Thursday, October 28, 2021

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एसजीपीसी, सियासत और बादल

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सिखों की पार्लियामेंट मानी जाने वाली एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) पर फिर बादलों की अगुवाई वाले शिरोमणि अकाली दल का एक एकमुश्त कब्जा हो गया है। 2017 में पहली बार इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था के प्रधान बने गोबिंद सिंह लोंगोवाल, प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल की मेहरबानी से लगातार तीसरी बार 27 नवंबर को इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था के प्रधान बन गए। एक तरह से उन्हें बादल परिवार के प्रति निभाई गई अतिरिक्त वफादारी का ‘ईनाम’ मिला है। दूसरे कुछ सिख अथवा पंथक नेता भी एसजीपीसी की प्रधानगी के प्रबल दावेदार थे लेकिन शिरोमणि अकाली दल प्रधान सांसद सुखबीर सिंह बादल ने गोबिद सिंह लोंगोवाल का चयन  करके सबको दरकिनार कर दिया। दरअसल, अरबों रुपए के भारी भरकम सालाना बजट वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का लोंगोवाल को तीसरी बार मुखिया बनाकर बादलों ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं।                               

पंजाब की सियासत का ऐतिहासिक तथ्य है कि जो अकाली दल एसजीपीसी पर काबिज होता है, उसी को मुख्यधारा का अकाली दल माना जाता है और सत्ता का सबसे बड़ा दावेदार भी। धर्म और सियासत के गठजोड़ की यह कमान दिग्गज अकाली रहनुमा, कई बार के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने तीन दशक से बखूबी संभाली हुई है। सो पंजाब की राजनीति में उनकी सरपरस्ती वाला शिरोमणि अकाली दल अग्रिम पंक्ति का राजनीतिक दल है। हाल-फिलहाल शेष अकाली दल अथवा पंथक संगठन हाशिए पर हैं।                                                       

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी हिंदुस्तान की पहली संवैधानिक संस्था के तौर पर भी अपनी अलहदा पहचान रखती है। लंबे संघर्ष के बाद और अंग्रेजों से बाकायदा लड़कर 1919 में यह वजूद में आई थी। तब महात्मा गांधी ने भी इस लड़ाई में सिखों का साथ दिया था। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी का मुख्य काम गुरुद्वारों का संचालन-प्रबंधन करना और वहां के ‘चढ़ावों’ पर नियंत्रण रखना है। कमेटी के तहत देशभर के हजारों गुरुद्वारे आते हैं और इसके वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या भी हजारों में है। सैकड़ों स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों का संचालन भी एसजीपीसी के हाथों में है। इसका वार्षिक बजट खरबों रुपयों का होता है।                                       

एसजीपीसी की बाबत आरोपनुमा तौर पर अक्सर कहा जाता है कि यह बादलों की अगुवाई वाले शिरोमणि अकाली दल की आर्थिक और धार्मिक ‘रीढ़’ के तौर पर काम करती है। इसीलिए इसके आम चुनाव और साल बाद होने वाले कार्यकारिणी एवं प्रधान पद के चयन के लिए बादल और शिरोमणि अकाली दल पूरा दमखम लगाते हैं। इस बार भी लगाया तथा माकूल नतीजा हासिल किया।

अतीत में एसजीपीसी की प्रधानगी कर चुके बीबी जागीर  कौर और प्रोफ़ेसर कृपाल सिंह बडूंगर सहित संत  बलवीर सिंह और जत्थेदार तोता सिंह भी इस बार मजबूत दावेदार थे लेकिन बादलों ने आखिरकार लगातार दो बार अध्यक्ष रहे गोबिंद सिंह लोंगवाल को ‘धार्मिक सत्ता’ सौंपी तो इसकी अहम वजहें हैं। बेशक वफादारी, (आम सिखों में) लगभग निर्विवाद और अलहदा किस्म की धार्मिक छवि रखना तो है ही ।                                                                         

श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव के मुख्य समागम के मौके पर पंजाब सरकार और शिरोमणि अकाली दल के बीच सीधे टकराव की नौबत आ गई थी और हालात बादलों की खुली फजीहत के बन गए थे। तब एसजीपीसी प्रधान गोबिंद सिंह लोंगवाल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ संभावित टकराव को टाल कर बड़े छोटे बादल की इज्जत बचाई थी। इस बार एक यह वजह रही उन्हें तीसरी बार प्रधान बनाने की। अब कदम-कदम पर लोंगोवाल ने बादलों के प्रति अपनी वफादारी का खुला इजहार लगते इल्जामों के बावजूद किया था। विरोधियों के आरोप हैं कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का करोड़ों रूपय का फंड इसके लिए, नियमों को धता बताकर इस्तेमाल किया गया।                                             

2015 में सूबे में प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में अकाली-भाजपा का शासन था। तब एक के बाद एक श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की कई बड़ी घटनाएं हुई थीं, जिनसे राज्य के चप्पे-चप्पे में असंतोष फैल गया था और पुलिस की गोली से दो लोग मारे गए थे। सरकार संकट में आ गई थी। संदेह की आग बादलों की दहलीज तक भी आ गई थी। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का खुला आरोप था कि बेअदबी की इन घटनाओं के सिलसिले के पीछे सुखबीर सिंह बादल की साजिश है। अब बड़े-छोटे बादल, उन घटनाओं के लिए मौजूदा कांग्रेस सरकार द्वारा गठित विशेष पुलिस जांच दल (एसटीएफ) का सामना कर रहे हैं।

लोगोंवाल को माला पहनाते सुखबीर सिंह बादल।

खैर, राज्य में जब ऐसी घटनाएं हो रही थीं, तब सर्वोच्च सिख संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान प्रो. कृपाल सिंह बडूंगर थे। वह ‘धार्मिक फ्रंट’ पर शिरोमणि अकाली दल, सरकार और बादलों को बचाने में नाकाम रहे थे। सो उनकी जगह भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल के रुप में ऐसा चेहरा ढूंढा गया जो धर्म और राजनीति के सारे खेल से अच्छी तरह वाकिफ हो। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के परम शिष्य रहे भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल तीन बार विधायक और एक बार मंत्री रहे हैं। यानी पंथ और सियासत के समीकरणों के अच्छे खासे अनुभवी। उन्हें एसजीपीसी का प्रधान बनाया गया तो वह बादलों की उम्मीदों पर खरे उतरते गए।                 

प्रधान बनने के बाद गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने व्यापक पैमाने और जमीनी स्तर पर विशेष ‘धर्म चेतना’ अभियान चलाया जो अंततः साख खो रहे शिरोमणि अकाली दल के बहुत काम आया। फिर उन्होंने इस साल मनाए जा रहे श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव की एसजीपीसी की ओर से आयोजित तमाम छोटी-बड़ी गतिविधियों का ढका छुपा राजनैतिक फायदा शिरोमणि अकाली दल को लेने दिया।             

तो इन बड़े कारणों ने भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल को लगातार तीसरी बार प्रधान बना दिया। हालांकि तमाम बातों के बावजूद उनका कद किसी भी लिहाज से मरहूम जत्थेदार गुरचरण सिंह तोहड़ा जितना बड़ा नहीं है, जो कई साल तक निरंतर एसजीपीसी के सर्वशक्तिमान प्रधान रहे और एक तरह से इतिहास कायम किया।                                         

खैर, शिरोमणि अकाली दल के कतिपय नेता खुद कहते हैं कि गोबिंद सिंह लोंगोवाल महज बादलों का मोहरा हैं और यकीनन एसजीपीसी के प्रधान पद की कुर्सी पर बैठकर उनके सियासी हितों की खूब पूर्ति करेंगे।                           

उन्हें प्रधान बनाने की एक बड़ी अहम वजह यह भी है कि उनकी पहचान ‘धर्म चेतना’ के लिए शिद्दत के साथ काम करने वाली शख्सियत के तौर पर रही है और ग्रामीण पंजाब के बड़े हिस्से मे वह परवान किए जाते हैं। पिछले कुछ अरसे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-संगठन राष्ट्रीय सिख संगत की पंजाब के ग्रामीण इलाकों और धार्मिक क्षेत्रों में सरगर्मियां काफी तेज हुईं हैं जो शिरोमणि अकाली दल के लिए स्वाभाविक चिंतन और चिंता का विषय है। शिरोमणि अकाली दल का भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन है। सीधे तौर पर दोनों कोई गंभीर टकराव नहीं चाहते। प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल अब नए किस्म की धर्म लहर  के सहारे ग्रामीण पंजाब में अपने खोए जनाधार को तो मजबूत करना ही चाहते हैं, पार्टी का धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे के पीछे छुपा धार्मिक चेहरा भी निखारना चाहते हैं। यह काम शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के जरिए, इसके प्रधान गोबिंद सिंह लोंगोंवाल बखूबी कर सकते हैं और करेंगे भी!

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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