Sunday, May 29, 2022

वर्तमान चुनावी बिसात और पंजाब का भविष्य

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2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की सामाजिक संरचना में आए एक अप्रत्याशित बदलाव और नए किस्म के चुनावी हथकंडों ने चुनावी प्रक्रिया पर कुछ ऐसा फ़र्क डाला है कि विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) जैसे संस्थान और प्रणय रॉय जैसे दिग्गज चुनाव विश्लेषक (Psephologist) भी चुनावों के नतीजों का सही-सही आकलन कर पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं।

आज पंजाब में आज विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। चुनावी प्रोपेगंडा और भूमिगत हथकंडों ने पूरी तस्वीर ही बदल डाली है। चुनावों को ‘लोकतंत्र’ का महोत्सव कहा जाता है, लेकिन इसमें से ‘लोक’ से जुड़ा हरेक मुद्दा गायब रहा। किसान जो अभी-अभी दिल्ली से केंद्र सरकार के तीन काले कानून रद्द करवा कर लौटे हैं, वे इस चुनावी चर्चा से हैं। क़र्ज़ के बोझ तले दबे उन किसानों जिनका इस व्यवस्था पर से ही विश्वास उठ गया था, वे नगाड़ा रैलियों के दौरान भी आत्महत्या कर रहे थे लेकिन वे किसी भी नेता या पार्टी की चिंता के दायरे में नहीं दिखे।

चुनाव प्रचार के दौरान सभी पार्टियों ने वायदों की कुछ ऐसी झड़ी लगाई है कि सिर्फ़ चाँद-तारे तोड़ के लाने की कमी ही बची रह गयी दिखती है। मुफ़्त बिजली, मुफ़्त पानी, मुफ़्त सिलिंडर, सब कुछ मुफ़्त, मुफ़्त, मुफ़्त की ऐसी झड़ी लगी है कि लोगों की बुद्धि ही चौंधिया गयी है। मुफ़्त कंप्यूटर, मुफ़्त टेबलेट, मुफ़्त मोबाइल के वायदों पर से नौजवानों का भरोसा तो ऐसा उठा है कि 18-19 उम्र तक के 9.30 लाख युवाओं में से 6.5 लाख ने वोटर कार्ड के लिए आवेदन ही नहीं किया है। उन जिलों के नौजवानों ने वोटर कार्ड बनवाने में ज्यादा रूचि नहीं  दिखाई है जहाँ से नौजवान ज्यादा विदेश पलायन कर रहे हैं और उन जिलों के नौजवानों ने इसमें सबसे कम दिलचस्पी दिखाई है जो नशे की चपेट में आ चुके हैं।

संस्थागत लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की अवहेलना करके आम लोगों को लुभाने वाली लोकलुभावनवादी राजनीति और ‘गुजरात मॉडल’ या ‘दिल्ली मॉडल’ वाले इस चमचमाती पेशकारी में करिश्माई नेतृत्व और उसके परिणामस्वरूप निरंकुश सत्ता के अंदेशे निहित होने का अंदाजा अभी भी ज्यादातर लोग लगा पाने में असमर्थ हैं या अपने परिवार को भयंकर आर्थिक संकटों से निजात दिलाने के लिए उन्हें पाँच किलो आटा/गल्ले में भी एक बहुत बड़ी नेमत नज़र आती है।

अपना कीमती वोट डालने से पहले हरेक वोटर को यह याद रखना चाहिए कि जो कुछ हमें देने का वायदा किया जा रहा है वह आएगा कहाँ से? जो भी नयी सरकार आती है कहती है कि खजाना खाली पड़ा है। हरेक सरकार पंजाब के सिर पर कर्ज का बोझ कुछ और ज्यादा बढ़ा देती है। नयी सरकार कभी नहीं बताती कि पुरानी सरकार कहाँ-कहाँ और क्या-क्या गुल खिला कर गयी है क्योंकि अगले पाँच साल उसने भी कमोबेश वही जोड़-घटाव करना होता है। 31 मार्च 2022 तक 2.82 लाख करोड रुपए का क़र्ज़ा पंजाब के सिर पर हो जाएगा। इस क़र्ज़ से मुक्ति पाने के लिए किसी पार्टी के पास कोई रोड मैप नहीं है। अलबत्ता कसमों-वादों का पिटारा जरूर है।

अबके चुनाव प्रचार सिर्फ़ पक्की सड़कों पर नज़र आया। सीमान्त किसानों के उन गावों में किसी पार्टी का कोई नेता नहीं पहुंचा, जो सरहद की कंटीली तारों और रावी दरिया के बीच बसे हुए हैं और एक कश्ती ही इन गावों को देश से जोड़ती है। यह वह गाँव हैं जहाँ डिस्पेंसरी-स्कूल जैसी कोई बुनियादी सुविधा भी नहीं है, यहाँ कभी कोई पोलिंग बूथ भी नहीं लगा, फ़िर भी यहाँ के बाशिंदे 100% वोट डालते हैं। आज भी यह वोट डालने जायेंगे पर अहम सवाल यह भी है कि यह किसान जो भारत के झंडे के सिर्फ़ एक रंग से वाकिफ हैं, किस उम्मीद से वोट डालते हैं?

आर्थिक असमानता एक इस तरह की बुराई है जो कि यह कई अन्य सामाजिक और आर्थिक बुराइयों को जन्म देती है, पर राजनीतिक पार्टियों के मेनिफेस्टो में या चुनाव एजेंडे में इसको तलाशना अब एक हास्यास्पद कवायद लगती है। प्रधानमंत्री मोदी के ‘एन्टायर पोलिटिकल साइंस’ में यह विषय तो पढाया ही नहीं जाता। वे  भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए तीन बार पंजाब आए, पर उन्होंने भी इस विषय पर कोई बात नहीं की।

प्रधानमंत्री मोदी ने वायदा किया है कि ‘अगर उनकी सरकार बनी’ तो वे पंजाब से नशा ख़त्म कर देंगे। अब यह जुमला है या ‘जेंटलमैन प्रॉमिस’ है, वही जानें लेकिन जब यह बात कह रहे थे, उस दौरान उनके साथ मंच पर पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भी विराजमान थे जिन्होंने 2017 के चुनावों के समय धर्मग्रन्थ हाथ में लेकर कसम खाई थी कि अगर उनकी सरकार बनी तो वे एक महीने में पंजाब को नशा मुक्त कर देंगे।

पंजाब की जवानी तबाह कर रहे नशे के कारोबार ने अमरिंदर सिंह के राज में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इसके लिए राजनीतिक नेता, प्रशासन और पुलिस अधिकारियों तथा तस्करों की तिकड़ी जिम्मेवार है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल इसके लिए अकाली नेता बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को जिम्मेवार ठहराते थे। उनका दावा था कि उनके पास इसके पुख्ता सबूत हैं, लेकिन जब कोर्ट ने सबूत दिखने को कहा तो उन्होंने लिखित में मजीठिया से माफ़ी माँग ली।

पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के पुत्र नरेश गुजराल राज्य सभा सदस्य हैं। उन्होंने दो महीने पहले एक बयान दिया था कि पिछली बार कांग्रेस का जीतना संभव नहीं था यह तो नरेंद्र मोदी ने इशारा कर दिया था कि आम आदमी पार्टी जीत रही है इसका रास्ता रोकने के लिए सभी वोट कांग्रेस को डाल दो। नरेश गुजराल के इस बयान का न तो अकाली दल ने खंडन किया है, न ही भाजपा वालों ने। सियासत के ग्रीन-रूम में जो कुछ होना होता है वह चुपचाप हो जाता है।

भाजपा से कांग्रेस में ‘घर वापसी’ कर गए नवजोत सिंह सिद्धू ने 2019 के लोकसभा चुनाव के समय यह कहा था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह और भाजपा आपस में मिले हुए हैं। कुछ समय प्रियंका गांधी या राहुल गांधी की तरफ से भी इस संदर्भ में कोई बयान नहीं आया था। अब प्रियंका गांधी ने यह बात स्वीकार की है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह और मोदी के तार आपस में जुड़े हुए थे इसलिए उन्हें हटाना पड़ा।  

कैप्टन अमरिंदर सिंह आजकल यह दावा कर रहे हैं कि आज तक मोदी साहब ने उनकी कोई भी बात मानने से कभी इंकार नहीं किया, तो लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर यह बात थी तो मोदी से कहकर तीनों कृषि कानून क्यों नहीं वापस करवा दिए? 700 से ज्यादा किसानों की जान ही बच जाती।

कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने पार्टी को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। चुनावों के दरमियान कांग्रेस एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी है जिसके सबसे ज्यादा नेता पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में शामिल हुए, पार्टी से निकाले गए, पार्टी में रहते हुए पार्टी के खिलाफ बयानबाज़ी करते रहे हैं। अकाली दल बादल भी टूट-फूट चुका है और कांग्रेस छोड़कर आये नेताओं के सहारे काम चला रहा है।

पंजाब भाजपा के नेताओं को पूरी उम्मीद है प्रधानमंत्री मोदी के दिल से छलक-छलक जाते सिख समुदाय और उनके गुरुओं के प्रति अगाध प्रेम को देखकर, 1.17 करोड़ सिख वोटर भी हिन्दू आबादी के 82 लाख वोटरों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर भाजपा को ही वोट डालेंगे और किसान आन्दोलन के दौरान दिल्ली की सरहद पर मारे गए 700 से ज्यादा किसानों की शहादत को भूल जायेंगे।

पंजाब में क़रीब 12000 महंतों के छोटे-बड़े डेरे हैं। इसमें सिख संप्रदाय से जुड़े 9000 डेरे हैं। जिनमें डेरा सच्चा सौदा, डेरा राधास्वामी ब्यास, डेरा सचखंड बहा, डेरा रूमी वाला, डेरा हंसली वाले, निरंकारी मिशन और दिव्य ज्योति संगठन प्रमुख डेरे माने जाते हैं। इन डेरों के अनुयायियों की संख्या पचास लाख के क़रीब बताई जाती है। यही कारण है कि पंजाब  को राजनीति में डेरों का अहम स्थान है और चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल डेरा प्रमुखों से नजदीकी बढ़ाना शुरू कर देते हैं, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर इनका समर्थन करते रहते हैं। इन डेरों से भी प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने राबता कायम कर लिया है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अमृतसर में अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के साथ बंद कमरे में हुई मुलाकात में कौन-कौन से मुद्दों पर बात हुई, इसे पूरी तरह से गुप्त रखा जा रहा है। यह भी नहीं बताया गया कि मोदी के ‘गोबिंद रामायण’ पर दिए बयान पर जरी किये माफ़ी के फतवे को अकाल तख़्त ने वापस ले लिया है या नहीं।

डेरा राधास्वामी ब्यास से प्रधानमंत्री दो बार बंद कमरे में मिल चुके हैं। राधास्वामी सत्संग ब्यास के बीस लाख से ज्यादा भक्त हैं। डेरे के प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों विवादित दवा निर्माता कंपनी रैनबैक्सी के पूर्व प्रोमोटर्स मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह के मामा हैं। 740 करोड़ रुपये की हेराफेरी के मामले में मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह आजकल जेल में हैं। ऐसे में मोदी से डेरा प्रमुख की मुलाक़ात खासी चर्चा में है।

चुनावों के बीच डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम भी 21 दिन की पैरोल पर बाहर आ गया है। गुरमीत राम रहीम दो महिला अनुयायियों के बलात्कार के मामले में 20 साल और एक पत्रकार और अन्य अनुयायी की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है और दूसरी तरफ पंजाब में 2015 में हुई गुरु ग्रंथ साहिब को कथित बेअदबी की घटनाओं में डेरा सच्चा सौदा के लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार के पंजाब चुनावों में राजनीतिक पार्टियां डेरा सच्चा सौदा का समर्थन तो चाहेंगी, लेकिन साथ ही चाहेंगी कि ऐसा खुल के न हो।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (डीएसजीएमसी) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए नेता मनजिंदर सिंह सिरसा की मेहरबानी से मोदी सिख समुदाय के कई प्रमुख लोगों की अपने आवास पर मेजबानी कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी की मेहरबानी से हो सकता है दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के फंड में हुए घपले को लेकर छिड़ा विवाद भी ठण्डे बस्ते में चला जाये।

बेशक पंजाब में इन दिनों मीडिया द्वारा लहर तो आम आदमी पार्टी की ही बताई जा रही है, और केजरीवाल के खालिस्तानियों से संबंधों को लेकर छिड़ा विवाद लगता नहीं कि कोई ज्यादा असर छोड़ पाएगा। हां, अब यह डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों को किसके पक्ष में वोट डालने के लिए कहते हैं और डेरा-मोदी गठबंधन क्या रंग लाता है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।   

(देवेन्द्र पाल 40 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। दिनमान और जनसत्ता में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। इसके अलावा संस्कृत कर्म और जनांदोलनों से भी उनका बराबर का सरोकार रहा है। आप आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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