपये बैठती है। कच्चे तेल को साफ करने पर लगभग 3.84 रुपये खर्च होता है और इस तरह तेल की कीमत 28.75 पैसे बैठती है। केंद्र सरकार का टैक्स 32.98 रुपये और राज्यों का 19.32 रुपये बैठता है। यानी केंद्र और राज्य सरकार के टैक्स के रूप में एक लीटर पेट्रोल पर 52.30 रुपये चुकाना होता है।

गैसोलीन पेट्रोल प्राइसेज डॉट कॉम पर दिए गए डेटा के मुताबिक पड़ोसी देशों में भारत से सस्ता पेट्रोल बिक रहा है। वेबसाइट पर 18 जनवरी को पेट्रोल के भाव दिए गए हैं। उस दिन भारत में प्रति लीटर पेट्रोल 87.87 रुपये के भाव पर था। इसकी तुलना पड़ोसी देशों से करें तो 18 जनवरी को प्रति लीटर पाकिस्तान में 49.87 रुपये, भूटान में 49.56 रुपये, श्रीलंका में 61.37 रुपये, नेपाल में 68.84 रुपये, चीन में 74.14 रुपये और बांग्लादेश 77.01 रुपये था। सबसे सस्ता पेट्रोल वेनेजुएला में 1.46 रुपये प्रति लीटर और हांगकांग में 172.66 रुपये प्रति लीटर के भाव बिका।

18 जनवरी को प्रति लीटर डीजल का भाव 79.29 रुपये था। पड़ोसी देशों में प्रति लीटर डीजल का भाव श्रीलंका में 39.64 रुपये, भूटान में 46.31 रुपये, पाकिस्तान में 51.7 रुपये, बांग्लादेश में 56.25 रुपये, नेपाल में 58.20 रुपये और चीन में 64.54 रुपये रहा। सबसे महंगा प्रति लीटर डीजल हांगकांग में 145.38 रुपये में बिका और सबसे सस्ता ईरान में 8.75 रुपये में बिका।

मार्च 2014 में कच्चे तेल की कीमत 107.14 डॉलर यानी 6,655.54 रुपए प्रति बैरल थी, वह अक्तूबर 2020 में 41.53 डॉलर यानी 3,050.38 रुपये प्रति बैरल हो गई, लेकिन 15 मार्च 2014 को पेट्रोल की कीमत 73.20 रुपये और डीज़ल की कीमत 55.48 रुपये प्रति लीटर हो गई। 16 दिसंबर 2020 को पेट्रोल 90.34 रुपये और डीज़ल 80.51 रुपये प्रति लीटर तक बिक रहा था।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनलिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार, 2019-2020 के दौरान केंद्र सरकार को पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री से 2.23 लाख करोड़ रुपये का टैक्स मिला। वित्तीय वर्ष 2020-21 के बजट में 2.67 लाख करोड़ रुपये बतौर उत्पाद कर मिलने की संभावना जताई गई है।

यह अपने आप में प्रमाण है कि सरकार की आर्थिक हालत खस्ता है, क्योंकि लगभग  तीन साल पहले ब्रेंट क्रूड ऑयल जब करीब 75 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर था तो यहां भी 75 रुपये प्रति लीटर के करीब पेट्रोल था। इस समय क्रूड 50 डॉलर प्रति बैरल के करीब है, तो पेट्रोले के भाव 95 रुपये प्रति लीटर हो गया है।

खुले बाज़ार की अवधारणा पर पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम बदनुमा दाग सरीखे हो गए हैं। खुले बाज़ार में जब अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों पर ही बाज़ार भाव तय करने की अवधारणा है तो फिर टैक्स बढ़ाकर इसे लगातार महंगा क्यों किया जा रहा है, इसे आर्थिक उदारीकरण के पैरोकार क्यों नहीं बताते?

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 25, 2021 2:21 pm

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