50 फीसद से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, मराठा आरक्षण असंवैधानिक

उच्चतम न्यायालय ने मराठा आरक्षण पर फैसला देते हुए कहा है कि आरक्षण के लिए 50 फीसद की तय सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा कि मामले में इंदिरा साहनी केस पर आया फैसला सही है, इसलिए उसपर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस रवींद्र भट की 5-जजों वाली पीठ ने 10 दिनों की लगातार सुनवाई के बाद 26 मार्च को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस नागेश्वर राव, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस रवींद्र भट ने मामले में निर्णय दिया।

संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में 50 फीसद की सीमा पार करके आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। संविधान पीठ ने अपने फैसले में यह भी साफ कर दिया कि मराठा समुदाय के लोग शैक्षिक और सामाजिक तौर पर इतने पिछड़े नहीं हैं कि उन्हें आरक्षण के दायरे में लाया जाए।

उच्चतम न्यायालय में बंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें महाराष्ट्र के शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठाओं के लिए आरक्षण के फैसले को बरकरार रखा था। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा लांघी नहीं जा सकती है।

इंदिरा साहनी मामले पर लंबी सुनवाई में दायर उन हलफनामों पर भी गौर किया गया कि क्या 1992 के इंदिरा साहनी फैसले, जिसे मंडल फैसला भी कहा जाता है, पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की जरूरत है, जिसमें आरक्षण की सीमा 50 फीसदी निर्धारित की गई थी। जस्टिस भूषण ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि इसकी जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जहां तक बात संविधान की धारा 342ए का सवाल है तो हमने संविधान संसोधन को बरकरार रखा है और यह किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं करता है।

गौरतलब है कि देश की संसद ने संविधान संसोधन के जरिए आर्टिकल 342ए जोड़ा है। इसमें प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति किसी राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश के किसी समुदाय को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की मान्यता दे सकते हैं। साथ ही कहा गया है कि संसद भी कानून बनाकर किसी समुदाय को सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों की सूची में शामिल कर सकता है या निकाल सकता है।

संविधान पीठ ने मामले में सुनवाई 15 मार्च को शुरू की थी। बंबई हाईकोर्ट ने जून 2019 में कानून को बरकरार रखते हुए कहा था कि 16 फीसदी आरक्षण उचित नहीं है और रोजगार में आरक्षण 12 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए तथा नामांकन में यह 13 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए।

संविधान पीठ ने कहा कि राज्यों को शिक्षा को बढ़ावा देने और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए संस्थानों की स्थापना के लिए और कदम उठाने चाहिए क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है। इस उद्देश्य के लिए राज्यों द्वारा कई अन्य काम किए जा सकते हैं तो अन्य चीजें क्यों नहीं की जा सकतीं, शिक्षा को बढ़ावा देने और अधिक संस्थानों की स्थापना क्यों नहीं हो सकती? कहीं न कहीं इस मैट्रिक्स को आरक्षण से आगे बढ़ना चाहिए। सकारात्मक कार्रवाई सिर्फ आरक्षण नहीं है।

गौरतलब है कि संविधान पीठ ने पूछा था कि कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा? सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा हटाए जाने की स्थिति में पैदा होने वाली असमानता को लेकर भी चिंता प्रकट की। महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने संविधान पीठ से कहा कि कोटा की सीमा तय करने पर मंडल मामले में फैसले पर बदली हुई परिस्थितियों में पुनर्विचार करने की जरूरत है।

संविधान पीठ के मुताबिक मराठा समुदाय शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण नहीं दिया जा सकता। पांच जजों की संविधान पीठ ने चार अलग-अलग फैसला दिया है, लेकिन सभी ने माना कि मराठा समुदाय को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरक्षण सिर्फ पिछड़े वर्ग को दिया जा सकता है। मराठा इस कैटेगरी में नहीं आते। संविधान पीठ ने कहा कि जस्टिस गायकवाड कमिशन और हाईकोर्ट दोनों ने असाधारण स्थिति में आरक्षण दिए जाने की बात की है, लेकिन दोनों ने नहीं बताया कि मराठा आरक्षण में असाधारण स्थिति क्या है।

संविधान पीठ ने मामले में सुनवाई 15 मार्च को शुरू की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने जून 2019 में कानून को बरकरार रखते हुए कहा था कि 16 फीसदी आरक्षण उचित नहीं है और रोजगार में आरक्षण 12 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और नामांकन में यह 13 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य में शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठाओं के लिए आरक्षण के फैसले को बरकरार रखा था।

केंद्र ने उच्चतम न्यायालय  से कहा था कि महाराष्ट्र के पास मराठाओं को आरक्षण देने की विधायी क्षमता है और इसका निर्णय संवैधानिक है, क्योंकि 102वां संशोधन किसी राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की सूची घोषित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता।

उच्चतम न्यायालय में केंद्र की ओर से दलील दी गई है कि महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को रिजर्वेशन देने का फैसला संवैधानिक है और संविधान के 102 वें संशोधन से राज्य के विधायी अधिकार खत्म नहीं होता है। कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने भी आरक्षण को लेकर महाराष्ट्र जैसा ही रुख अपनाया। दरअसल आरक्षण ने तुष्टिकरण का रूप ले लिया है।

This post was last modified on May 5, 2021 8:06 pm

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