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झारखंड में धर्मांतरण के मुद्दे को हवा देने में जुटे भाजपा व संघ

झारखंड की राजधानी रांची से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रांची जिले के ही ओरमांझी थाने का गगारी गांव आजकल सुर्खियों में है। यह गांव तब सुर्खियों में आया, जब महज तीन पंक्तियों का एक खत वायरल हुआ। यह खत गांव के कई ग्रामीणों को ग्रामीणों के द्वारा ही दिया गया। यह खत एक बैठक की सूचना से संबंधित था, जिसमें बैठक बुलाने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था। इस बेनामी खत में लिखा हुआा था कि ‘‘महाशय, आपको सूचित किया जाता है कि ग्राम गगारी, छप्पर टोला में एक आवश्यक बैठक दिनांक- 27/09/2020, दिन- रविवार, समय- प्रातः 10:30 बजे, स्थान- हनुमान मंदिर के पास रखा गया है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य धर्मांतरण को लेकर विचार-विमर्श किया जाएगा। अतः इस बैठक में आपका उपस्थिति होना अनिवार्य है।’’

इस खत के वायरल होने के बाद स्थानीय मीडिया का ध्यान इस गांव ने खींचा और मामले की पड़ताल शुरू हुई। स्थानीय मीडिया में आयी खबरों के अनुसार इस गांव के बेदिया (अनुसूचित जनताति) व नायक (अनुसूचित जाति) जाति के 8-10 युवकों ने ईसाई धर्म वर्षों पहले स्वीकार कर लिया था। ग्रामीणों को अभी इस बात की जानकारी हुई, तो वे ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके लोगों को वापस अपने सरना धर्म व हिन्दू धर्म में लाने के लिए दबाव डाल रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि गांव के ही मजेन्द्र नायक (जिसने 10 वर्ष पहले ही ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था) ने लोभ देकर व बहला-फुसलाकर इन सभी को ईसाई बनाया है।

वहीं ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके लोगों का कहना था कि गांव वालों ने उन सबका सामाजिक बहिष्कार कर दिया है और 13 व 20 सितंबर को ग्रामीणों ने ग्राम बैठक में बुलाकर उनके साथ मार-पीट की है और साथ ही वो सभी जमीन से बेदखल करने की धमकी भी दे रहे हैं। इस बाबत ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके लोगों ने रांची एसएसपी को आवेदन देकर धार्मिक प्रताड़ना का आरोप भी गांव वालों पर लगाया है, जिसमें इन्होंने लिखा है कि उन्होंने स्वेच्छा से ईसाई धर्म स्वीकार किया है। इन सभी ने ग्रामीणों से अपने जान-माल को खतरा बताते हुए सुरक्षा की भी गुहार लगायी है।

यह मामला तब और भी सुर्खियों में आया, जब 28 सितंबर को भाजपा से जुड़े मेघा उरांव, जो झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति और उरांव जनजाति धर्म संस्कृति रक्षा मंच के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, ने अपने लाव-लश्कर के साथ गांव का दौरा किया और कथित ईसाई धर्म प्रचारक मजेन्द्र नायक को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की मांग की। मालूम हो कि यही मेघा उरांव अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के वक्त सरना स्थल की मिट्टी लेकर गया था, जिस पर काफी विवाद हुआ था और इस पर सरना स्थल से मिेट्टी चोरी करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करने तक की कार्रवाई भी हुई थी।

कुछ लोग बताते हैं कि ये आरएसएस व विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े हुए हैं। मेघा उरांव के गगारी जाने के बाद तो तथाकथित धर्म रक्षक संगठनों का आने का एक सिलसिला ही शुरु हो चुका है, जिसके तहत 29 सितंबर को भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष आरती कुंजूर  व आदिवासी सरना 22 पड़हा समिति, सदमा के बाबूलाल महली भी अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचे और ग्रामीणों को धर्मांतरण करने वाले लोगों की घर वापसी के लिए प्रेरित किये। साथ ही प्रशासन से मजेन्द्र नायक की गिरफ्तारी की मांग भी किये।

गगारी गांव 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 का महान किसान विद्रोह) के महान शहीद जीतराम बेदिया के गांव के नाम से जाना जाता है। शहीद जीतराम बेदिया के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने अत्याचारी अंग्रेजों, उनके दलालों, जमींदारों, साहूकारों और सूदखोर-महाजनों के अंतहीन शोषण के खिलाफ आवाज उठायी थी। जीतराम बेदिया के साथ टिकैत उमरांव सिंह व शेख भिखारी जैसे योद्धाओं ने अपने परम्परागत हथियारों से छापामार युद्ध के तहत अंग्रेजी सेना के नाक में दम कर दिया था। बाद में अंग्रेजों ने टिकैत उमरांव सिंह व शेख भिखारी को 8 जनवरी 1858 को चुटूपालू घाटी (रामगढ़) में बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी। उसके बाद भी जीतराम बेदिया के नेतृत्व में स्थानीय किसानों ने छापामार युद्ध को जारी रखा।

अंग्रेजों की सेना के पास आधुनिक हथियार, रायफल, बंदूक, गोला-बारूद थे, तो छापामार योद्धाओं के पास परंपरागत हथियार के नाम पर तीर-धनुष, गुलेल, तलवार, बरछा और गंड़ासा थे। अंततः 23 अप्रैल, 1858 को गगारी और खटंगा के बीच में जीतराम बेदिया व अंग्रेजों की सेना आमने-सामने हो गयी, जिसमें दोनों तरफ से कई लोग हताहत हुए। जीतराम बेदिया व उनके घोड़े को भी गोली लगी और वे भी शहीद हो गये। अंग्रेजों ने शहीद जीतराम बेदिया को घोड़ा समेत एक खाई में डालकर ऊपर से मिट्टी भर दिया।

आज भी शहीद जीतराम बेदिया की प्रतिमा कंधे पर तीर-धनुष व हाथ में तलवार लिए हुए गगारी गांव में प्रवेश करते ही दायीं तरफ एक खेत में स्थित है। दिन के लगभग दो बज रहे थे, जब मैं गगारी गांव के छप्पर टोली पहुंचा। उस समय यहां पर धनेश्वर बेदिया के दुकान के सामने इमली के पेड़ के नीचे लगभग 10 कुर्सियों पर कुछ महिला-पुरुष बैठे हुए थे और लगभग 50-60 ग्रामीण महिला-पुरुष जमीन पर बैठे हुए थे या फिर खड़े थे। मेरे पहुंचते ही कुर्सी पर बैठे सभी लोग खड़े हो गये और ग्रामीणों से पुनः मिलने का वादा करके निकल गये। ग्रामीणों ने बताया कि ये सभी सदमा गांव के आदिवासी सरना 22 पड़हा समिति के लोग थे, जो धर्मांतरण से आहत होकर उन लोगों को समझाने व ग्रामीणों को समर्थन करने आये थे।

मैंने ग्रामीणों से पूरा मामला जानना चाहा। इस समय यहां पर धर्मांतरण का विरोध कर रहे ग्रामीण ही मौजूद थे, जिसमें लालू बेदिया, गोवर्धन बेदिया, महावीर बेदिया, जितेन्द्र बेदिया, लक्ष्मण गंझू समेत लगभग 40-50 महिला-पुरुष शामिल थे। गगारी गांव में 4 टोला है, जिसमें बेदिया व उरांव (अनुसूचित जनजाति), गंझू, नायक व लोहरा (अनुसूचित जाति) व महतो जाति के लोग रहते हैं। इस गांव में बेदिया 130 परिवार, नायक 25 परिवार, गंझू 5 परिवार, उरांव 20 परिवार, लोहरा 6 परिवार व महतो 30 परिवार रहते हैं। वहां पर उपस्थित ग्रामीणों के अनुसार, मजेन्द्र नायक पहले छप्पर टोली में रहता था, अभी दूसरे टोला में रहता है। उनकी मां साड़ूबेड़ा के आरा कोलियरी में काम करती थी और उधर ही इनके पूरे परिवार ने लगभग 10 वर्ष पूर्व इसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, लेकिन ग्रामीणों को कभी भी इनके धर्म परिवर्तन से कोई परेशानी नहीं हुई।

कुछ दिनों पहले गांव के कुछ युवाओं ने एक घर में कई महिला-पुरुष को रात में काफी देर देखा, तो उनसे पूछताछ किया, तो उन लोंगों ने पढ़ाई का बहाना कर लिया, जबकि ये लोग पढ़े-लिखे भी नहीं थे। तब जाकर गांव वालों ने इन लोगों की निगरानी करना शुरु किया तो पता चला कि 10 युवाओं के साथ-साथ कइयों के परिवार के कई सदस्यों ने भी 2-3 साल पहले ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है, लेकिन ये अपने पूर्व के परंपरागत अनुष्ठान भी किया करते थे, इसलिए किसी को इनके धर्म परिवर्तन की जानकारी नहीं हो पायी।

13 व 20 सितंबर को धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों के साथ मार-पीट व सामाजिक बहिष्कार के बारे में पूछने पर वहां पर मौजूद ग्रामीणों ने बताया कि ‘‘यह सब झूठ है। गांव में प्रत्येक रविवार को ग्रामीणों की बैठक होती है। जब यह मामला सामने आया, तो उसी बैठक में बुलाकर उन्हें हम लोग समझाने का प्रयास किये थे कि हमारे समाज को छोड़कर मत जाइये। जब वे लोग नहीं माने, तब गांव की पूजा समिति के जरिये एक सूचना खत के रूप में देकर 27 सितंबर को बैठक बुलाये। निवेदक में पूजा समिति का नाम इसलिए नहीं डाले कि सभी ग्रामीण जानते हैं कि गांव में एक पूजा समिति है और वही गांव में बैठकों को बुलाती है। (इस गांव में पहाड़ पर एक शिव मंदिर है, जहां सावन में मेला लगता है, इसे संचालित करने के लिए ही ‘पूजा समिति’ है) 27 सितंबर की बैठक में वे लोग आये ही नहीं और एसएसपी से ग्रामीणों की शिकायत भी कर दिये।

आज भी सुबह में ओरमांझी थाना की पुलिस ग्रामीण महावीर बेदिया, लक्ष्मण गंझू, निर्मल बेदिया, असराम बेदिया आदि को खोजने गांव आयी थी। जब ये लोग पुलिस के सामने गये, तो दारोगा ने कहा कि आप लोगों की शिकायत आयी है कि धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को आप लोग धमका रहे हैं, लेकिन इन लोगों ने ऐसी किसी भी बात से इनकार कर दिया।’’

वहां पर मौजूद ग्रामीणों का सामाजिक बहिष्कार पर एक मत था कि ऐसा हर जाति व समाज में होता है, जो समाज की बात नहीं मानेगा, उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि अभी उन लोगों का सामाजिक बहिष्कार नहीं किया गया है, लेकिन एक महीना का समय जरूर दिया गया है। अगर एक महीना के अंदर वे लोग ईसाई धर्म को नहीं छोड़ते हैं, तो सामाजिक बहिष्कार भी किया जाएगा।

जमीन से बेदखल करने की धमकी के आरोप पर वहां मौजूद ग्रामीण बताते हैं कि ‘‘बेदिया समाज का नियम है कि अगर कोई दूसरे धर्म में चला गया, तो वह अब बेदिया नहीं रहा। इस स्थिति में उसे पुश्तैनी जमीन में हिस्सा नहीं मिलेगा। यह बेदिया समाज का नियम है।’’

जिस दुकान के सामने हम लोग बैठे थे, उस दुकानदार का भाई दिनेश बेदिया भी धर्म परिवर्तन कर लिया है, लेकिन दिनेश अपने परिवार में धर्म परिवर्तन करने वाला इकलौता सदस्य है। उस समय गांव के ही कुछ लोग उसे वापस अपने धर्म में आने के लिए समझा रहे थे। मैं दिनेश के पास गया और अपना परिचय देते हुए पूरे मामले की असलियत जानना चाहा, लेकिन वह कुछ भी बोलने से इंकार कर गया। उसने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों में से कोई भी मीडिया को कुछ नहीं बताएगा, क्योंकि हम बोलते कुछ हैं और अखबारों में छपता कुछ और ही है, इसलिए हम आपसे बात नहीं करेंगे।

मैंने उन्हें बहुत ही समझाने का कोशिश की, लेकिन मीडिया पर बने अविश्वास के कारण उनका मुंह नहीं खुलवा सका। फिर मैं धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों के घर गया। एक घर के सामने 8-10 महिलाएं व 2 पुरुष दिखायी दिये। जैसे ही मैंने अपना परिचय दिया, वे लोग बिना कुछ बोले अपने घर के अंदर चले गये। मेरे साथ मेरा एक दोस्त सोरेन बेदिया भी था, जिसकी ससुराल भी इसी गांव में था। उन्होंने भी उनलोंगों को अपना परिचय देते हुए काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन वे लोग इस मामले पर मुंह खोलने को तैयार नहीं हुए।

ग्रामीणों, भाजपा व संघ परिवार से जुड़े आदिवासी संगठनों के द्वारा इसाई धर्म अपना चुके लोगों कीघर वापसी के अभियान के इतर रांची के एसडीओ समीरा एस का कहना है कि मामले की गहराई से जांच की जाएगी। अगर लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया है, तो अधिनियम के प्रावधान के तहत कार्रवाई की जाएगी। वहीं रांची डीसी छवि रंजन का कहना है कि धर्म परिवर्तन के लिए दंडाधिकारी की अनुमति लेना जरूरी है। अगर किसी ने बिना अनुमति के धर्म परिवर्तन कर लिया है, तो उसे धर्म परिवर्तन के सात दिनों के अंदर जिला दंडाधिकारी को सूचना देनी है। इस मामले में अगर ऐसा नहीं हुआ है तो कार्रवाई होगी।

वर्षों पहले धर्म परिवर्तन कर चुके दलित-आदिवासियों की घर वापसी के लिए जिस तरह से भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े आदिवासी संगठन ग्रामीणों के बीच बैठकें कर रहे हैं, यह झारखंड के लिए बिल्कुल ही अच्छा संकेत नहीं है। झारखंड में धर्मांतरण एक ऐसा मुद्दा है, जिसके सहारे ही आदिवासियों के बीच में पैठ बनाने में संघ परिवार ने सफलता पायी है। पिछले साल दिसंबर में झारखंड में सत्ता परिवर्तन के बाद भी हिन्दुवादी ताकतों के द्वारा ग्रामीण इलाकों में धर्मांतरण के जरिये इसाई बने दलित-आदिवासियों की उत्पीड़न की कई घटनाएं सामने आयी है। गगारी में घट रही घटनाएं व धर्मांतरण कर चुके लोगों की चुप्पी एक बड़ी साजिश की ओर ही इशारा करती है, अगर समय रहते झारखंड की जनता इस साजिश को नहीं समझ पाएगी, तो झारखंड को अशांत होते देर नहीं लगेगी।

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on September 30, 2020 4:06 pm

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