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सुप्रीम कोर्ट के स्टे के रहमोकरम पर जिंदा सीबीआई पर राजस्थान में बैन

गुवा‌हाटी हाई कोर्ट ने 6 साल पहले सीबीआई के गठन को ही असंवै‌धानिक ठहराते हुए उसे समाप्त करने को आदेश ‌दिया था। उच्चतम न्यायालय ने पहले ही टिप्पणी की थी कि, ‘सीबीआई पिंजरे में बंद तोता है, जो अपने मालिक की जुबान बोलता है। इसके बावजूद उच्चतम न्यायालय ने तत्कालीन केंद्र सरकार की गुहार पर गुवा‌हाटी हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। वो स्टे ऑर्डर ही है कि जिसने सीबीआई अब तक जिंदा रखा है। इस बीच सीबीआई का राजकीय दुरूपयोग धड़ल्ले से जारी है नतीजतन विपक्ष द्वारा शासित राज्य एक के बाद एक सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को राज्य में जांच और छापेमारी की दी गई अनुमति वापस ले रहे हैं। इनमें सबसे ताज़ा नाम है राजस्थान का जिसने राज्य में सीबीआई पर बैन लगा दिया है।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने पिछले कुछ दिनों से जारी सियासी उठापटक के बीच सोमवार को बड़ा फैसला लिया। सरकार ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को राज्य में जांच और छापे मारी की दी गई अनुमति वापस ले ली। गहलोत सरकार ने आदेश पारित कर कहा कि अब सीबीआई को राज्य में किसी जांच से पहले उसकी अनुमति लेनी होगी क्योंकि उसने सीबीआई को दिया ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले लिया है।

राजस्थान सरकार ने सीबीआई से जनरल कंसेंट वापस लेने का ऐलान तब किया जब राज्य में पिछले कुछ दिनों से सियासी गहमागहमी का माहौल कायम है। गहलोत सरकार में उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे युवा नेता सचिन पायलट अपने समर्थकों के साथ बागी हो चुके हैं। उन्हें मनाने की तमाम कवायद फेल होने के बाद कांग्रेस ने उनसे दोनों पद छीन लिए और अब उनकी और उनके समर्थक विधायकों की विधानसभा सदस्यता छीनने की कवायद चल रही है। पायलट खेमे को विधानसभा अध्यक्ष की तरफ से नोटिस मिला और पायलट इसके खिलाफ हाई कोर्ट चले गए। केंद्र में बीजेपी की सरकार है। ऐसे में राजस्थान की कांग्रेस सरकार को डर लग रहा होगा कि दबाव बनाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल हो सकता है।

राजस्थान से पहले तीन राज्य ऐसा कर चुके हैं। आंध्र प्रदेश की तत्कालीन चंद्रबाबू नायडू सरकार ने 8 नवंबर, 2018 को सीबीआई के राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। आंध्र प्रदेश ने महज तीन महीने पहले 3 अगस्त, 2018 को ही एक आदेश पारित करके सीबीआई को राज्य में जांच करने की आम सहमति (जनरल कंसेंट)  दी थी। चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में एनडीए का हिस्सा थे, लेकिन मार्च 2018 में उन्होंने खुद को गठबंधन से अलग कर लिया था। अगले विधानसभा चुनाव में नायडू की सत्ता छिन गई और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी राज्य के नए मुख्यमंत्री बने।

सीबीआई को बैन करने के फैसले पर आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम चंद्रबाबू नायडू का समर्थन करने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी यही काम किया। हफ्ते भर के अंदर उन्होंने पश्चिम बंगाल में सीबीआई को जांच करने की दी गई सहमति वापस ले ली। पश्चिम बंगाल ने 1989 में राज्य में सीबीआई जांच को ‘जनरल कंसेंट’ दिया था। 3 फरवरी, 2019 को शारदा चिटफंड घोटाले के संबंध में राज्य के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ के लिए कोलकाता पहुंची सीबीआई की टीम के साथ जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया।

पश्चिम बंगाल पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को ही हिरासत में ले लिया और उन्हें थाने ले गई। सीबीआई की 8 सदस्यीय टीम को जबरन वैन में भरकर शेक्‍सपियर सरनी पुलिस स्‍टेशन ले जाया गया। उधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं। बाद में सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय में शिकायत की और कोर्ट ने राजीव कुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए उन्हें जांच में सहयोग करने का आदेश दिया। उच्चतम न्यायालय के इस आदेश को ममता ने लोकतंत्र और संविधान की जीत बताई थी।

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने 10 जनवरी, 2019 को आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के नक्शे कदम पर चलते हुए सीबीआई को राज्य में जांच के लिए दिया गया जनरल कंसेंट वापस ले लिया। प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर इसकी जानकारी दी और कहा कि वो सीबीआई को बता दें कि राज्य सरकार की अनुमति लिए बिना वह यहां जांच करने के लिए नहीं आए। हालांकि, बघेल सरकार ने इस फैसले के पीछे का कोई कारण नहीं बताया।

सीबीआई का संचालन दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिसमेंट (DSPE) एक्ट के तहत होता है। इसका सेक्शन 6 सीबीआई को दिल्ली समेत किसी भी केंद्रशासित प्रदेश से बाहर किसी राज्य में जांच करने के लिए संबंधित राज्य सरकार की अनुमति के बिना जांच करने से रोकती है। चूंकि सीबीआई के क्षेत्राधिकार में सिर्फ केंद्र सरकार के विभाग और कर्मचारी आते हैं, इसलिए उसे राज्य सरकार के विभागों और कर्मचारियों अथवा राज्यों में संगीन अपराधों की जांच के लिए अनुमति की जरूरत पड़ती है। सीबीआई को राज्य से दो तरह की अनुमति मिलती है। एक- खास मामले की जांच को लेकर (केस स्पेसिफिक) और दूसरा- सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट)। जनरल कंसेंट के तहत राज्य सीबीआई को अपने यहां बिना किसी रोकटोक के जांच करने की अनुमति देते हैं।

गौरतलब है कि गुवा‌हाटी हाईकोर्ट ने 6 साल पहले सीबीआई के गठन को ही असंवै‌धानिक ठहराते हुए उसे समाप्त करने का आदेश ‌दिया था। उसके एक फैसले ने देश को झकझोर दिया था। गुवा‌हाटी हाईकोर्ट ने एक फैसले में देश की सर्वोच्‍च जांच एजेंसी सीबीआई के गठन को ही असंवै‌धानिक ठहराते हुए उसकी की जड़ों  पर प्रहार किया था। 6 नवंबर, 2013 को दिए फैसले में हाई कोर्ट ने सरकार के उस प्रस्ताव को समाप्त करते हुए, जिसके जरिए सीबीआई का गठन हुआ था, जांच एजेंसी के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया था। गुवा‌हाटी हाईकोर्ट के फैसले के व्यापक प्रभावों की संभावना ने केंद्रीय संस्‍थानों में खलबली पैदा कर दी। इस फैसले से केंद्र सरकार भी सकते में आ गयी थी, क्योंकि उसके बाद सीबीआई द्वारा हजारों मामलों में की गयी जाँच और अभियोजन निष्‍प्रभावी हो जाते।

उस वक्‍त तत्‍कालीन एटॉर्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती तब के चीफ जस्‍टिस ऑफ इं‌डिया पी सदाशिवम से मिलने उनके आवास पहुंच गए थे, क्योंकि उच्चतम न्यायालय में उस दिन छुट्टी थी। उच्चतम न्यायालय ने कुछ महीनों पहले ही टिप्‍पणी की थी कि, ‘सीबीआई पिंजरे में बंद तोता है, जो अपने मालिक की जुबान बोलता है। इसके बावजूद चीफ जस्‍टिस अपने आवास पर ही शीघ्र सुनवाई के लिए तैयार हो गए और गुवा‌हाटी हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। वो स्टे ऑर्डर ही है कि जिसने सीबीआई को अब तक जिंदा रखा है।

गुवा‌हाटी हाई कोर्ट का ये फैसला नवेंद्र कुमार की याचिका पर आया था, जिन पर सीबीआई द्वारा दाखिल एक फाइनल रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा चलाया जा रहा था। अपनी याचिका में नवेंद्र कुमार ने सीबीआई गठन को ही चुनौती देते हुए कहा था कि सीबीआई विधि द्वारा गठित संस्‍थान नहीं है, बल्‍कि कार्यकारी आदेश द्वारा गठित निकाय है। इसलिए इसके पास गिरफ्तारी, खोजबीन, जब्ती, आपराधिक जांच और मुकदमे के अधिकार हो ही नहीं सकते।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कथित रूप से दिल्‍ली पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट 1946 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर एक विशेष प्रस्ताव के जरिए सीबीआई का गठन 1 अप्रैल 1963 को किया था। उस प्रस्ताव में कहा गया था क ‘भारत सरकार ने उन अपराधों की जांच के लिए एक केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना पर विचार किया है, जिन्हें वर्तमान में दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट द्वारा हैंडल किया जाता है।

साथ ही डिफेंस ऑफ इं‌डिया एक्‍ट और रूल्स के तहत विशेष रूप से महत्वपूर्ण मामले, आवश्यक वस्‍तुओं की जमाखोरी, काला बाजारी और मुनाफाखोरी के मामले, जिनके परिणाम और प्रभाव कई राज्यों पर दिखते हैं; कई विशेष प्रकार के अपराधों से संबंधित खुफिया जानकारियां इकट्ठा करना; इंटरनेशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइजेन के साथ जुड़े राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो के काम में भागीदारी; अपराध के आंकड़ों का रखरखाव और अपराध और अपराधियों से संबंधित सूचनाओं के प्रसार; भारत सरकार के विशेष हितों के मुताबिक विशेष अपराधों का अध्ययन अथवा अखिल भारतीय, अंतर राज्यीय प्रभावों और सामाजिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व के अपराधों के अध्ययन; पुलिस अनुसंधान के संचालन, और अपराध से संबंधित कानूनों का समन्वय भी सेंट्रल इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो के कामकाज में शामिल हैं। इस दिशा में पहले कदम के रूप में, भारत सरकार ने 1 अप्रैल, 1963 से दिल्ली में एक केंद्रीय जांच ब्यूरो के गठन का फैसला किया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 21, 2020 10:10 am

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