राजपूतों के रौद्र रूप से बीजेपी सकते में

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ऐसा माना जा रहा है कि राजपूत समाज पिछले 5 वर्षों से भाजपा के प्रति पूर्ण वफादार रहने के बावजूद धीरे-धीरे कसमसाते हुए असंतोष की धीमी आंच में तप रहा था, लेकिन पिछले दिनों गुजरात में केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला के एक विवादास्पद बयान ने मानो वर्षों से जमे गुस्से को माचिस दिखाने का काम कर दिया। कहा जाता है कि कमान से निकला तीर और जुबान से निकली बात की तुलना करें तो, अक्सर जुबान की मार कहीं ज्यादा मारक साबित होती है। रुपाला के बयान ने ऐसा लगता है कि बरसों से अंदर घुट रहे गुस्से को दावानल में तब्दील करने वाली माचिस की तीली का काम कर दिया है।

इस घटना की शुरुआत 22 मार्च से होती है, जब राज्य सभा सांसद पुरषोत्तम रुपाला जो कि कड़वा पटेल समुदाय से आते हैं, ने एक दलित आयोजन में एक ऐसा बेसिरपैर वाला बयान दे डाला, जिसने भाजपा के पांव तले धरती हिला दी है। दलित समाज के वोटों पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए रुपाला कह बैठे कि, “पूर्ववर्ती राजाओं, महाराजाओं ने अंग्रेजों के साथ रोटी ही नहीं खाई बल्कि अपनी बेटियों तक का ब्याह उनके साथ कराया। लेकिन हमारे रुखी समाज (दलित समुदाय) जिन्हें सबसे ज्यादा अत्याचार झेलने पड़े, ने न अपना धर्म परिवर्तन किया और न ही वे ऐसे रिश्तों में बंधे।”

इस वीडियो को तो जल्द ही वायरल होना ही था, और वह हो भी गया, और सौराष्ट्र में पूर्ववर्ती शाही राजपरिवार के वंशजों से होते हुए यह गुस्सा देखते ही देखते विभिन्न क्षत्रिय संगठनों में तेजी से पसरने लगा। अगले 10 दिनों तक समूचे सौराष्ट्र क्षेत्र में हालत यह हो गई कि भाजपा को प्रभुत्वशाली राजपूत बिरादरी से जगह-जगह भारी विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि रुपाला ने अगले ही दिन अपने बयान पर यह कहकर माफ़ी मांग ली थी कि उनके कहने का आशय यह नहीं था, लेकिन इसके बावजूद वे अपने बयान पर बेहद शर्मिंदा हैं। पर क्षत्रिय समाज अपनी मांग पर अड़ा था कि भाजपा नेतृत्व पुरषोत्तम रुपाला को राजकोट लोकसभा की सीट की उम्मीदवारी से हटाए।  

भाजपा ने सोचा रुपाला से सार्वजनिक रूप से माफ़ी तो मंगवा ही ली है, क्षत्रिय समाज का गुस्सा दो-चार दिन में शांत हो जायेगा। दूसरा डर यह भी था कि केंद्रीय मंत्री रुपाला को यदि हटाया जाता है तो पटेल समुदाय भड़क सकता है। नतीजा यह हुआ कि राजकोट की सड़कों पर राजपूत समुदाय का विरोध-प्रदर्शन बढ़ता गया, और भीड़ से सिर्फ एक ही नारा गूंजता रहा कि रुपाला को लोकसभा चुनाव की रेस से बाहर करो। 

राज्य में पटेल भले ही भाजपा का दामन 2018 में तोड़कर अपना दम दिखा चुके थे, लेकिन राजपूत हमेशा से पार्टी के पीछे कतारबद्ध रहे थे। भाजपा के रणनीतिकार इस बार जमीनी हकीकत को कैसे नहीं पहचान सके, यह ज़रूर सोचने का विषय है। यही कारण है कि दो सप्ताह पूर्व जब प्रदर्शनकारी रुपाला के आवास के करीब उनका पुतला दहन कर रहे थे तो उनमें से तीन लोगों को गुजरात पुलिस ने हिरासत में ले लिया। नतीजा गुस्सा शांत होने की जगह और भड़क उठा और इसकी लपटें सौराष्ट्र सहित कच्छ तक फ़ैल गईं। 

आज गुजरात में जातीय समीकरण तलाशते हुए चुनावी समीक्षक बता रहे हैं कि गुजरात में तो राजपूतों की आबादी 17% है, जबकि सौराष्ट्र और कच्छ में तो ये जबर्दस्त प्रभाव तक रखते हैं। हालत यह है कि कड़वा पाटीदार समुदाय से आने वाले रुपाला साहब 29 मार्च को राजपूत समुदाय के नेताओं के समक्ष दोबारा सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांग चुके हैं। लेकिन राजपूत समाज भाजपा से उनकी उम्मीदवारी को वापस लेने या 7 मई को चुनाव में अपनी हार को झेलने को तैयार रहने की धमकी दे चुके हैं। 

राजपूत समाज ने रुपाला का पुतला दहन कार्यक्रम गुजरात के हर जिले में तय कर भाजपा के लिए मुसीबतों का नया पहाड़ खड़ा कर दिया है। उनका तर्क है कि चुनाव के बाद रुपाला फिर ऐसे बयान दे सकता है। अब खबर है कि भाजपा से जुड़े क्षत्रिय नेता भी पार्टी से नाता तोड़ रहे हैं। पिछले दिनों करणी सेना के एक धड़े के अध्यक्ष राज शेखावत भाजपा में टिकट वितरण में भेदभाव का आरोप लगाकर नाता तोड़ चुके हैं। क्षत्रिय नेता वासुदेव सिंह गोहिल के अनुसार उनका समुदाय चुनाव परिणाम बदलने की ताकत रखता है। उनका कहना है कि गुजरात में उनके समाज की संख्या 17% है और अकेले राजकोट में करीब 3 लाख राजपूत वोट हैं। इसके अलावा अन्य समुदाय के लोग भी उनके साथ खड़े हैं।  

कुछ ऐसा ही हाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है, हालांकि इसके मूल में यहां के क्षेत्रीय सवाल रहे हैं। लेकिन अब ठाकुर बिरादरी गुजरात के क्षत्रियों के साथ हुए अपमान के साथ खुद को जोड़कर इसे व्यापक स्वरुप देने की कोशिश में लगती है। पहले यह नाराजगी सरधना में भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम को मिली अप्रत्याशित हार की वजह बनी, जिसमें कहा गया कि हार की मुख्य जिम्मेदारी मुज़फ्फरनगर सांसद बालियान पर जाती है।

सुरेश राणा को मिली पराजय के पीछे भी उनके नाम को जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन यह बात तो पिछले दो वर्ष से फिजा में थी, और दबी जुबान से चर्चा हो रही थी। क्षत्रिय बिरादरी के पास मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह दो नाम थे।

लेकिन पिछले वर्ष 5 राज्यों में से तीन पर भाजपा की जीत के बाद जिस प्रकार तीनों राज्यों के संभावित पूर्व मुख्यमंत्रियों को दूध में गिरी मक्खी की तरह किनारे फेंक दिया गया था, उससे राजपूतों को विशेषकर वसुंधरा राजे सिंधिया को लेकर सवाल उठे। उससे भी अधिक इस अफवाह को बल मिला कि 2024 चुनाव जीतते ही उत्तर प्रदेश से योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड से पुष्कर सिंह धामी का भी यह अंजाम होना तय है। राजनाथ पहले ही अपनी हैसियत खो चुके हैं, और 2024 में तीसरी जीत के बाद उनकी जरूरत भी खत्म हो जाती है।

खुद को भारत में स्वाभाविक राजगद्दी के हकदार समझने वाली बिरादरी के लिए जीते जी इस प्रकार समूल नाश कल्पना से बाहर है। जबकि राजपूत समुदाय का मानना है कि 90 के दशक के बाद से उनका समाज भाजपा के पीछे मजबूती से खड़ा रहा है, जब इनका कोई नामलेवा तक नहीं था। ऐसा भी कहा जा रहा है कि 2014 में पार्टी ने 22 ठाकुर उम्मीदवारों को उत्तर प्रदेश में अपना उम्मीदवार बनाया था, जो 2019 में घटकर 16 लेकिन 2024 में यह संख्या 8 से अधिक होती नहीं दिख रही है। 

राजस्थान में राजपूत वोटों में बिखराव भाजपा के लिए बड़ी चोट 

पाकिस्तान की सीमा से सटे लोकसभा क्षेत्र बाड़मेर से मात्र 26 वर्ष के एक निर्दलीय उम्मीदवार रविन्द्र सिंह भाटी ने भाजपा की रातों की नींद हराम कर रखी है। एक साधारण परिवार की पृष्ठभूमि से आने वाले भाटी (राजपूत) के पिता स्कूल में शिक्षक हैं। 2019 में गुरु नारायण व्यास विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में जब इसे एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने चुनाव नहीं लड़ने दिया, तब इसने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर छात्र संघ का अध्यक्ष पद जीतकर सबको हैरत में डाल दिया था। पिछले वर्ष राज्य विधान सभा चुनाव में भी यही देखने को मिला। भाजपा से टिकट न मिलने पर शिव विधानसभा में पहली बार लड़कर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत अपने नाम की।  इस बार लोकसभा के लिए भी भाटी ने बाड़मेर से दावा ठोंका, जबकि पार्टी ने मौजूदा सांसद और केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी को ही अपना प्रत्याशी घोषित किया। 

मात्र 3 महीने पहले निर्दलीय विधायक बनने के बाद देश की संसद में जाने की इच्छा इस 26 वर्षीय युवा की नहीं थी, बल्कि इसके पीछे बाड़मेर, जैसलमेर की आम जनता का हाथ माना जा रहा है, जिन्हें पिछले 77 वर्षों से इस रेगिस्तानी क्षेत्र में सरकार से पानी, शिक्षा, रोजगार और रेल की आस थी। बिना पूंजी और पार्टी आधार होते हुए भी विधान सभा और लोकसभा का चुनाव कैसे जीता जा सकता है, रविन्द्र भाटी का राजनीतिक कैरियर भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अनोखी मिसाल पेश करने जा रहा है। हालत यह हो गई है कि भाजपा को अपनी साख बचाने के लिए स्वयं अपने सबसे बड़े स्टार प्रचारक पीएम नरेंद्र मोदी को शुक्रवार को मैदान में उतारना पड़ा। इसके साथ ही सुनने में आ रहा है कि उप-मुख्यमंत्री दिया सिंह को इस लोकसभा क्षेत्र की विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है। 

रविवार, 14 अप्रैल को गुजरात में राजपूतों की एक बड़ी महापंचायत का आयोजन किया गया है, जिसमें रविन्द्र सिंह भाटी की उपस्थिति सबके बीच मुख्य आकर्षण का केंद्र रहने वाली है। भाटी के सितारे किस कदर बुलंद हैं, इसका अंदाजा दिल्ली के स्टूडियो में बैठकर नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन भाजपा अवश्य इस खतरे को भांप रही है। 

राजस्थान में ऊंट तेजी से करवट बदल रहा है 

2019 में यहां से भाजपा को सभी 25 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, और अधिकांश लोकसभा क्षेत्रों में तो जीत का अंतर 2 लाख या उससे अधिक का था। फिर पिछले वर्ष ही भाजपा ने अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को राज्य में धूल चटाई थी। फिर अचानक से राजनीतिक समीकरण कैसे बिगड़ गये, इसे लेकर राजनीतिक पंडित भारी उलझन में हैं। असल में 5 राज्यों के चुनाव के बाद जिस प्रकार से केंद्र की मोदी सरकार ने पूरी तरह से निरंकुश तानाशाही दिखाते हुए तीनों राज्यों में बिना आधार वाले मुख्यमंत्रियों के हाथ में सत्ता की कमान सौंपी है, उससे बहुसंख्यक लोग सख्त नाराज हैं। उनको लगता है कि देश की कमान तो हमने मोदी जी को लगातार दो बार सौंप दी, लेकिन राज्यों में अगर जिम्मेदार एवं कुशल मुख्यमंत्री की जगह भी मोदी नौकरशाहों के जरिये ही केंद्र से सत्ता चलाएंगे तो जमीन पर हमारे काम ही नहीं होंगे। इसके अलावा, भाजपा के भीतर क्या कार्यकर्ता, क्या विधायक और क्या सांसद, सभी हुक्म के गुलाम बनते चले जा रहे हैं। 

गुजरात की घटना से खासकर राजस्थान और उत्तर प्रदेश के राजपूतों में भारी असंतोष पनपा। लेकिन दोनों राज्यों में उचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने को लेकर एक अर्से से असंतोष धीरे-धीरे पनप रहा था। कोलायत से आठ बार विधायक रह चुके पूर्व भाजपा नेता, देवी सिंह भाटी भी भाजपा पर राजपूतों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगा रहे हैं। उनका साफ़ कहना है कि राजपूतों ने हर बार भाजपा के पक्ष में एकतरफा वोट किया है, लेकिन पार्टी उनकी संख्या के अनुपात में लोकसभा, विधानसभा और मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व नहीं दे रही है। 

उत्तर प्रदेश में राजपूत बिरादरी के बीच बढ़ता असंतोष 

ऐसा कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर तक ठाकुरों का पत्ता साफ़ कर दिया है। गाजियाबाद लोकभा सीट पर लगातार दो बार रिकॉर्ड 5 लाख से ज्यादा वोटों से जीतने वाले जनरल वीके सिंह का टिकट काटे जाने से समुदाय आहत है। उन्हें यकीन था कि वीके सिंह की जगह भी किसी क्षत्रिय उम्मीदवार को ही यह सीट दी जायेगी, क्योंकि पिछले दो दशक से यह सीट ठाकुर उम्मीदवार ही जीतते आ रहे थे। 

गाजियाबाद लोकसभा सीट में सबसे अधिक 5.7 लाख राजपूत, 5.5 लाख मुस्लिम, 4.5 लाख ब्राह्मण, 2.5 लाख बनिया, 4.5 लाख अनुसूचित जाति, 1.25 लाख जाट, 1 लाख पंजाबी, 75 हजार त्यागी और 70 हजार गुर्जर मतदाता हैं। राजपूतों के मन में यह बात घर करती जा रही है कि नरेंद्र मोदी ने क्षत्रिय समुदाय को हर हाल में अपना वोटबैंक समझ लिया है। पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया में इस बात की भी चर्चा बड़े जोरों पर है कि 2024 में भी यदि नरेंद्र मोदी 300+ सीट पाने में सफल रहते हैं तो यूपी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पत्ता उसी तरह साफ़ हो जायेगा, जैसे राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और हाल ही में हरियाणा में देखने को मिला है।  

योगी आदित्यनाथ और जनरल वीके सिंह के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ठाकुरों में यह बात घर कर चुकी है कि पिछले विधानसभा चुनावों में सरधना से भाजपा विधायक रह चुके संगीत सोम और सुरेश राणा की हार के पीछे की वजह पार्टी के भीतर भितरघात थी। ठाकुरों में मुज़फ्फरनगर सांसद संजीव बालियान के खिलाफ गुस्सा एक जगजाहिर बात है, और गुजरात में रुपाला की तरह यूपी में संजीव बालियान को हराना उनकी पहली प्राथमिकता पर है। इसके अलावा, केंद्र में सबसे वरिष्ठ सांसद राजनाथ सिंह के साथ हो रही लगातार उपेक्षा और उनकी सीमित भूमिका के मद्देनजर समूचे उत्तर भारत के क्षत्रियों की आशा और उम्मीद के केंद्र में योगी आदित्यनाथ बने हुए हैं। 

लेकिन उनके साथ भी मेरठ में दुर्व्यवहार की खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि इस गलती को जल्द ही अगली रैली में सुधार लिया गया, लेकिन आम लोगों के मन में यह बात बैठ चुकी है कि हो न हो यह सब लोकसभा चुनाव तक ही दिखावे के लिए किया जा रहा हो। 

इस बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो-दो महापंचायत हो चुकी हैं, जिसमें आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का बहिष्कार करने की अपील, वोट न देने की सौगंध खाई जा रही हैं। इसकी आंच पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी पहुंच रही है, लेकिन वहां पर क्षत्रिय बिरादरी ने अभी तक खुलकर अपना विरोध नहीं जताया है। ऐसा कहा जा रहा है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में चुनाव अंतिम चरण में होने जा रहे हैं, इसलिए सबसे पहले उन क्षेत्रों में राजपूत समाज को एकजुट किया जा रहा है, जहां पहले और दूसरे चरण में मतदान होना है। 

भाजपा आलाकमान की नाकाम कोशिशें और विपक्ष 

भाजपा नेतृत्व की ओर से इस विद्रोह को तेजी से शांत करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास जारी है। पार्टी और संघ से जुड़े तमाम क्षत्रिय जाति के नेताओं को इस काम पर लगाया जा चुका है, जिसमें राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ और दिया कुमारी प्रमुख हैं। पिछले दस वर्षों से भाजपा-संघ के दोनों हाथों मंडल-कमंडल की फसल के लड्डू थे, और वह मजे से हिंदुत्व के एजेंडे के साथ-साथ असल में बड़ी इजारेदार पूंजी के हितों में मनमानेपूर्ण फैसले लेती जा रही थी।

सारी मेहनत के बावजूद, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने महसूस किया कि अपने खोये आधार को हासिल करने के लिए उन्हें अब स्पष्ट रूप से बहुसंख्यक आम भारतीय की जमीनी मांगों को आगे करना होगा, तो भाजपा ने ओबीसी के बीच अपने आधार को बचाने के लिए विधान सभा और लोकसभा में पिछड़ों के प्रतिनिधित्व को इस स्तर तक पहुंचा दिया कि अब अगड़ों को तकलीफ होने लगी है। 

शक्ति-संतुलन को बनाये रखने और एक साथ सभी को साधने या कहें सबको बेवकूफ बनाना, इतिहास में न पहले ही कभी संभव था, न भविष्य में संभव होने जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि, भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए आगे की राह कितनी आसान-फिसलन भरी होने जा रही है?

क्योंकि विपक्षी नेता राहुल गांधी, जिस प्रकार एक ही धुन पर हर सार्वजनिक मंच से सामाजिक-आर्थिक न्याय की मांग को दोहरा रहे हैं, और समाज के सभी तबकों के विक्षुब्धों को हर हाल में न्याय दिलाने के लिए एक्सीलरेटर पर अपने पांव का दबाव बढ़ाते जा रहे हैं, वह भाजपा को गलती पर गलती करने के लिए मजबूर करेगा। ऐसे में, निश्चित है कि भाजपा को अपने असली स्वरूप में देश के समक्ष आना ही होगा, और असली रंग 140 करोड़ भारतीयों के सामने बेनकाब हो, किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की यही पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।       

(रविंद्र पटवाल लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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