Sun. Dec 8th, 2019

झारखंड चुनावः जनता के मुद्दे नहीं परिवारवाद के सहारे वैतरणी पार करने की कोशिश

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वैसे तो जब भी राजनीति में परिवारवाद की चर्चा होती है तो गांधी परिवार यानी नेहरू परिवार ही निशाने पर होता है, जबकि क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर परिवारवाद राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। लालू प्रसाद यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव तक परिवारवाद का शिकार रहे हैं। भाजपा भले ही परिवारवादी न हो, लेकिन पार्टी के भीतर कई नेता हैं जिनकी राजनीतिक विरासत में उनके परिवार के सदस्यों का सीधा हस्तक्षेप रहा है, और है। झारखंड भी ऐसी राजनीतिक विरासत का शिकार रहा है।

पिता और पति की राजनीतिक विरासत बचाने के लिए इस बार चुनावी दंगल में बेटा-बेटी और पत्नी पूरे दम-खम से डटे हुए हैं। कई विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पिता या पति के चुनाव लड़ने से अयोग्य होने या मृत्यु हो जाने पर उनकी राजनीतिक विरासत बचाने की जिम्मेदारी बच्चों या पत्नी पर आ गई है।

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पिछले दिनों राज्य में हुए विधानसभा उप चुनावों में दो सीटों पर विधायक पिता पांकी के विदेश सिंह और गोड्डा के रघुनंदन मंडल की मौत के बाद उनके बेटों क्रमश: देवेंद्र कुमार सिंह (बिट्टू सिंह) और अमित मंडल ने जीत हासिल की। विदेश सिंह कांग्रेस और रघुनंदन मंडल भाजपा के विधायक थे। अब दोनों देवेंद्र कुमार सिंह और अमित मंडल इस बार फिर से अपने-अपने पिता की सीटों पर कब्जा बनाए रखने के लिए दम-खम से चुनाव लड़ रहे हैं।

बड़कागांव से योगेंद्र साव विधायक रहे हैं। उनके चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित होने के बाद उनकी पत्नी निर्मला देवी ने पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक बनीं। इस बार उनकी बेटी अंबा प्रसाद (कांग्रेस प्रत्याशी) पिता की राजनीतिक विरासत संभालने को तैयार हैं।

कोलेबिरा सीट से एनोस एक्का विधायक बने थे। पिछली बार यहां से कांग्रेस प्रत्याशी नमन विक्सल कोनगाड़ी की जीत हुई थी। एनोस एक्का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं। ऐसे में उन्होंने अपनी बेटी आइरिन एक्का को प्रोजेक्ट किया है। वह झारखंड पार्टी से कोलेबिरा सीट से चुनाव लड़ेंगी। जामताड़ा सीट से फुरकान अंसारी विधायक रहे हैं। अब उनके पुत्र डॉ. इरफान अंसारी वहां से विधायक हैं। उन्होंने पिछली बार भी जीत हासिल की थी। इस बार फिर से वह चुनावी मैदान में हैं।

सिल्ली से आजसू पार्टी के सुप्रीमो सुदेश महतो को पराजित कर झामुमो के अमित महतो विधायक बने थे, लेकिन एक मामले में सजा मिलने के बाद उनकी विधायकी चली गई, तो उपचुनाव में उनकी पत्नी सीमा महतो को झामुमो ने उतारा और सिल्ली सीट सीमा के कब्जे में आ गया। गोमिया के झामुमो विधायक योगेंद्र प्रसाद महतो की विधायकी जाने के बाद उपचुनाव में उनकी पत्नी बबिता देवी ने मोर्चा संभाला और वे सफल रही। इस बार भी ये दोनों अपने पतियों की राजनीतिक विरासत बचाने में लगी हुई हैं।

रामगढ़ विधानसभा सीट से विधायक रहे चंद्रप्रकाश चौधरी इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में गिरिडीह से जीत कर सांसद बन गए। अब उनकी सीट की जिम्मेदारी पत्नी सुनीता चौधरी ने उठा ली है। रामगढ़ सीट से सुनीता चौधरी आजसू उम्मीदवार हैं। वहीं भाजपा से झरिया विधायक संजीव सिंह एक हत्या मामले में जेल में बंद हैं। उनकी पत्नी रागिनी सिंह को भाजपा ने मैदान में उतारा है और इस बार रागिनी सिंह अपने पति की विरासत बचाने की कोशिश में लगी हैं।

लोहरदगा सीट से पूर्व विधायक कमल किशोर की पत्नी नीरू शांति भगत को आजसू पार्टी ने प्रत्याशी बनाया है। झारखंड विधानसभा में अकेले विपक्ष की भूमिका निभाने वाले बगोदर से माले के विधायक का. महेंद्र प्रसाद सिंह की 2004 में हुई हत्या के बाद उनके इकलौते पुत्र बिनोद सिंह को पार्टी ने मैदान में उतारा और बिनोद ने जीत भी दर्ज की, मगर 2014 के चुनाव में वे हार गए। अब वे पुन: मैदान में हैं।

(रांची से जनचौक संवाददाता विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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