Sunday, November 28, 2021

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कमंडल पर मंडल की राजनीति के शिकार हो गये रविशंकर प्रसाद

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जो भी बिहार और झारखंड की राजनीति से थोड़ा भी परिचित है, उसे दो साल पहले राजद छोड़ कर भाजपा में आई अन्नपूर्णा देवी के मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने को लेकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। बंगाल के विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय से भाजपा और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी किसी भी कीमत पर 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव फिर 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कमंडल के साथ मंडल यानि ओबीसी को बढ़ावा देने की राजनीति पर उतर आये हैं और यूपी बिहार में सबसे प्रभावशाली ओबीसी जाति यादवों को लुभाने के लिए भूपेन्द्र यादव को न केवल अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया बल्कि बिहार की राजनीति में भूपेन्द्र यादव और नित्यानंद राय की आंख की किरकिरी बने रविशंकर प्रसाद को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया।   

राजनीतिक गलियारों में भले ही कानून और आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद को मंत्रिमंडल से बहार निकालने को ट्विटर बनाम सरकार की लड़ाई और प्रकारांतर से अमेरिका की नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा हो पर हकीकत में इसमें आग में घी डालने का काम भूपेन्द्र यादव ने किया है जो बिहार विधानसभा चुनाव के समय पार्टी की ओर से चुनाव रणनीति का काम देख रहे थे और नित्यानंद राय को आगे करके यादवों के एक वर्ग का वोट भाजपा की ओर खींचने में सफल रहे थे। लेकिन रविशंकर प्रसाद को पैदल करके प्रधानमन्त्री ने बिहार और यूपी के कायस्थों को श्रीहीन कर दिया है, जिसका खामियाजा अगले चुनाओं में भाजपा को यूपी और बिहार में उठाना पड़ सकता है।

बिहार में पिछले दो तीन दशक से यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा और रविशंकर प्रसाद भाजपा में कायस्थ समुदाय का प्रतिनिधत्व करते रहे हैं, परन्तु नरेंद्र मोदी ने 75 वर्ष उम्र के फार्मूले से यशवंत सिन्हा को टिकट नहीं दिया, ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं गई कि शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा से बाहर चले गये और अब मंत्रिमंडल के फेरबदल में रविशंकर प्रसाद खेत रहे। यही नहीं रविशंकर प्रसाद के बाहर होने से लालकृष्ण आडवाणी खेमे का आखिरी विकेट भी ढह गया।

बिहार की कायस्थ राजनीति समझने के लिए आजादी से पहले चलना पड़ेगा। बिहार प्रांत के गठन में सच्चिदानंद सिन्हा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वह जब इंगलैंड में अपनी वकालत की पढ़ाई कर रहे थे तो अनेक लोगों ने उनसे कहा कि बिहार नाम का कोई प्रांत इंडिया में नहीं है। यह बात उन्हें बहुत बुरी लगी। इंग्लैंड से वापस आ कर उन्होंने आंदोलन छेड़ा कि बिहार अलग प्रांत बने और लोगों ने भी उनकी मदद की। उस समय बिहार का मतलब आज का गया जिला होता था।

यह केवल संयोग ही है कि सूबा बिहार को बंगाल से जोड़ दिया गया था। मुगल काल के बाद जब इंगलिशिया राजपाट बना तो आज का बिहार या पटना बंगाल के साथ ही था। तब बिहार का प्रशासन सदी 1700 के आस पास सिताब राय इंगलिशिया राजपाट की तरफ से देखते थे। सिताब राय भी कायस्थ थे और सच्चिदानंद सिन्हा भी कायस्थ थे। हिंदुस्तान के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी कायस्थ थे। सच तो यह भी है कि संविधान सभा के वह पहले अध्यक्ष थे, तब उन्हें अंतरिम अध्यक्ष भी माना गया। 1950 में उनकी मृत्यु के बाद बिहार के राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। वह भारत के लोकतंत्र बनने के पहले ही राष्ट्रपति चुन लिए गए 26 जनवरी 1950 को और एकमात्र राष्ट्रपति हैं जिनका कार्यकाल 14 मई 1962 तक रहा यानी दो बार या तीन बार। वह भी कायस्थ थे।

जयप्रकाश नारायण भी कायस्थ थे। ऐसी स्थिति में बिहार के कायस्थों के मन में राजपाट की ललक कोई चौंकाने वाली बात भी नहीं है। हालांकि जयप्रकाश नारायण राजपाट से दूर रहे फिर भी वर्ष 1977 में सभी विपक्षी दलों को मिलाकर जनता पार्टी के गठन और आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पराजय के बाद पहली गैर कांग्रेस सरकार के गठन का श्रेय जयप्रकाश नारायण को ही है।

पढ़ाई, लिखाई में आगे रहने के बावजूद कायस्थ समुदाय यह नहीं समझ पाया कि लोकतंत्र में विद्वता से अधिक महत्वपूर्ण है वोट की ताकत। इंगलिशिया सरकार ने कायस्थों को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया। कायस्थ भी वकील बनने में ही अपना लक्ष्य मानते थे। वोट की ताकत को उन्होंने महत्व नहीं दिया। देते भी क्यों 1952 के विधान सभा के चुनाव में उनकी सदस्य संख्या 40 थी। यह लगातार घटती गई। 2010 के विधान सभा चुनाव में घट कर 4 हो गई।

यह भी मात्र संयोग नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी ने कायस्थों के महत्व को समझा। वोट की राजनीति में संख्या बल में कम होने के बावजूद शिक्षित वर्ग में कायस्थों का अपना महत्व रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में कायस्थ शामिल हो रहे थे। उनके मन में यह हीन भाव था कि बुद्धिबल में तेज होने के बावजूद वोट बल में कमजोर होने के कारण वो बल में प्रभावशाली लोग उन्हें सत्ता की राजनीति में आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं। वोट बल में उनका पहला मुकाबला सवर्ण समुदाय की अन्य समुदायों से ही हुआ।

बिहार में  कृष्णवल्लभ सहाय ने अपनी चतुराई से 1963 में मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया था। उसे हासिल करने में उन्हें सवर्ण समुदाय के राजपूतों की मदद मिली। उस वक्त कांग्रेस विधायक दल में उनका सामना पिछड़े नेता बीरचंद पटेल (कुर्मी) से था। मुख्यमंत्री बनने के बाद कृष्णवल्लभ सहाय ने पिछड़े समुदाय के संख्या बल में अधिक यादव समुदाय के रामलखन सिंह यादव को आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि कृष्णवल्लभ सहाय तब तक बिहार के सबसे अच्छे प्रशासनिक मुख्यमंत्री थे। लेकिन उसी काल में राममनोहर लोहिया का गैर कांग्रेसवाद बिहार में तेजी पर था और 1967 के चुनाव में उनकी हार हो गई। बिहार के संयुक्त विधायक दल ने भी बिहार की सवर्णवाद की नीति के कारण महामाया प्रसाद सिन्हा को अपना नेता चुना और वह मुख्यमंत्री बने। यह कायस्थों का आखिरी बड़ा ओहदा था।

महामाया मंत्रिमंडल में उद्योग विभाग के मंत्री ठाकुर प्रसाद थे। उनके पुत्र रविशंकर प्रसाद हैं जो नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल से बाहर कर दिए गये हैं। यशवंत सिन्हा किसी काल में (1977) मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के प्रधान सचिव थे। बाद में वह चंद्रशेखर के करीबी हो गए और जनता पार्टी के रास्ते भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने एक वक्त में उन्हें बिहार में नेता, प्रतिपक्ष भी बनाया था। अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में वह भी महत्वपूर्ण मंत्री रहे और मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में उनके पुत्र जयंत सिन्हा वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री थे, लेकिन मोदी-2 में जयंत सिन्हा को मंत्री नहीं बनाया गया।

शत्रुघ्न सिंन्हा एक वक्त में बिहार के इकलौते फिल्म स्टार थे। अटल सरकार में मंत्री पद पर भी थे। एक और पत्रकार से अरबपति बने रवीन्द्र किशोर सिन्हा ने बिहार में सुऱक्षा एजेंसी की शुरुआत की। राज्य सभा सदस्य थे।

बिहार में कायस्थ सवर्ण समुदाय में माने जाते हैं। मंडल आयोग के बाद जिस नौकरियों पर उनका अधिकार था, वह भी छिनने लगा। यह भी उनकी गलतफहमी ही थी। तथ्य यह था कि सवर्ण समुदाय के अन्य वर्गों ने ही उन्हें पीछे धकेल दिया था। वह अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर सवर्णों के अन्य समुदाय का मुकाबला नहीं कर सकते थे।

मोदी सरकार में नए मंत्रियों की एंट्री से ज्यादा मंत्रियों की छुट्टी ज्यादा चर्चा का विषय रही। कुल मिलाकर 12 मंत्रियों को मोदी मंत्रिमंडल से बाहर किया गया है। सूचना-प्रसारण मंत्री और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से भी इस्तीफा ले लिया गया। सरकार के प्रवक्ता होने के नाते जावड़ेकर और उनके मंत्रालय की जिम्मेदारी थी कि वह कोरोना काल में सरकार की इमेज सही करने के लिए कदम उठाएं लेकिन उनका मंत्रालय इसमें असफल रहा।

हेल्थ मिनिस्टर डॉ. हर्षवर्धन को भी मोदी मंत्रिमंडल से हटाया गया है। इसकी चर्चा काफी दिनों से चल रही थी और कोरोना की दूसरी लहर में मिसमैनेजमेंट को लेकर हेल्थ मिनिस्टर लगातार विपक्ष के निशाने पर भी थे। हॉस्पिटल बेड की कमी, ऑक्सीजन की कमी और दिक्कतों से निपटने में हेल्थ मिनिस्टर का एक्टिव ना दिखना उनके जाने की वजह बना।

शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का भी इस्तीफा लिया गया है। उनका खराब स्वास्थ्य इसकी वजह बताई जा रही है। लेबर मिनिस्टर संतोष गंगवार को भी मोदी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। कोरोनाकाल में प्रवासी मजदूरों की दिक्कतों को सही से डील न करने को लेकर लेबर मिनिस्ट्री सवालों के घेरे में थी। केमिकल और फर्टिलाइजर मिनिस्टर सदानंद गौड़ा को भी हटाया गया है और इसके पीछे कर्नाटक में सरकार के भीतर चल रही उथल पुथल भी एक वजह बताई जा रही है।

पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी के परफॉरमेंस की वजह से राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो और देबाश्री चौधरी की मंत्रिमंडल से छुट्टी हुई। मंत्री होने के बावजूद बाबुल सुप्रियो विधानसभा सीट भी नहीं जीत पाए। उनके कुछ बयानों ने भी पार्टी की किरकिरी की। देबाश्री चौधरी भी बंगाल चुनाव में असरदार साबित नहीं हुई। थावरचंद गहलोत को मंत्री पद से हटाकर कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है और इसके पीछे उनकी उम्र को वजह बताया गया। राज्यमंत्री संजय धोत्रे को स्वास्थ्य वजह से इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा रतनलाल कटारिया, प्रताप सारंगी को भी मंत्रिमंडल से हटाया गया। उनके रिपोर्ट कार्ड को इसका आधार बनाया गया।

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में कमंडल पर मंडल भारी रहा। पिछड़ा वर्ग से 15 राज्यों के 19 समुदाय के 27 मंत्रियों को शामिल किया गया। जिनमें से 5 को कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। अनुसूचित जाति के 12 मंत्रियों को शामिल किया गया। जो बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान और तमिलनाडु से आते हैं। इनमें रामदासिया, खटीक, पासी, कोरी, मादिगा, महार, अरुनदथियार, मेघवाल, धंगार जातियां शामिल हैं। अनुसूचित जनजाति के 8 मंत्रियों को शामिल किया गया। जो अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और असम से आते हैं। इनमें गोंड, संथाल, मिजी, मुंडा, टी ट्राइब, कोकाना, सोनोवाल जनजातियां शामिल हैं।

बंगाल की करारी हार ने भाजपा को भीतर से झकझोर दिया है। भाजपा को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पराजय दिख रही है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को यूपी से 80 में 74 सीटें मिलीं थी जिसकी बदौलत भाजपा ने लोकसभा  में अपने दम पर बहुमत लिया था। यदि इनमें से 50 सीटें ,पश्चिम बंगाल से मिली 18 सीटों में से 15-16 सीटें और बिहार में भाजपा और जदयू को मिली 18-18 सीटों में से 20 सीटें कम हो गयीं तो 2024 में केंद्र में भाजपा सरकार बनना लगभग असम्भव हो जायेगा, क्योंकि अन्य राज्यों में भी भाजपा की सीटें बढ़ेंगी नहीं बल्कि कम ही होंगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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