Sunday, December 4, 2022

झारखंड: राशन वितरण में गड़बड़ी के खिलाफ लातेहार में ग्रामीणों का विरोध-प्रदर्शन

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भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाले ग्लोबल हंगर इंडेक्स की वेबसाइट के अनुसार भारत 121 देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2022 में 101 से 107वें स्थान पर खिसक गया है। अब इस सूचकांक में पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका भी भारत से आगे हो गया है।

वर्ष 2021 में भारत 116 देशों की सूची में भारत 101वें स्थान पर था लेकिन इस बार 121 देशों की लिस्ट में छह अंक लुढ़ककर 107वें नंबर पर पहुंच गया है। इसके साथ ही भारत का जीएचआई स्कोर भी गिर गया है – 2000 में यह 38.8 था जो 2014 और 2022 के बीच 28.2 – 29.1 के बीच पहुंच गया है।

झारखंड की बात करें तो आगामी 15 नवंबर को राज्य गठन का 22वां स्थापना दिवस मनाया जाएगा।

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राज्य सरकार के जो अधिकृत आंकड़े उपलब्ध हैं, उसके अनुसार दिसम्बर 2016 से 2020 तक झारखंड में भूख से 24 लोगों की मौत भोजन की अनुपलब्धता यानी भूख के कारण हुई है।

राइट टू फूड कैंपेन से जुड़ी आयशा खान ने 2015 से लेकर मई, 2020 के बीच भूख से मरने वालों की सूचनाओं को कार्यकर्ताओं और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया है। इसके मुताबिक 13 राज्यों में कुल 108 मौतें भूख के कारण हुई हैं। भूख से मौतों की इस सूची में 05 से 80 आयु वर्ग के दलित, पिछड़ा, आदिवासी और सामान्य वर्ग के लोग शामिल हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में सर्वाधिक 29 मौतें, उत्तर प्रदेश में 22 मौतें, उड़ीसा में 15 मौतें, बिहार में 8 मौतें, कर्नाटक में 7,  छत्तीसगढ़ में 6,  पश्चिम बंगाल में 6, महाराष्ट्र में 4, मध्य प्रदेश में 4, आंध्र प्रदेश में 3, तमिलनाडु में 3, तेलंगाना में 1, राजस्थान में 1 मौत शामिल है।

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एनएफएचएस-5 रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में छह महीने से लेकर 59 महीने तक की आयु वर्ग के 67 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। राज्य की 65.3 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी की चपेट में हैं। देश में आज भी 19 करोड़ से अधिक लोग भूखे पेट रात बिताने को विवश हैं l ये स्थितियाँ देश के विकास के रास्ते में बड़ी बाधक हैंl

इन्हीं समस्याओं को लेकर पिछले 16 अक्टूबर को झारखंड के लातेहार जिला के गारू के संयुक्त ग्राम सभा मंच के नेतृत्व में विश्व खाद्य दिवस के मौके पर स्थानीय अरमू चौक से एक विशाल रैली निकाली गई, जो गारू प्रखण्ड परिसर में आम सभा में परिणत हो गई।

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आम सभा को संबोधित करते हुए भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अभी पिछले दिनों जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार भारत में भुखमरी की स्थिति बेहद शर्मनाक स्थिति पर पहुँच गई है। पिछले वर्ष 2021 में भारत 101 वें स्थान से गिरकर इस साल 2022 में 121 देशों की रैंकिंग में भारत का स्थान 107 पर पहुँच गया है। जबकि भारत से बेहतर स्थिति में पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश हैं, देश को इस शर्मनाक स्थिति तक पहुँचाने के लिए सीधे-सीधे नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाली वाली भाजपा सरकार और और उसकी गरीब विरोधी नीतियाँ जिम्मेवार हैं।

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वक्ताओं ने कहा कि अकेले झारखण्ड राज्य में 2017 से 2021 के बीच 25 से अधिक लोगों की भूख से मौत हुई है। पूरे जिले में राशन की कटौती सबसे बड़ी समस्या बन गई है। इस विषय पर जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी की वजह से राशन डीलरों का मनोबल का बढ़ता जा रहा है।

कार्यक्रम में कहा गया कि पूरे गारू प्रखण्ड में आदिम जनजातियों को 35 किलो राशन के बदले सिर्फ 32 किलो ही एमओ के द्वारा वितरण किया जा रहा है। इसी प्रकार मिट्टी तेल भी सिर्फ आधा लीटर ही दिया जा रहा है। इसी प्रकार विभिन्न गांवों से लोगों ने राशन डीलरों की मनमानी का मुद्दा उठाया।

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बताया गया कि राशन की कटौती कभी बंद होने का नाम नहीं ले रहा है। राशन कार्ड में नाम जोड़ने के लिए 2017-2018 में जो आवेदन दिया हुआ है वह आजतक पेंडिंग है। नया राशन कार्ड बनाने के लिए ग्रीन कार्ड और सफ़ेद कार्ड बनाने का ही ऑप्शन है। अंत्योदय और लाल कार्ड बनाने का कोई ऑप्शन नहीं है। लोगों द्वारा ऑनलाइन आवेदन कराकर रखा गया है लेकिन आज तक राशन कार्ड में नाम नहीं जुड़ा है। खाद्य सुरक्षा कानून का पूरा हनन हो रहा है।

दूसरी तरफ आज भी मनरेगा में काम की मांग नहीं किया जाता है। लोगों को जानकारी का अभाव किसी दूसरे का जाबकार्ड में काम करवाया जाता है और मजदूरों से पोस मशीन में बिना जानकारी दिए अंगूठा लगाकर पैसे का निकासी किया जाता है।

ग्रीन राशन कार्ड में राशन नहीं आने की बात कहकर राशन डीलरों द्वारा राशन नहीं दिया जाता जबकि मशीन में अंगूठा लगवा लिया जाता है।

वहीं गढ़वा जिले के चिनियाँ प्रखण्ड के मसरा गांव के कोरवा आदिम जनजाति समुदाय के लोगों को पिछले जुलाई माह से लेकर अक्टूबर माह तक कुल चार महीने से राशन नहीं दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत मिलने वाला राशन भी छह महीने से नहीं दिया जा रहा है। जिसके कारण कोरवा जनजाति के लोग साव महाजन से महुआ में उधार लेकर अपना और अपने बच्चों का पेट पाल पोश रहे हैं।

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कार्यक्रम के अंत में एक 10 सूत्री माँग पत्र देश के प्रधानमन्त्री के नाम तैयार किया गया गया जिसे प्रतिनिधिमण्डल द्वारा स्थानीय प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को कार्यालय अवधि में देने का निर्णय लिया गया।

मांग पत्र में कहा गया है कि जन वितरण प्रणाली का सार्वभौमिकरण किया जाए। जन वितरण प्रणाली में मोटे अनाज, दाल और खाद्य तेल शामिल किया जाए। जब तक जन वितरण प्रणाली का सार्वभौमिकरण नहीं किया जाता है राशनकार्ड से वंचित सभी योग्य परिवारों को राशन कार्ड से जोड़ा जाए। जन वितरण प्रणाली, आंगनबाड़ी और स्कूलों में दिया जाने वाले दोपहर के भोजन योजना में दिए जा रहे चावल का फोर्टीफिकेशन पूरी तरह बन्द किया जाए।

झारखण्ड के सभी विद्यालयों एवं आंगनबाड़ी केन्द्रों में दोपहर के भोजन में प्रत्येक दिन सभी बच्चों को एक – एक अंडा देने की गारन्टी की जाए। सभी महिलाओं को प्रत्येक गर्भधारण के समय प्रधानमन्त्री मातृत्व वंदना योजना के तहत् 6000 रूपये देने की क़ानूनी गारन्टी की जाए। सभी गर्भधारण करने वाली नरेगा मजदूर महिलाओं को 3 महीने का वेतन सहित अवकाश दिया जाए। सम्पूर्ण आदिवासी इलाकों में किसी भी समुदाय को जल, जंगल जमीन से विस्थापित करना बन्द किया जाए। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 में अधिकारों से वंचित किये जाने पर ससमय शिकायत निवारण एवं हर्जाना देना सुनिश्चित की जाए। मनरेगा में प्रत्येक वर्ष न्यूनतम 200 दिन काम और दैनिक मजदूरी 600 रूपये की गारन्टी की जाए।

कार्यक्रम के सफल बनाने में साभिल नाथ पैकरा, फ्रांसिस्का, कलिता देवी, बिपिन बिहारी, सोनमती देवी, तारामणि देवी, अमरदयाल सिंह, सिलास गुड़िया, विमल सिंह, मकलदेव सिंह, ननकू सिंह  ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभा का संचालन महेंद्र उराँव ने किया।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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