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पावर सेक्टर के कर्मचारियों का ‘काला दिवस’ और महिलाओं ने मनाया ‘राष्ट्रीय शोक दिवस’

पटना। आज देश भर में दो अलग-अलग मसलों पर महिलाओं और मजदूरों ने प्रदर्शन किया। बिहार में महिलाओं ने मजदूरों के साथ जगह-जगह किए जा रहे सरकारों के बर्ताव के खिलाफ ‘राष्ट्रीय शोक दिवस’ मनाया। जबकि देश के पैमाने पर पावर सेक्टर के कर्मचारियों ने बिजली के निजीकरण के खिलाफ काला दिवस मनाया।

मज़दूरों के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों के असंवेदनशील रवैये के विरुद्ध अब महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया है। आज पूरे राज्य में राष्ट्रीय शोक दिवस मनाया गया। देश भर में मजदूरों के साथ हुए अमानवीय हादसे के खिलाफ महिलाओं का ज़ोरदार प्रदर्शन हुआ। राजधानी के डाक बंगला चौराहा पर सैंकड़ों महिलाओं ने मज़दूरों के सवालों को लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया।

भोजन के अधिकार की तरफ से 1 जून को आहूत “राष्ट्रीय शोक दिवस” पर बिहार महिला समाज ने आज राज्य के सभी जिलों में प्रदर्शन किया। पटना के डाक बंगला चौराहे पर बड़ी संख्या में आज महिलाएं जुटीं और मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी, रोज़गार, महिला हिंसा और स्वास्थ्य जैसे सवालों को लेकर प्रदर्शन किया।

बिहार महिला समाज कि कार्यकारी अध्यक्ष निवेदिता झा ने कहा कि प्रवासी मजदूरों के साथ हो रहे अमानवीय घटना के लिए सीधे तौर पर राज्य व केंद्र सरकार जिम्मेदार है। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि वे प्रवासी मजदूरों कि सुरक्षा, रोज़गार और उनके स्वास्थ्य की सुविधाओं की गारंटी करें। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सरकार की उपेक्षा के कारण कोरोना बीमारी से हुई मौत, और प्रवासी मजदूरों, महिलाओं, बच्चों की मौत दुखद है, निर्दयी है।

बिहार महिला समाज से जुड़ी मोना ने कहा कि मजदूरों ये साथ हुए तमाम हादसों का जवाब सरकार को देना होगा। ये सब इसलिए हुआ कि कोविड-19 के संक्रमण के रोकथाम के नाम पर आनन-फानन में देशव्यापी लॉकडाउन किया गया बिना किसी पूर्व तैयारी के। उन्होंने कहा कि हम देश के मजदूरों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं और उनकी घर वापसी सुरक्षित हो इसकी मांग सरकार से करते हैं।

बिहार सरकार के एक आंकड़े के अनुसार लगभग 17 लाख प्रवासी मजदूर देश के अलग-अलग शहरों में फंसे हुये थे। सरकार उन्हें सुरक्षित वापस बुलाने की व्यवस्था करे और उन्हें मनरेगा के तहत रोज़गार दे।

दूसरी तरफ पावर सेक्टर के कर्मचारियों ने अपने विभाग के निजीकरण के खिलाफ देश भर में काला दिवस मनाया। इस मौके पर कर्मचारियों ने जगह-जगह काली पट्टियां बांधकर अपना विरोध जाहिर किया। आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के प्रवक्ता वीके गुप्ता ने एक बयान जारी कर कहा कि देश में लाखों की तादाद में पावर सेक्टर के कर्मचारी इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट विधेयक 2020 के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों का पालन करते हुए कर्मचारियों ने केंद्र शासित प्रदेशों में प्रस्तावित बिजली के निजीकरण का विरोध किया।

इस मौके पर कर्मचारियों ने अपने दफ्तरों के गेट पर सभाएं कीं। इन सभी ने अपनी बाहों पर काली पट्टी बांध रखी थी। गुप्ता का कहना था कि देश के तकरीबन सभी सूबों में विरोध प्रदर्शन हुआ। गुप्ता ने इस विधेयक को किसान और उपभोक्ता विरोधी करार दिया। उनका कहना था कि इससे बिजली की दरें बढ़ जाएंगी जिनका सीधा खामियाजा किसानों और उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा।

इस बीच, मजदूर किसान मंच के अध्यक्ष और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी और वर्कर्स फ्रंट के उपाध्यक्ष व पूर्व अधिशासी अभियंता पावर कारपोरेशन इंजीनियर दुर्गा प्रसाद ने बताया कि यूपी के विभिन्न जिलों में भी काला दिवस मनाया गया है।

उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के इस विपदाकाल में भी मोदी सरकार देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के लिए देश की सार्वजनिक सम्पदा को बेचने में लगी है। अपने दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने का जश्न मना रही इस सरकार का काम महज देश की सार्वजनिक व प्राकृतिक सम्पदा को बेचने का ही रहा है, वास्तव में यह देश बेचवा सरकार है।

उनका कहना था कि इस सरकार ने महामारी में भी रक्षा, कोयला का निजीकरण किया, बैंक व बीमा को बर्बाद कर दिया और अब बिजली का निजीकरण करने के लिए लाया जा रहा विद्युत संशोधन कानून किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों के हाथ से बिजली जैसा जिंदगी का महत्वपूर्ण अधिकार भी छीन लेगा।

इसके खिलाफ बिजली कर्मचारियों के काला दिवस का वर्कर्स फ्रंट और मजदूर किसान मंच के कार्यकर्ताओं ने पूरे देश में समर्थन किया।

(महिलाओं से जुड़ी खबर मंथन टुडे से साभार। बाकी प्रेस विज्ञप्ति और डेस्क पर निर्मित।)

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